हमें अपनी लौकिक और पारलौकिक उन्नति के लिए नित्य प्रति अपनी मृत्यु और परजन्म पर विचार करना चाहिए

images (80)

ओ३म्

=============
हम मनुष्य होने से चिन्तन, मनन व विचार करने के साथ सद्ग्रन्थों का पता लगाकर उनका अध्ययन व स्वाध्याय कर सकते हैं। किसी न किसी रूप में मनुष्य यह कार्य करते भी हैं। इस कार्य को करते हुए हमें इस संसार के रचयिता परमात्मा के सत्यस्वरूप व उसके गुण, कर्म, स्वभावों सहित अपनी आत्मा के सत्यस्वरूप का विचार भी करना चाहिये। जब हम विचार करेंगे तो हमें अपनी वास्तविक स्थिति का ज्ञान होगा। बिना अध्ययन व गुरुजनों के उपदेशों के हम ईश्वर व आत्मा के सत्यस्वरूप को नहीं जान सकते। आजकल सत्गुरुओं का मिलता कठिन व असम्भव सा ही हो गया है। गुरु तो अनेक हैं परन्तु गुरुओं के यथार्थ लक्षण आजकल के गुरुओं में घटते व विद्यमान नहीं होते हैं। परमात्मा भी हमारा गुरु है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में इसके लेखक ऋषि दयानन्द ने गुरु शब्द के विषय में बताया है कि जो सत्यधर्म का प्रतिपादक, सकल विद्यायुक्त वेदों का उपदेश करता, सृष्टि की आदि में अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा और ब्रह्मादि गुरुओं का भी गुरु और जिसका नाश कभी नहीं होता, इसलिए उस परमेश्वर का नाम गुरु है।

ऋषि दयानन्द ने ही सत्यार्थप्रकाश में परिशिष्ट रूप में दिए ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ में गुरु के विषय में कहा है कि माता पिता और जो सत्य का ग्रहण करावे और असत्य को छुड़ावे वह भी गुरु कहलता है। ऋषि दयानन्द रचित एक लघु पुस्तक है जिसका नाम है आर्योद्देश्यरत्नमाला । इस पुस्तक में ऋषि दयानन्द ने वेदों व धर्मशास्त्रों का अध्ययन करके धर्म आदि का अध्ययन करने पर ज्ञात होने वाली प्रमुख मानयताओं को अपनी सरल हिनदी में परिभाषित किया है। इस पुस्तक में गुरु के सम्बन्ध उन्होंने कहा है कि जो वीर्यदान से लेके भोजनादि कराके पालन करता है, इससे पिता को गुरु कहते हैं, और जो अपने सत्योपदेश से हृदय के अज्ञानरूपी अन्धकार को मिटा देवे, उसको भी ‘गुरु’ अर्थात् आचार्य कहते हैं। समाज व देश देशान्तर में आज ऐसे सत्यधर्म के प्रतिपादक, सकल विद्यायुक्त, वेदों का उपदेश करने वाले तथा निर्भरांत ज्ञान रखने व देने वाले आप्त पुरुषों का मिलना असम्भव नहीं तो कठिन तो है ही। आजकल ऐसे गुरुओं से विपरीत स्वार्थी प्रवृत्ति के अविद्यायुक्त तथा छल करने वाले गुरु मिलते हैं जिससे मनुष्य का जीवन उन्नति के स्थान पर अवनति को प्राप्त होता है। अतः ऐसे समय में वेदों के विद्वान आचार्यों की शरण में जाकर, जो आर्यसमाजों, गुरुकुलों तथा वैदिक आश्रमों में उपलब्ध होते हैं, उनसे उपदेश ग्रहण करना चाहिये। उनकी अनुपस्थिति में हम सत्यार्थप्रकाश, उपनिषद, दर्शन, विशुद्ध मनुस्मृति तथा चार वेदों के हिन्दी भाष्य का अध्ययन कर ईश्वर तथा आत्मा संबंधी सत्य व निभ्र्रान्त ज्ञान को प्राप्त हो सकते हैं। हमने भी इसी प्रकार से कुछ ज्ञान को प्राप्त किया है जिससे हम ईश्वर व आत्मा के विषय में कुछ कुछ जान पाये हैं। यदि हम इस माध्यम व साधनों को न अपनाते तो हम ईश्वर, आत्मा तथा सृष्टि सहित धर्माधर्म विषयक ज्ञान को प्राप्त न हो पाते। कोई भी हिन्दी पठित मनुष्य स्वाध्याय करके ईश्वर व आत्मा सहित धर्माधर्म विषयक सत्य ज्ञान को प्राप्त हो सकता है व सबको अवश्य ही होना चाहिये।

