‘रामराज्य’ से भी पूर्व विद्यमान था रामराज्य ?

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सामान्यतया हमारी ऐसी धारणा है कि जब रामचंद्र जी इस धरती पर आए तो उनके शासनकाल को रामराज्य की उपाधि दी गई । जबकि ऐसा नहीं है । रामराज्य की परिकल्पना राम से भी पूर्व से चली आ रही है । वास्तव में जहां सत्य ,न्याय ,धर्म ,नीति और विधि के आधार पर शासन किया जाता है और प्रत्येक नागरिक को उसके मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षा की गारंटी राज्य की ओर से दी जाती है तो वह राज्य ही वास्तविक अर्थों में पंथनिरपेक्ष राज्य होता है। ऐसा शासन जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपना सर्वांगीण विकास कर सके , और जिस में अधिकारों से पहले कर्तव्यों की चिंता की जाती हो, जिसमें एक नागरिक दूसरे नागरिक के सम्मान का पूरा -पूरा ध्यान रखता हो ,ही रामराज्य कहलाता है ।


एक बार महर्षि वशिष्ठ मुनि से मर्यादा पुरुषोत्तम राम चंद्र जी ने पूछा कि महाराज यह रामराज्य क्या होता है ? मुझे यह समझा दो।
महर्षि वशिष्ठ मुनि ने कहा कि हे राम ! यदि तुम राम राज्य की स्थापना करना चाहते हो तो आपको पदम, गदा ,चक्र और शंख को समझना होगा, इनको धारण करना होगा। इनको अपने जीवन में सहेजना होगा।
रामचंद्र जी ने पूछा कि महाराज यह क्या होते हैं ?
वशिष्ठ मुनि ने उत्तर दिया कि यह चार भुज राजा के होते हैं। और जहां यह चार भुज होते हैं वहीं पर रामराज्य होता है।
राम ने प्रश्न किया कि वे चार भुज कौन-कौन से हैं?
पहला भुज पदम होता है, दूसरा भुज गदा, तीसरा भुज शंख और चौथा भुज चक्र होता है।
वशिष्ठ मुनि से रामचंद्र जी महाराज ने पुनः प्रश्न किया कि मैं रावण के अत्याचारों से भयभीत हूं। मुझे कृपया करके यह बता दें कि मैं उस आततायी रावण के अत्याचारों से कैसे मुक्ति पा सकता हूं ?प्रजा को न्याय दिला सकता हूं ?
महर्षि वशिष्ठ ने राम को समझाते हुए बताया कि पहले आपको विष्णु बनना पड़ेगा।
राम ने शंका की कि विष्णु क्या होता है?
महर्षि वशिष्ठ मुनि ने शंका समाधान करने के दृष्टिकोण से उत्तर दिया कि विष्णु आत्मा को भी कहते हैं। विष्णु परमात्मा को भी कहते हैं और विष्णु राजा को भी कहते हैं।
रामचंद्र जी ने पुनः प्रश्न किया कि महाराज मुझे बताइए कि मैं विष्णु कैसे बन सकता हूं?
महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि सबसे पहले आपको भुजा में पदम स्थापित करना होगा।
राम ने प्रश्न किया महाराज पदम किसे कहते हैं ?
ऋषि ने उत्तर दिया देखो पदम नाम सदाचार और शिष्टाचार का है।
जिस राजा के राष्ट्र में सदाचार और शिष्टाचार होता है उस राजा का राष्ट्र पवित्र कहलाता है। जिस राजा के राष्ट्र में सदाचार नहीं होता है हृदयों में एक दूसरे का सम्मान नहीं होता तो वह राष्ट्र आज नहीं तो कल नष्ट हो जाएगा ।
हे राम !यदि तुम राष्ट्र को पवित्र बनाना चाहते हो तो तुम्हारे लिए अनिवार्य है कि तुम्हें एक भुज में पदम स्थापित करना होगा। राजा के राष्ट्र में यथार्थ विद्या होनी चाहिए। तथा विद्या में सदाचार और शिष्टाचार की तरंगे हों वह विद्या सर्वोत्तम मानी जाती है ।वह विद्या राज्य को सफल बना देती है। यह पदम तुम्हें राम ऊंचे से ऊंचा बना सकता है। संसार पर तुम शासन कर सकते हो यदि सदाचार और शिष्टाचार नहीं तो तुम्हारा राष्ट्र रामराज्य किसी भी प्रकार नहीं बन सकता।
इससे आगे महर्षि वशिष्ठ मुनि कहते हैं की तुम्हें गदा का भी पालन करना होगा , गदा को भी धारण करना।
रामचंद्र जी ने शंका की कि महाराज गदा क्या होती है ?
