क्या है सांसद आदर्श ग्राम योजना

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कमलेश पांडेय

अक्तूबर 2014 में शुरू की गई सरकार की सांसद आदर्श ग्राम योजना (एसएजीवाई) के चौथे चरण के अंतर्गत 31 दिसंबर, 2019 तक मात्र 252 सांसदों ने ही ग्रामसभाओं को आदर्श ग्राम योजना के लिये चुना था।

सांसद आदर्श ग्राम योजना की सार्थकता व महत्व पर एक नई बहस छिड़ी हुई है। क्योंकि इसके कार्यान्वयन का दायित्व जिन माननीयों के कंधे पर है, उनकी कोई खास दिलचस्पी इस योजना के क्रियान्वयन में नहीं देखी जा रही है अपवाद स्वरूप एक चौथाई से कुछ अधिक सांसदों के अलावा। क्योंकि पत्र सूचना कार्यालय द्वारा जारी एक आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, अक्तूबर 2014 में शुरू की गई सरकार की सांसद आदर्श ग्राम योजना (एसएजीवाई) के चौथे चरण के अंतर्गत 31 दिसंबर, 2019 तक मात्र 252 सांसदों ने ही ग्रामसभाओं को आदर्श ग्राम योजना के लिये चुना था। जबकि इस योजना की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विगत 11 अक्तूबर, 2014 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्म दिवस की वर्षगाँठ के अवसर पर की गई थी।

बीजेपी के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री राकेश कुमार उर्फ सम्राट चौधरी (सदस्य, बिहार विधान परिषद) ने पूछे जाने पर बताया जाता है कि इस योजना के अंतर्गत सभी लोकसभा सांसदों को हर वर्ष एक ग्रामसभा का विकास कर उसे जनपद की अन्य ग्रामसभाओं के लिये आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना था। साथ ही, राज्यसभा सांसदों को अपने कार्यकाल के दौरान कम-से-कम एक ग्राम सभा का विकास करना था। उन्होंने कहा कि इस योजना का उद्देश्य शहरों के साथ-साथ ग्रामीण भारत के बुनियादी एवं संस्थागत ढाँचे को विकसित करना था, जिससे गाँवों में भी उन्नत बुनियादी सुविधाएँ और रोज़गार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जा सकें। उन्होंने कहा कि इस योजना का उद्देश्य चयनित ग्रामसभाओं को कृषि, स्वास्थ्य, साफ-सफाई, आजीविका, पर्यावरण, शिक्षा आदि क्षेत्रों में सशक्त बनाना था।

वहीं, गाजियाबाद कांग्रेस के पूर्व महानगर अध्यक्ष नरेंद्र भारद्वाज बताते हैं कि इस योजना के अंतर्गत ग्रामसभाओं के चुनाव के लिये जनसंख्या को आधार रखा गया, जिसके अंतर्गत मैदानी क्षेत्रों के लिये 3000-5000 और पहाड़ी, जनजातीय एवं दुर्गम क्षेत्रों में 1000-3000 की जनसंख्या को आधार मानने का सुझाव दिया गया था। उन्होंने कहा कि इस योजना के अंतर्गत प्रत्येक सांसद को वर्ष 2019 तक तीन और वर्ष 2024 तक पाँच ग्रामसभाओं का विकास करना था। लेकिन इस योजना लागू होने के पाँच वर्ष बाद उपलब्ध आँकड़ों में देखा जा सकता है कि योजना के क्रियान्वन में सांसदों के मध्य शुरुआत से ही उत्साह की कमी रही है।

वहीं, एआईसीसी सदस्य व पूर्व प्रवक्ता ज्योति सिंह ने बताया कि इस योजना के चौथे चरण के अंतर्गत गाँवों विकास के लिये अभी तक दो तिहाई लोकसभा सांसदों ने अपने संसदीय क्षेत्र से ग्रामसभाओं का चुनाव भी नहीं किया है। जबकि संसद के दोनों सदनों में सदस्यों की वर्तमान संख्या 790 है। उन्होंने इस बात पर हैरत जताई कि दोनों सदनों से केवल 252 सदस्यों ने ही अभी तक चयनित ग्रामसभाओं की सूची साझा की है, जिनमें 208 लोकसभा तथा 44 सदस्य राज्यसभा से हैं।

