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इतिहास के पन्नों से भयानक राजनीतिक षडयंत्र

इतिहास पर गांधीवाद की छाया, अध्याय – 8( 2)

23 दिसम्बर 1929 को वायसराय की स्पेशल ट्रेन उड़ाने का जो प्रयास हमारे क्रान्तिकारियों के द्वारा किया गया था , उसकी कांग्रेस द्वारा निन्दा की गई थी और कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पास कर उसे वायसराय की सहानुभूति बटोरने के लिए उसके पास भी भेजा था । इस पत्र का शुभारम्भ कांग्रेस के इस निन्दनीय आचरण की आलोचना करते हुए ही किया गया। कांग्रेस के इस आचरण को हमारे क्रान्तिकारियों ने ‘गांधी जी की सांठगांठ से कांग्रेस द्वारा अपने विरुद्ध ‘घोर आन्दोलन आरम्भ’ करने की संज्ञा दी थी। पत्र की इस भाषा से स्पष्ट हो जाता है कि गांधीजी क्रान्तिकारियों से पूर्णत: असहमत रहते थे और उनकी देशभक्ति को देश के लिए पूर्णतया बकवास माना करते थे । जिसका क्रान्तिकारियों को भी बहुत अधिक दु:ख रहता था। पत्र कुछ इस प्रकार था :– 

क्रान्तिकारियों के विरुद्ध गांधीजी का ‘घोर आंदोलन’


“हाल ही की घटनाएँ। विशेष रूप से 23 दिसम्बर, 1929 को वाइसराय की स्पेशल ट्रेन उड़ाने का जो प्रयत्न किया गया था, उसकी निन्दा करते हुए कांग्रेस द्वारा पारित किया गया प्रस्ताव तथा ‘यंग इण्डिया’ में गाँधी जी द्वारा लिखे गए लेखों से स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गाँधी जी से साँठ-गाँठ कर भारतीय क्रान्तिकारियों के विरुद्ध घोर आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया है। जनता के बीच भाषणों तथा पत्रों के माध्यम से क्रांतिकारियों के विरुद्ध बराबर प्रचार किया जाता रहा है। या तो यह जानबूझकर किया गया या फिर केवल अज्ञान के कारण उनके विषय में गलत प्रचार होता रहा है और उन्हें गलत समझा जाता रहा। परन्तु क्रान्तिकारी अपने सिद्धान्तों तथा कार्यों की ऐसी आलोचना से नहीं घबराते हैं। बल्कि वे ऐसी आलोचना का स्वागत करते हैं, क्योंकि वे इसे इस बात का स्वर्णावसर मानते हैं कि ऐसा करने से उन्हें उन लोगों को क्रान्तिकारियों के मूलभूत सिद्धान्तों तथा उच्च आदर्शों को, जो उनकी प्रेरणा तथा शक्ति के अनवरत स्रोत हैं, समझाने का अवसर मिलता है। आशा की जाती है कि इस लेख द्वारा आम जनता को यह जानने का अवसर मिलेगा कि क्रान्तिकारी क्या हैं, उनके विरुद्ध किए गए भ्रमात्मक प्रचार से उत्पन्न होने वाली गलतफहमियों से उन्हें बचाया जा सकेगा।”

अहिंसा का गलत अर्थ किया गया

स्पष्ट हो जाता है कि हमारे क्रान्तिकारी कॉन्ग्रेस और गांधी जी के द्वारा अपने विरुद्ध चलाए जा रहे भ्रमात्मक प्रचार को लेकर बहुत अधिक दु:खी रहते थे। कांग्रेस हमारे क्रान्तिकारियों के बारे में उस समय जनता के बीच जाकर उसे यही समझाती थी कि ये लोग देश में आग लगाने वाले हैं और इनका उद्देश्य आजादी न लेकर लोगों को आतंकित करना है। कांग्रेस का इस प्रकार का नकारात्मक और भ्रमात्मक प्रचार हमारे क्रान्तिकारियों को जो बहुत चुभता था। 
कांग्रेस हमारे क्रान्तिकारियों की हिंसा को लोगों के बीच बदनाम करती थी । जबकि अपनी अहिंसा को इस प्रकार प्रस्तुत करती थी जैसे कि उसी के माध्यम से देश आजाद होने जा रहा है । इस पर क्रान्तिकारियों ने अपने इस पत्र के माध्यम से लोगों को स्पष्ट करने का प्रयास किया कि :– 