ऋषि ने उत्तर दिया कि गदा नाम है क्षत्रियों का।
एक राजा के राष्ट्र में क्षत्रिय बलवान होने चाहिए। ऐसे क्षत्रियों को अपनी आत्मा का ज्ञान होना चाहिए । ऐसे छत्रिय ब्रह्मचर्य से पुष्ट हो ने चाहिए ।
जिस राजा के राष्ट्र में अपराधियों को दंड दिया जाता है ।वह राष्ट्र सदैव रामराज्य बनकर रहता है। जिस राजा के राष्ट्र में अपराधियों को दंड नहीं मिलता। उस राजा का राष्ट्र आज नहीं तो कल नष्ट हो जाएगा । राम तुम ग दा को स्थिर करना ।अपराधी को दंड देना। दुराचार को नहीं रहने देना। उस काल में तुम्हारा राष्ट्र रामराज्य कहलाएगा।
गदा के लिए यह भी आवश्यक है कि आपके राष्ट्र की बात किसी दूसरे राष्ट्र में नहीं पहुंचे। ऐसी उच्च आदर्शों की प्रजा होनी चाहिए ।ऐसे आपके क्षत्रिय होने चाहिए।
तभी राष्ट्र पवित्र होता है।
इस संवाद से यह स्पष्ट होता है कि किसी भी शासक की शासकीय व्यवस्था इतनी पारदर्शी और न्याय प्रिय होनी चाहिए कि उसमें किसी भी प्राणी को किसी प्रकार का कष्ट न हो । मनुष्य मात्र तो एक दूसरे की चिंता करते ही हों साथ ही वे सब मिलकर अन्य प्राणियों के जीवन का सम्मान करना भी अपना धर्म समझते हों, ऐसे सामाजिक और राष्ट्रीय परिवेश में जब सात्विकता का संगीत गूंजने लगता है तब सात्विकता के उस संगीत से जो ध्वनि गुंजित होती है उससे राष्ट्र सफल ,सक्षम और सबल होता है। इस प्रकार के सामाजिक और राष्ट्रीय परिवेश से विश्व शांति स्थापित होती है। इसमें अधिकारों की मारामारी नहीं होती ,अपितु कर्तव्यों का निर्वाह करने की स्वस्थ परंपरा का निर्वाह होता है । जिसमें लूट ,हत्या ,डकैती बलात्कार के अपराध नहीं होते और सब सबके लिए जीने में ही अपना जीवन सुरक्षित समझते हैं।
महाराज रामचंद्र जी ने वशिष्ठ मुनि से प्रश्न किया कि महाराज चक्र किसको कहते हैं?
हे राम सुनो ! चक्र संस्कृति का है नाम।
जिस राजा के राष्ट में संस्कृति होती है, संस्कार होते हैं उस राजा के राष्ट्र में चक्र होता है।
संस्कृति अमूल्य वाणी है।
जो मानव को सदाचार और शिष्टाचार देने वाली है।
संस्कृति कौन सी वाणी को कहते हैं ?
जो संस्कृति राष्ट्र से लेकर कृषि करने में, व्यापार करने में ,धनुर्विद्या में और नाना प्रकार के यंत्रों के आविष्कार में, ब्रह्मचर्य की सुरक्षा करने में, अपनी आत्मा की उन्नति करने में, और परमात्मा तक पहुंचने में जिस वाणी में वह ओतप्रोत हो ,उस वाणी का नाम संस्कृति है।
संस्कृति संस्कारों से निर्मित होती है या यह कहिए कि संस्कृति संस्कारों का निर्माण करती है। संस्कार एक ऐसी उत्कृष्ट परंपरा का नाम है जिसमें व्यक्ति सहज और सरल होकर प्रकृति के कण-कण के साथ अपना ऐसा तारतम्य स्थापित करता है। जिससे वह प्रकृति के लिए उपयोगी होकर जीने का चिंतन करता है । वह प्रकृति के लिए जीता है । प्रकृति का दोहन करने के लिए नहीं जीता। इस प्रकार की स्वस्थ सोच और चिंतन से जहां प्राकृतिक चीजों का दोहन नहीं होता वहीं प्रकृति के साथ मनुष्य मित्रतापूर्ण व्यवहार करते हुए बहुत शांत जीवन जीने का अभ्यासी हो जाता है। ऐसे परिवेश से सात्विकता का सर्वत्र वास बना रहता है और ऐसी ही उत्कृष्ट अवस्था को हमारे ऋषियों ने रामराज्य की अवधारणा के साथ सन्निहित किया है।
इसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए महर्षि ने कहा – यदि राम तुम यह फैसला दोगे तो तुम्हारा राष्ट्र राम राज्य बन जाएगा।
रामचंद्र जी महाराज ने प्रश्न किया कि महाराज शंख किसको कहते हैं?