ईश्वर के विषय में ऋषि दयानन्द ने अपनी लघु पुस्तक ‘आर्योद्देश्यरत्नमाला’ में बताया है कि ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव और स्वरूप सत्य ही हैं। वह केवल चेतनमात्र वस्तु है तथा एक, अद्वितीय, सर्वशक्तिमान, निराकार, सर्वत्र व्यापक, अनादि और अनन्त तथा सत्य गुणवाला है। उसका स्वभाव अविनाशी, ज्ञानी, आनन्दी, शुद्ध, न्यायकारी, दयालु और अजन्मादि है। उसका कर्म जगत् की उत्पत्ति, पालन और विनाश करना तथा सब जीवों को पाप-पुण्य के फल ठीक-ठीक पहुंचाना है। ऐसे स्वरूप तथा गुण, कर्म तथा स्वभाव वाली सत्ता को ईश्वर कहा व माना जाता है। ईश्वर का अस्तित्व इस ब्रह्माण्ड में सत्य ही है। जो मनुष्य ऐसा जानते व मानते हैं वही विद्वान होते हैं और जो नहीं जानते वह मूढ व अज्ञानी होते हैं। जीव के स्वरूप का वर्णन भी वेदों के मर्मज्ञ ऋषि दयानन्द जी ने किया है। वह कहते हैं कि जीव चेतन, अल्पज्ञ, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान गुणवाला, अनादि, नित्य, एकदेशी, ससीम तथा जन्म व मरण को प्राप्त करने वाली सत्ता है। ऋषि दयानन्द वेद व दर्शन आदि ग्रन्थों के आधार पर प्रकृति व सृष्टि का सत्यस्वरूप भी प्रस्तुत करते हैं। प्रकृति सत्व, रज तथा तम इन तीन गुणों वाली है। परमात्मा द्वारा सृष्टि की रचना के समय इनमें विकार उत्पन्न करके महतत्व, अहंकार, पांच तनमात्रायें, पंचमहाभूत तथा मन, बुद्धि व चित्त आदि बनाते हैं। मूल व कारण प्रकृति से ही परमात्मा इस समस्त कार्य सृष्टि को बनाते हैं। सृष्टि के विषय में शास्त्रों की मान्यता है कि ‘जो कर्ता की रचना से कारण द्रव्य किसी संयोग विशेष से अनेक प्रकार कार्यरूप होकर वर्तमान में व्यवहार करने के योग्य होता है, वह सृष्टि कहलाती है।’ हमारा यह ब्रह्माण्ड, सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, अग्नि, जल, वायु, आकाश आदि पदार्थ मूल प्रकृति से ही सर्वज्ञ, सर्वव्यापक तथा सर्वशक्तिमान परमात्मा द्वारा बनाये गये हैं।

