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इतिहास पर गांधीवाद की छाया ,अध्याय 8 ( 1) बम का दर्शन और हमारा इतिह

इतिहास पर गांधीवाद की छाया , -अध्याय – 8

‘बम का दर्शन’ और हमारा इतिहास

26 जनवरी 1930 ई0 का दिन कांग्रेस के इतिहास में एक ऐतिहासिक दिन के रूप में अंकित है । क्योंकि इसी दिन पंजाब में रावी नदी के किनारे कांग्रेस के अध्यक्ष पंडित नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने झण्डा फहराकर पूर्ण स्वाधीनता का संकल्प लिया था । कांग्रेस के कार्यकर्ता सर्वत्र हर्षोल्लास व्यक्त कर रहे थे और सारी कांग्रेस भी यह संकल्प ले रही थी कि अब हम पूर्ण स्वाधीनता लेकर ही रहेंगे और जब तक हमें पूर्ण स्वाधीनता नहीं मिल जाती है , तब तक हम प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाया करेंगे । 
कांग्रेस इस दिन पूर्ण स्वाधीनता दिवस मना रही थी , जबकि हमारे देश के क्रान्तिकारी भगतसिंह और उनके साथी एक पर्चा बांट रहे थे । यह पर्चा और कुछ नहीं था , भगवती चरण वोहरा नाम के क्रान्तिकारी द्वारा लिखा हुआ और स्वयं सरदार भगतसिंह के द्वारा सम्पादित एक पत्र था । जिसमें गांधी जी और उनकी कांग्रेस की पोल खोली गई थी। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि गांधीजी हमारे महान क्रान्तिकारियों के किसी भी कार्य के समर्थक नहीं थे । उनकी दृष्टि में क्रान्तिकारियों का कार्य हिंसा को प्रोत्साहित करना था । जिसमें उनकी कोई आस्था नहीं थी। यह अलग बात है कि गांधी जी की अहिंसा भी दोगली थी और 1930 ई0 तक वह स्वाधीनता की मांग भी नहीं कर रही थी । जबकि हमारे क्रान्तिकारियों की तथाकथित हिंसा पूर्णतया शुद्ध थी और उसका लक्ष्य पहले दिन से ही देश की पूर्ण स्वाधीनता था। क्रान्तिकारियों की गतिविधियों से असहमत होने के कारण ही गांधीजी अपने इन देशभक्त लोगों की ब्रिटिश अधिकारियों और शासकों से भी अधिक निन्दा किया करते थे।
बात उस समय की है जब 23 दिसम्बर, 1929 को क्रान्तिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तम्भ वाइसराय की गाड़ी को उड़ाने का असफल प्रयास किया था । गांधीजी को क्रान्तिकारियों की ऐसी गतिविधि पसन्द नहीं थीं । यही कारण था कि उन्होंने हमारे महान क्रान्तिकारियों की इस ‘बम संस्कृति’ का विरोध करते हुए गाँधी जी ने इस घटना पर एक लेख ‘बम की पूजा’ लिखा । अपने इस लेख में गांधी जी ने क्रान्तिकारियों की गतिविधियों और उनके उपायों की कटु आलोचना की थी । इतना ही नहीं उन्होंने क्रान्तिकारियों की ऐसी गतिविधियों को स्वतन्त्रता मिलने में एक ‘रोड़ा अटकाना’ माना था और तत्कालीन वायसराय की उन्होंने खुलकर प्रशंसा की थी। गांधी जी यह भूल गए थे कि :- 

आह भरने से नहीं सैयाद पर होता असर, 
टूटता पाषाण है पाषाण के आघात से ।।

गांधी जी के कटु आलोचना से भरे हुए उपरोक्त लेख के प्रति उत्तर में भगवतीचरण वोहरा ने ‘बम का दर्शन’ लेख लिखा । जिसका शीर्षक उन्होंने ‘हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र समाजवादी सभा का घोषणापत्र’ बनाया था । भगतसिंह ने जेल में रहते हुए ही इसको पढ़ा और इसको सम्पादित करने के उपरान्त अन्य क्रान्तिकारियों के माध्यम से जनता में बंटवाने का निर्देश दिया।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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