वशिष्ठ ऋषि ने समझाया कि शंख वेद ध्वनि का है।
जिस राजा के राष्ट्र में वेद की ध्वनि होती है । वह भी जटा पाठ में ,माला पाठ में, घन पाठ में, विसर्ग पाठ में, और नाना प्रकार के स्वरों के जहां वेदों का पाठ गाया जाता है ,उस राष्ट्र में अंतरिक्ष भी वेद मंत्रों से आच्छादित रहता है । जिस राजा के राष्ट्र में सदाचार की शिक्षाएं, वेद की शिक्षा दी जाती हो वहां का वातावरण भी उत्त म होता है ।मनुष्य की विचारधारा ऊंची होती है। सदाचार और शिष्टाचार रहता है ।शंख ध्वनि नाम वेद वाणी का है ,ज्ञान का है। जिस राजा के राष्ट्र में यज्ञ होते हैं ,वेदों का पाठ होता है तो उस राष्ट्र में कार्य करने वाले देवता भी प्रसन्न होते हैं । प्रसन्न होकर के उस राजा के राष्ट्र को, प्रजा को और राजा को मनोवांछित फल दिया करते हैं।
वेदों की वाणी मानव के भीतर मानवता का संचार करती है अर्थात मानव को उसके धर्म का हर कदम पर बोध कराती रहती है। जिससे वह एक सधा हुआ जीवन जीता है। सधा हुआ धर्मशील जीवन मनुष्य को सबके लिए उपयोगी बने रहने की उत्कृष्ट भावना में ढाले रखता है। ऐसी अवस्था ही मनुष्य को मानव से देव बनने की प्रेरणा देती है । ऐसी अवस्था में मानव कभी भी अपने पथ से भ्रष्ट नहीं होता और वह अपने जीवन की उत्कृष्ट साधना में सदा लगा रहता है। इससे एक सात्विक प्रतिस्पर्धा समाज में जन्म लेती है। जिससे सब सबके साथ मिलकर अपने अपने जीवन का निर्माण करते हैं और उसे उत्कृष्टता में ढालने की साधना में लगे रहते हैं।
इसी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए महर्षि ने कहा – हे राम ! तुम्हें अपने राष्ट्र को ऊंचा बनाना है तो तुम्हें इस प्रकार से विष्णु बनना पड़ेगा अर्थात जिस राजा के भुज में यह जन्म होते हैं यह 4 नियम होते हैं । पदम चक्र, गदा संघ वह राष्ट्र पवित्र कहलाता है और उस राजा का नाम ही विष्णु कहा जाता है और ऐसा ही राज्य राम राज्य कहा जाता है। भगवान राम ने राम राज्य की स्थापना की ।वह एक महान राजा थे।
इस प्रकार की चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि रामचंद्र जी के भीतर दिव्य गुणों के होने के कारण ही उन्हें विष्णु का अवतार मानने की भूल की गई । यद्यपि वह राजा के दिव्य गुणों से विभूषित होने के कारण ही विष्णु कहे जा सकते हैं। यह गलत है कि वह विष्णु के अवतार थे । उन्होंने ऐसे पवित्र कार्य किए जिससे राजा के पद की गरिमा में वृद्धि हुई और प्राचीन काल में हमारे ऋषियों ने जिस उद्देश्य को लेकर राजापद की स्थापना की थी उस उद्देश्य में सार्थकता का सम्मेलन हुआ।
अवतारवाद को वेद विरुद्ध माना गया है क्योंकि परमात्मा कभी भी अवतार का रूप धारण करके पृथ्वी पर अवतरित नहीं होते।परमात्मा को कभी भी पैदा होने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।क्योंकि वह बिना पैदा हुए ही सब कुछ करने में सक्षम है। वह समर्थ है। सर्वशक्तिमान है। ईश्वर अजन्मा है।
इसका तात्पर्य हुआ कि रामराज्य की महाराजा राम के राज्य के (जो दशरथ के पुत्र थे ) आधार पर राम राज्य कहते हो। बल्कि रामराज्य तो इससे पूर्व भी सतयुग में भी और अन्य चतुर्युगियों में भी होते रहे हैं। ऐसे में हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम रामराज्य की परिकल्पना को या परिभाषा को सीमित संक्षिप्त या संकीर्ण न होने दें उसे विस्तार दें और उसे किसी देश विशेष की सीमाओं में न बांधकर संपूर्ण संसार के लिए उपयोगी बनाने की दिशा में कार्य करें ।
राम को विष्णु का अवतार कहने की गलती ना करें और सही अर्थों में समझने का प्रयास करेंगे।
यह लेख मैंने पूर्व जन्म के शृंग ऋषि की आत्मा धारी ब्रह्मर्षि कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी के दिनांक 17 अप्रैल 1964 को दिए गए प्रवचन के आधार पर उनकी पुस्तक अलंकार व्याख्या से प्रस्तुत किया है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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