सृष्टि व हमारा ब्रह्माण्ड प्रवाह से अनादि है। अनादि काल से ईश्वर सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय करते चले आ रहे हैं। यह क्रम अनन्त काल तक चलना है। परमात्मा इस सृष्टि को जीवों को उनके कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल भोग कराने तथा दुःखों की सर्वथा निवृति करने सहित मोक्ष प्रदान कराने के लिये बनाते हैं। इस कारण हम जीवात्माओं के अनादि काल से जन्म व मरण होते आ रहे हैं। हम जो जो जैसा कर्म करते हैं उसके अनुसार ही परमात्मा से हमें उनका सुख व दुःख रूपी फल प्राप्त होता है। वेदों का अध्ययन कर हम वेदाचरण, सत्याचरण व धर्माचरण सहित सब मनुष्यों व जीवात्माओं के साध्य परमात्मा की उपासना कर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। मोक्ष की अवधि समाप्त होने पर जीवात्मायें पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेकर कर्म बन्धन में आती हैं और उनका जन्म व मरण अर्थात् पुनर्जन्म होता जाता है। जीवात्मायें अनादि व नित्य सहित अमर व अविनाशी भी है। अतः इनका जन्म व मरण सनातन व शाश्वत है तथा अनन्त काल तक इनके जन्म व मरण का क्रम जारी रहेगा। जीवात्मा की इस स्थिति व गति को जानकर हमें अपने जीवन की स्वाध्याय, कर्म व उपासना विषयक योजना बनानी चाहिये। वह योजना यही है कि हम दुःखों से बचे रहें तथा अधिकतम सुखों को प्राप्त हों। इसके लिये हमें पाप व अशुभ कर्मों का सर्वथा त्याग कर पुण्य कर्मों का ही वरण करना होगा। पुण्य कर्मों के साथ हमें ईश्वर के सत्य स्वरूप को अपने हृदय, मन, बुद्धि व आत्मा में स्थापित कर उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना को करना होगा। उपासना ईश्वर के सत्य गुणों का ध्यान करने तथा उससे अपने व सब प्राणियों को सद्प्रेरणाओं तथा सत्कर्मों कर्मों को प्राप्त करने की प्रार्थना व भावना करते हुए करते हैं। यम व नियमों का पालन करते हुए हम जीवन व्यतीत करते हैं। ईश्वरोपसना सहित हम वेदाज्ञा के अनुसार दैनिक देवयज्ञ अग्निहोत्र तथा पितृ, अतिथि तथा बलिवैश्वदेव यज्ञों को भी करते हैं। ऐसा करते हुए हम सभी दुःखों से मुक्त होकर ईश्वर को प्राप्त होकर मोक्ष की प्राप्ति करने के पात्र बनते हैं जो मोक्ष की अवस्था हमें ईश्वर के द्वारा प्राप्त होती है। हमें मोक्ष को ध्यान में रखकर ही अपने जीवन व्यतीत करने की योजना बनानी चाहिये जिसमें वेद व सत्शास्त्रों सहित ऋषि दयानन्द के वेदानुकूल एवं वेदसम्मत ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, वेदभाष्य, व्यवहारभानु, पंचमहायज्ञविधि, गोकरुणानिधि तथा ऋषि दयानन्द का जीवन चरित्र सहायक होते हैं।

ईश्वर, आत्मा तथा प्रकृति अनादि, नित्य व सनातन सत्तायें हैं। अतः ईश्वर इस सृष्टि को अनन्त काल तक बनायेंगे ही और सब जीवात्माओं का उनके पूर्वजन्मों के कर्मों के अनुसार जन्म भी होगा ही। अतः हम जन्म व मरण से कदापि नहीं बच सकते। हम इस जीवन में अवश्य ही मरेंगे और उसके बाद हमारा पुनर्जन्म भी होना ही है। यह पुनर्जन्म हमारा इस जन्म के शुभ अशुभ व पुण्य-पाप कर्मों के आधार पर होगा। हममें से कोई नहीं चाहेगा कि वह पुनर्जन्म लेकर पशु, पक्षी, गधा, घोड़ा, बैल, कुत्ता, बिल्ली, सर्प, सूअर आदि बने। हम भी नहीं चाहते। अतः हम परजन्म व पुनर्जन्म में दुःखों को प्राप्त न हों, इसके लिये हमें अपने वर्तमान जन्म में सभी अविद्यायुक्त तथा अशुभ पाप कर्मों को तत्काल त्याग कर देना चाहिये। इसी से हमारी रक्षा हो सकती है। इसके लिये हमें आज ही सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन कर अपने जीवन व इसके कर्तव्यों को समझना चाहिये। हमारी सभी शंकाओं का समाधान सत्यार्थप्रकाश में सुलभ होता है। इसके बाद हम अन्य सभी शास्त्रों का अध्ययन कर लाभ उठा सकते हैं। अतः हमें पुनर्जन्म पर विश्वास कर उसे सुधारने के लिये आज व अभी तत्पर होना होगा। इसी में बुद्धिमत्ता है। अपनी मृत्यु एवं आगामी पुनर्जन्म व जन्मों का विचार करके ही हम अशुभ कर्म व पापों से बच सकते हैं। इसी में हमारा सुख, हित व उन्नति निहित है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
holiganbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
perabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet güncel giriş
onwin güncel giriş
betpark
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş
betpark
sahabet güncel giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
Katla Giriş
Katlabet Giriş
nitrobahis
katlabet