समाजसेवी चिकित्सक व सुप्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डॉ मनीष कुमार ने इस योजना का पोस्टमार्टम करते हुए बताया कि इस योजना में शुरुआत के कुछ महीनों के बाद से ही संसद के सदस्यों की भागीदारी में कमी देखी गई है। आंकड़े गवाह हैं कि इस योजना के पहले चरण में जहाँ लोकसभा के 703 सांसदों ने हिस्सा लिया था, वहीं दूसरे चरण में इनकी संख्या केवल 497 और तीसरे चरण में घटकर मात्र 301 रह गई। उन्होंने कहा कि वर्तमान में लोकसभा की सदस्य संख्या 545 है जिनमें 543 सदस्य चुनाव के द्वारा और 2 सदस्य मनोनीत होकर भारत के विभिन्न क्षेत्रों की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। साथ ही, राज्यसभा की सदस्य संख्या 245 है जिनमें से 12 सांसद मनोनयन की प्रक्रिया से इस सदन का हिस्सा बनते हैं। वर्तमान में संसद के इस सदन में 240 सदस्य हैं, जबकि 5 सीटें अभी खाली हैं।

भाजपा नेता मनोज गोयल की मानें तो गुजरे महीनों में संसद की एक स्टैंडिंग कमेटी ने इस योजना की कमियों पर अपनी चिंता प्रकट की और अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा कि सांसद आदर्श ग्राम योजना का उद्देश्य विभिन्न योजनाओं के सामंजस्य और अभिसरण को सुनिश्चित करते हुए उनके पूर्ण क्रियान्वन को प्राथमिकता देकर आदर्श (मॉडल) गाँवों का निर्माण करना था। लेकिन इस योजना के आदर्श वाक्य की पूर्ति के लिये जिस गंभीरता की आवश्यकता थी, संसद सदस्यों में उसकी भारी कमी देखी गई है। ऐसे में कमेटी ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को यह सलाह दी है कि मंत्रालय इस योजना के परिकल्पित ध्येय के अनुरूप “एसएजीवाई गाँव” का विकास सुनिश्चित करे तथा यह भी सुनिश्चित करे की योजना के अंतर्गत कोई भी गाँव छूटने न पाए।

समाजसेवी व युवा उद्यमी राजीव रंजन राय बताते हैं कि इस बात
में कोई दो राय नहीं कि किसी भी देश के सर्वांगीण विकास के लिये यह आवश्यक है कि देश के हर वर्ग को जातिगत, लैंगिक अथवा अन्य किसी भेदभाव के बिना विकास के सामान अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिये। लेकिन भारत में आरक्षण व कतिपय अन्य विशेष प्रावधानों के कारण ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता, बल्कि विषमता में इजाफा ही हो रहा है।

वहीं, लोकबंधु राजनारायण स्मृति एवं शोध प्रतिष्ठान के वरिष्ठ शोधार्थी गोपाल जी राय बताते हैं कि भारत की एक बड़ी आबादी आज भी दूरदराज़ के गाँवों में निवास करती है और इनमें से अधिकतर कृषि या विभिन्न प्रकार के कुटीर उद्योगों पर निर्भर रहती है। ऐसे में एसएजीवाई योजनाएँ न सिर्फ इन गाँवों को विकास का एक अवसर प्रदान करती हैं बल्कि उनके आत्मविश्वास को भी बढ़ाती हैं। इसलिये वर्तमान समय में यह बहुत ही आवश्यक है कि ग्रामीण विकास की नई योजनाओं की परिकल्पना के साथ उनके क्रियान्वन पर भी गंभीरता से ध्यान दिया जाए तथा योजनाओं की अनदेखी होने पर संबंधित विभाग व अधिकारी की जवाबदेहिता भी सुनिश्चित की जाए। उन्होंने उम्मीद जताई कि योजनाओं के निर्माण व क्रियान्वयन हेतु गम्भीर मोदी सरकार इस मामले में भी कोई बेहतर नजीर स्थापित करेगी।

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