”पहले हम हिंसा और अहिंसा के प्रश्न पर ही विचार करें। हमारे विचार से इन शब्दों का प्रयोग ही गलत किया गया है, और ऐसा करना ही दोनों दलों के साथ अन्याय करना है, क्योंकि इन शब्दों से दोनों ही दलों के सिद्धान्तों का स्पष्ट बोध नहीं हो पाता। हिंसा का अर्थ है कि अन्याय के लिए किया गया बल प्रयोग, परन्तु क्रान्तिकारियों का तो यह उद्देश्य नहीं है, दूसरी ओर अहिंसा का जो आम अर्थ समझा जाता है वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धान्त। उसका उपयोग व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। अपने आपको कष्ट देकर आशा की जाती है कि इस प्रकार अन्त में अपने विरोधी का हृदय-परिवर्तन सम्भव हो सकेगा।
एक क्रान्तिकारी जब कुछ बातों को अपना अधिकार मान लेता है तो वह उनकी माँग करता है, अपनी उस माँग के पक्ष में दलीलें देता है, समस्त आत्मिक शक्ति के द्वारा उन्हें प्राप्त करने की इच्छा करता है, उसकी प्राप्ति के लिए अत्यधिक कष्ट सहन करता है,इसके लिए वह बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए प्रस्तुत रहता है और उसके समर्थन में वह अपना समस्त शारीरिक बल प्रयोग भी करता है। इसके इन प्रयत्नों को आप चाहे जिस नाम से पुकारें,परन्तु आप इन्हें हिंसा के नाम से सम्बोधित नहीं कर सकते,क्योंकि ऐसा करना कोष में दिए इस शब्द के अर्थ के साथ अन्याय होगा।”
क्रान्तिकारियों ने अपने पत्र के माध्यम से बहुत साफ किया कि उनकी हिंसा इसलिए हिंसा नहीं है , क्योंकि उसका उद्देश्य देश को आजाद कराना है। उनकी हिंसा का उद्देश्य लोगों को आतंकित करना नहीं है , बल्कि लोगों के लिए खुली हवा में खुली सांसें लेने का प्रबन्ध करना है । क्रान्तिकारियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हम एक उद्देश्य लेकर चल रहे हैं और उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विदेशी सत्ताधारियों से हमें जिस प्रकार भी निपटना होगा , उसी प्रकार निपटेंगे , परन्तु उसे अब किसी भी कीमत पर इस देश में शासक बनाए रखना पड़
पसन्द नहीं करेंगे। जहां तक गांधीजी के सत्याग्रह की बात थी तो इस पत्र के माध्यम से सत्याग्रह पर भी बहुत अच्छा प्रकाश डाला गया :– 

गांधीजी के सत्याग्रह का अर्थ

“सत्याग्रह का अर्थ है, सत्य के लिए आग्रह। उसकी स्वीकृति के लिए केवल आत्मिक शक्ति के प्रयोग का ही आग्रह क्यों ? इसके साथ-साथ शारीरिक बल प्रयोग भी [क्यों] न किया जाए ? क्रान्तिकारी स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए अपनी शारीरिक एवं नैतिक शक्ति दोनों के प्रयोग में विश्वास करता है , परन्तु नैतिक शक्ति का प्रयोग करने वाले शारीरिक बल प्रयोग को निषिद्ध मानते हैं। इसलिए अब यह सवाल नहीं है कि आप हिंसा चाहते हैं या अहिंसा,बल्कि प्रश्न तो यह है कि आप अपनी उद्देश्य प्राप्ति के लिए शारीरिक बल सहित नैतिक बल का प्रयोग करना चाहते हैं, या केवल आत्मिक शक्ति का ?”
वास्तव में हमारे क्रान्तिकारियों का उद्देश्य इस नैतिकता पर आधारित था कि जो व्यक्ति राक्षस प्रवृत्ति से दानवीय अत्याचार करते हुए हमारी स्वतन्त्रता का अपहरण किए हुए है , उसके साथ उसी प्रकार की दुष्टतापूर्ण नीति का ही अनुकरण करना ‘नीति’ है । इसके अतिरिक्त उनकी मान्यता यह भी थी कि अपने किसी भी हिंसक आन्दोलन से जनसामान्य को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिए । वह बहुत सावधानी से केवल और केवल दुष्ट व्यक्ति को या सत्ताधारियों को ही दण्डित करना चाहते थे । युद्ध के बीच उनकी ईमानदारी और नैतिकता यही थी । यही उनकी अहिंसा की परिभाषा थी। इसी को वेद ने भी यह कहा है कि जब केवल दुष्ट के विनाश के लिए हिंसा की जाती हो तो वह हिंसा हिंसा होकर भी हिंसा नहीं होती। वास्तव में हमारे क्रांतिकारियों का यह दर्शन ही उनके ‘बम का दर्शन’ था। उनका मानना था कि जो बम चला रहे हैं उनके लिए हाथ में बम होना चाहिए और जो प्यार की भाषा मानते व समझते हैं उनके लिए हाथ में प्रेम के पुष्प होने चाहिए।

राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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