तिब्ब्त : चीखते अक्षर – भाग -5

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बीस वर्षीय युद्ध –
चीनी सामान्यत: यह दावा करते हैं कि तिब्बतियों द्वारा उन के विरुद्ध लड़ा गया युद्ध मुख्यत: तिब्बती शासक वर्ग का था जिसे आसानी से 1959 में कुचल दिया गया। अब यह बात असत्य साबित हो गई है। इसके विपरीत वह ल्हासा की तिब्बती सरकार ही थी जो शांतिपूर्ण समझौते की आस कर रही थी और पूर्वी तिब्बत के उग्र लोगों को संयमित रखने के हर उपाय कर रही थी। एकदम प्रारम्भ से ही तिब्बती लोगों ने चीनी हमले का विरोध किया और समूचे सीमाक्षेत्र के साथ स्वत:स्फूर्त प्रतिरोध के क्षेत्र विद्यमान थे। जब चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी की टुकड़ियों ने अक्तूबर 1950 में द्राइ-चू(यांग्त्सी नदी) को पार करने का प्रयास किये तो उन्हें तिब्बती सरकार की सेनाओं और तिब्बती स्वयंसेवी जनसेनाओं दोनों का सामना करना पड़ा। 1950 के प्रारम्भ से मध्य तक आते आते समूचे पूर्वी तिब्बत में लड़ाई चारो ओर फैल चुकी थी। युद्ध बीस वर्षों तक चला और प्रतिरोध की लोकप्रियता इतनी गहन थी कि तिब्बती शासक समाज पर दमनकारी होने का चीनी आरोप बहुत ही संदिग्ध लगता है।

लड़ाई के उरूजकाल में लाखों चीनी और तिब्बती जूझ रहे थे और उसका प्रसार पूर्वी, मध्य और दक्षिणी तिब्बत सभी ओर था। लड़ाई में तिब्बती जनसमाज का हर तबका सम्मिलित था। 1949 में चीनियों ने पूर्वी तिब्बत में घुसपैठ की। उन्हों ने स्थानीय आपसी झगड़ों को प्रोत्साहित किया और उनकी हरकतों को केन्द्रीय तिब्बती सत्ता की अनिर्णयात्मक प्रवृत्ति के कारण बल मिला। इस लम्बे युद्ध के निम्न कारण थे:
(अ) चीनी सेना की भारी संख्या के कारण उत्पन्न खाद्य पदार्थों का अभाव
(आ) ‘कोरिया सहयोग’ निधि में योगदान के लिये चीनियों द्वारा फसल, ऊन और पशुसम्पदा पर लगाये गये कर
(इ) तिब्बती खाम्ब जाति को नि:शस्त्र करने के प्रयास
(ई) ‘कम्यून तंत्र’ को लागू करने के प्रयास जो कि तिब्बतियों के लिये घृणित था क्यों कि वह सुस्थापित जीवन पद्धति के लिये विनाशकारी था।
(उ) चीनी घुसपैठियों द्वारा भारी संख्या में बसावट जो कि चाम्दो क्षेत्र में चरम पर थी।
(ऊ) सर्वमहत्त्वपूर्ण थे – तिब्बतियों के धर्म को हानि पहुँचाने के प्रत्यक्ष और परोक्ष चीनी प्रयास

