पैसों की नहीं
सेवाभाव की जरूरत है

– डॉ. दीपक आचार्य
9413306077

अब वो दिन नहीं रहे जब समाज और परिवेश के बहुमुखी उत्थान के लिए पैसों की जरूरत ही प्रधान थी और उसके बगैर सेवा कार्यों में विलंब या बाधाओं का सामना करना पड़ता था।आज समय बदल चुका है। कुछ दशकों पहले तक की ही बात है जब समाज में सेवा और कल्याण का ज़ज़्बा बढ़-चढ़ कर बोलता था। खूब सारे लोग अपने सामाजिक दायित्वों और आने वाली पीढ़ियों तथा अपने क्षेत्र के लिए समर्पित होकर जुटते थे लेकिन उस दौर में धन की कमी आड़े आया करती थी और इसी एक विवशता की वजह से सेवा भावना से जन कल्याण एवं अपने क्षेत्र के उत्थान के प्रति लाख समर्पण और काम करने की अथाह भावनाओं के बावजूद धनाभाव बहुत बड़ा कारण बनकर उपस्थित होता रहता था और इस एकमात्र वजह से कई कार्य चाहते हुए भी लोग नहीं कर पाते थे जबकि उन दिनों लोक सेवा और क्षेत्रीय उत्थान का ‘वार मुँह बोलता था।

कालान्तर में स्थितियों ने समाजोन्मुखी से अपना स्थान बदला और धंधों ने जड़ें जमानी आरंभ कर दी। इन धंधों ने स्वार्थ और पारस्परिक व्यापार को बढ़ावा दिया और इसका सीधा नतीजा यह सामने आया कि सेवा से जुड़े हुए सरोकारों की मानसिकता व्यवसायिक होने लगी और इसका खामियाजा आज भी समाज को भुगतान पड़ा रहा है तथा पीढ़ियों तक यह समस्या बरकरार रहने वाली है।लोक व्यवहार में व्यावसायिकता के आने से समाज सेवा और क्षेत्र सेवा के भाव गौण होते चले गए और इनका स्थान ले लिया स्वयं के विकास के लिए की जाने वाली गतिविधियों ने। इससे आदमी का समुदाय और क्षेत्र के प्रति लगाव इतना खत्म हो गया कि आज कुछ बिरलों को छोड़ दिया जाए तो बहुतेरे लोग इन्हीं धाराओं में बह चलने के इतने आदी हो चले हैं कि न इन्हें समाज की परवाह है, न देश और अपने क्षेत्र की।हमेशा ये सभी जगह खुद ही खुद को आईने में देखते हैं और खुद ही के लिए जीते और अपने जीने के लिए और किसी को मार डालने के दुस्साहस से भी पीछे नहीं हटते।
समाज के लिए यह आत्मघाती मानसिकता ऐसी जड़ें जमा चुकी है कि इनसे मानवीय सभ्यता और सृष्टि सब कुछ प्रदूषित होने लगी है। कुछ दशकों पहले तक जहां सेवा गतिविधियों और सामुदायिक उत्थान के लिए पैसों की जरूरत हुआ करती थी वहीं आज स्थिति इसके ठीक उलट है।
आज पैसों की कहीं कोई कमी नहीं है बल्कि उन लोगों की कमी होती जा रही है जो ईमानदारी और सेवा भावना से कर्मयोग में जुटें और जगत कल्याण की गतिविधियों में प्रेरक तथा सक्रिय सहभागिता निभाते हुए आगे आएं।
आज सेवा और परोपकार के क्षेत्र अनन्त और व्यापक हैं जिनके लिए धन की कोई कमी नहीं है बल्कि इन सभी कामों के लिए चरित्रवान और स’चे सेवाव्रती लोगों की कमी महसूस की जा रही है।
पहले लोग सेवा को अपना काम मानकर आगे आते थे। उनका मानना था कि सेवा से पुण्य प्राप्ति के साथ ही ईश्वर को प्रसन्न किया जा सकता है। आज लोग सेवा करना नहीं चाहते लेकिन सेवा के नाम पर पुण्यार्जन की बजाय धनार्जन के लिए लालायित रहने लगे हैं।समाज जीवन और क्षेत्रीय तमाम सरोकारों में सफलता पाने के लिए जरूरी है कि हम सभी अपनी व्यवसायिक मानसिकता का परित्याग करें और उस समाज के लिए जीने की आदत डालें जिसने पाल-पोस कर हमें इतना बड़ा कर दिया है कि हम हमारे बारे में सोचने और करने लगे र्हैं।इसके साथ ही यह भी स्वीकारें कि हमारी मातृभूमि के जो भी कर्ज हम पर हैं उन्हें चुकाए बगैर हमारी मुक्ति किसी जन्म में कभी संभव नहीं है। माटी और जन समुदाय की हमारे प्रति आशाओं, आकांक्षाओं को पूरा करना हमारा नैतिक दायित्व है जिससे हम मुँह नहीं मोड़ सकते।मुद्रार्चन का सुख क्षणिक होता है जबकि सेवा का पुण्य और प्रताप अपनी पीढ़ियों तक को निहाल करने का सामर्थ्य रखता है। इस सत्य को अंगीकार करें।

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