श्रीलंका में सिंहलों और तमिलों का तनाव ,क्या भारत और श्रीलंका के बीच भी तनाव  पैदा कर सकता है

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डॉ वेदप्रताप वैदिक

महिंदा राजपक्षे के बड़े भाई और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे पहले से ही कह चुके हैं कि हमारी सरकार ‘‘विकेंद्रीकरण की बजाय विकास’’ पर ध्यान देगी। सत्तारुढ़ सिंहल-पार्टी की यह मजबूरी है, क्योंकि श्रीलंका के सवा दो करोड़ लोगों में 75 प्रतिशत सिंहली हैं।

श्रीलंका और भारत के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में काफी उतार-चढ़ाव आए लेकिन अब जबकि श्रीलंका में भाई-भाई राज है याने गोटबाया और महिंदा राजपक्षे क्रमशः राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हैं, आपसी संबंध बेहतर बनने की संभावनाएं दिखाई पड़ रही हैं लेकिन अभी-अभी दाल में कुछ काला दिखाई पड़ने लगा है। महिंदा राजपक्षे कुछ समय पहले तक श्रीलंका के शक्तिशाली राष्ट्रपति के रूप में शासन कर चुके हैं। उन्हें तमिल उग्रवादियों और आतंकियों का सफाया करने का श्रेय दिया गया था। वे सिंहल जनता के महानायक बन चुके थे लेकिन भारत के साथ उनके दो मतभेद थे। पहता तो यह कि उन्हें तमिल-विरोधी माना जाता था। श्रीलंका में तमिलों ने अलग देश बनाने का आंदोलन चला रखा था। उस पर जयवर्द्धन और श्रीमावो बंदारनायक की सरकारें काबू नहीं कर पाई थीं। लेकिन महिंदा राजपक्षे ने उग्र तमिल-विरोधी युद्ध के कारण भारत से भी दूरी बना ली थी।

भारत की सभी सरकारें श्रीलंका के तमिल अल्पसंख्यकों के लिए न्याय की मांग करती रही हैं और उन्हें स्वायत्तता देने का समर्थन करती रहती थीं। इसी कारण भारत का पड़ौसी होने के बावजूद श्रीलंका चीन से नत्थी होता गया लेकिन महिंदा राजपक्षे की सरकार ने अब भारत-प्रथम का नारा दिया है। 26 सितंबर को महिंदा राजपक्षे और नरेंद्र मोदी के बीच वार्तालाप हुआ, वह भारत की नजर से काफी अच्छा रहा लेकिन ताज़ा खबर यह है कि उस बातचीत का जो संयुक्त वक्तव्य निकला है, उसकी बात श्रीलंका सरकार की विज्ञप्ति में से नदारद है। प्रधानमंत्री मोदी ने राजपक्षे से अनुरोध किया था कि वे श्रीलंकाई संविधान के 13वें संशोधन को ठीक से लागू करवाएं यानि तमिलों को संघात्मक अधिकार दें। शक्तियों का विकेंद्रीकरण करें। महिंदा राजपक्षे ने इस पर सहमति जताई, ऐसा दावा हमारे विदेश मंत्रालय ने किया था लेकिन श्रीलंका सरकार के बयान से यह सहमति गायब है।

महिंदा राजपक्षे के बड़े भाई और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे पहले से ही कह चुके हैं कि हमारी सरकार ‘‘विकेंद्रीकरण की बजाय विकास’’ पर ध्यान देगी। सत्तारुढ़ सिंहल-पार्टी की यह मजबूरी है, क्योंकि श्रीलंका के सवा दो करोड़ लोगों में 75 प्रतिशत सिंहली हैं और तमिल सिर्फ 11-12 प्रतिशत हैं। श्रीलंका के तमिल अपने अधिकारों की रक्षा के लिए भारत और खास तौर से तमिलनाडु की तरफ देखते हैं। भारत की पहल पर ही 1987 में जयवर्द्धन-सरकार 13वां संशोधन लाई थी। अब राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे का कहना है कि नया संविधान बनेगा, जिसमें से 13वें संशोधन को हटा दिया जाएगा। 13वें संशोधन के कई प्रावधानों को आज 33 साल बाद भी लागू नहीं किया गया है। यह मामला श्रीलंका के सिंहलों और तमिलों के बीच तो तूल पकड़ेगा ही, यह भारत और श्रीलंका के बीच भी तनाव पैदा करेगा। मोदी और राजपक्षे ने आपसी सहयोग के कई अन्य मुद्दों पर भी बात की थी लेकिन यह तमिल मुद्दा ही दोनों देशों के संबंधों को तय करेगा।

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