पहले तो चीनियों ने कुछ ऐसे सुधारों को लागू किया जो बहुत लाभकारी थे और यदि वे वैसे ही जारी रहते तो सम्भवत: मुद्दे बहुत ही अलग होते लेकिन तिब्बती समाज में दूरगामी और सामान्यत: अवांछनीय परिवर्तनों पर उनके निर्दयी जोर ने खाम और आम्डो क्षेत्रों में नित वर्धमान विद्रोह को उकसाया जिनका प्रतिरोध चीनियों ने विभिन्न अत्याचारों से किया। उदाहरण के लिये दोइ नाम के एक छोटे से नगर में 500 में से 300 कथित भूदास स्वामियों को आतंकित भीड़ के सामने सार्वजनिक रूप से सिरों में पीछे से गोलियाँ दाग कर मार दिया गया। लोगों को बताया गया कि यदि उन्हों ने समाजवाद का विरोध किया तो उनका भी यही हाल होगा।
चीनियों ने विद्रोह के अस्तित्त्व को कई अवसरों पर स्वीकार किया यद्यपि नई चीनी समाचार एजेंसी के बुलेटिन अंतर्विरोधों से भरे पड़े हैं। डा. पीस्सेल संकेत करते हैं कि राज्य परिषद को दिये अपने भाषण में कथित ‘चीनी तिब्बती क्षेत्र’ के कमांडर-इन-चीफ ने घोषणा की कि कठिनाइयों से पाला पड़ा है और तिब्बत में गम्भीर ग़लतफहमियाँ फैली हैं। बाद में दिसम्बर 1957 में कम्युनिस्ट पार्टी कार्यकारी समिति के सचिव फान मिंग ने यह तक घोषित कर दिया कि खाम्बों के अकथ से प्रतीत होने वाले विद्रोह के प्रेरक जनक तिब्बत में विद्यमान हान(चीनी) जाति के ‘महान हान श्रेष्ठताबोध’ और तिब्बत के पिछड़ेपन के प्रति प्रदर्शित उनकी जुगुप्सा थे।
1955 में जैसे जैसे विद्रोह बढ़ा, लिथांग, बाथांग, दर्गे, चाम्डो और कांज़े के आसपास घनघोर लड़ाइयाँ प्रारम्भ हो गईं। यह जानना कठिन है कि उन लड़ाइयों में सम्मिलित लोगों की वास्तविक संख्या क्या थी लेकिन प्रारम्भ में ही लड़ाई की गहनता और उसके क्षेत्रीय प्रसार से परिचित बहुश्रुत लोग चीनियों से लड़ने वाले खाम्बा घुड़सवारों की संख्या दस हजार तक बताते हैं। लड़ाइयों का प्रसार बड़े भूभाग में हो गया क्यों कि अपने पारम्परिक चीनी शत्रुओं के विरुद्ध शस्त्र उठाने वाले तिब्बतियों की संख्या बढ़ती गई और कभी कभी तो युद्ध शून्य से भी 40 डिग्री सेल्सियस नीचे तापमान में 4500 मीटर से भी अधिक ऊँचाइयों पर लड़े गये। अधिकांशत:, धुन्ध वाले निचले क्षेत्रों से आये चीनी आक्रमणकारी खाम्बा योद्धाओं के आगे कहीं नहीं ठहरते थे जो कि ऐसे वातावरण में लड़ने की शक्ति रखते थे और समूचे क्षेत्र को बहुत अच्छी तरह से जानते थे। चीनियों को 1956 में जहाँ के तहाँ रोक दिया गया और उपद्रवों के कारणों की जाँच के लिये के चीनियों द्वारा डिप्टी प्रीमियर चेन-यि को भेजा गया। उसके उपरांत चीनियों ने तिब्बतियों के साथ शान्ति समझौता कर लिया जिसे चीनियों ने बाद में तोड़ दिया।
पचास के दशक के उत्तरार्ध में चीनियों ने पूर्वी तिब्बत में अपनी सेनाओं की भारी घुसपैठ कराई थी। लिथांग में प्रारम्भ हुये एक प्रमुख आक्रमण के प्रतिकार में चीनियों द्वारा 1 जून 1956 को लिथांग के विशाल बौद्ध मठ को बमबारी द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। उस समय मठ तीर्थ यात्रियों से खचाखच भरा हुआ था। चीनियों के अनुरोध पर 1980 में जब दलाई लामा द्वारा भेजे गये द्वितीय सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडल ने तिब्बत का दौरा किया तो उसे लिथांग के स्थान पर ध्वस्त खंडहर मिला। मठ को ढहाने के बाद लिथांग के स्थानीय तिब्बती राज्यपाल को चीनियों ने सार्वजनिक रूप से यातनायें दे कर मार दिया और सैंकड़ो भिक्षुओं का पशुओं की तरह से वध कर दिया। शरणार्थियों और चरवाहों के कैम्पों को मशीनगनों की गोलीबारी और हवाई बमबारियों द्वारा विनष्ट कर दिया गया। जाने कितने हजार चीनियों के लेबर कैम्पों में लापता हो गये। विद्रोही युद्ध जब पश्चिमी तिब्बत की ओर बढ़ा तो सभी व्यवसायों के तिब्बतियों – किसान, जनजातिगण, चरवाहे, व्यापारी और भिक्षु – ने एका दिखाते हुये अपनी बौद्ध संस्कृति और प्राचीन जीवनपद्धति की रक्षा में विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश की आक्रमणकारी सेनाओं के विरुद्ध कमर कस ली। (युद्ध जारी)

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