हृदय स्वच्छ, कर्म पारदर्शी रखें

निखरने लगेगा व्यक्तित्व अपने आप

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

चेहरा और शरीर मन के भावों, मस्तिष्क के विचारों-कल्पनाओं और सम सामयिक लक्ष्यों को एकदम साफ-साफ और सटीक ढंग से अभिव्यक्ति करता है। जो जैसा सोचता है और करता है वैसा ही उसका शरीर ढल जाता है और चेहरा बता देता है। किसी शिशु के चेहरे को पढ़ने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती, क्योंकि उसके भीतर का आत्म आनंद, निर्विकार मन, स्वच्छ और स्वस्थ शरीर अपने आप सब कुछ कह देता है और यही कारण है कि शिशु का चेहरा लावण्यमय रहते हुए हर क्षण आकर्षण बिखेरता रहता है।

यही स्थिति किसी भी मनुष्य की  बनी रहने पर उसे भी सौंदर्य पाने, चेहरा निखारने के लाख जतन करने और अपने आपको आकर्षक व्यक्तित्व के रूप में ढालने का प्रयास करने के लिए किसी भी प्रकार की मेहनत करने की जरूरत नहीं होती। उस अवस्था में उसका शरीर भी हलका-फुलका रहेगा, चेहरा ओज टपकाने वाला रहेगा तथा व्यक्तित्व में एक अनूठे आकर्षण से परितृप्त मोहक छवि का प्रभाव दिखेगा। लेकिन मायावी संसार में आ चुकने के बाद इंसान का रंग-रूप और कर्म सब कुछ बदल जाता है।

भविष्य की आशंकाओं से हमेशा त्रस्त रहने वाले इंसान के लिए ईश्वर, कुटुम्ब और समाज तथा देश हाशिये पर चले जाते हैं और उनका स्थान ले लेते हैं स्वार्थ, ऎषणाएं और आत्मकेन्दि्रत कर्म। इस वजह से उसकी शुचिता का ग्राफ धीरे-धीरे कम होता चला जाता है और उनका स्थान ले लेती हैं जाने कितनी प्रकार की मलीनताएँ।

जहाँ मलीनता होगी वहाँ तरह-तरह के अंधकार और मकड़जाल अपना प्रभुत्व जमा लेते हैं और रोशनी गायब होने लगती है। यह वह स्थिति होती है जिसमें अपना हृदयाकाश अंधकार के कतरों से भर जाता है, मस्तिष्क में षड़यंत्रों और गोरखधंधों के ताने-बाने हमेशा बुनने लगते हैं, नापाक और घृणित समझौतों के चिमगादड़ हमेशा चक्कर काटने लगते हैं,  मन उन्हीं कल्पनाओं और विचारों में खोया रहता है जो सिर्फ अपनी ही बात करें, अपने ही लाभ के लिए आकार लेने वाले हों।

मन-मस्तिष्क जब मलीनताओं से भर जाते हैं तब इनका सीधा प्रभाव चेहरे और शरीर पर दिखाई देने लगता है। जो व्यक्ति जितना अधिक मलीन, स्वार्थी, भ्रष्ट, कामी और नीच-नालायक होता है, उसके चेहरे से ओज गायब हो जाता है, अजीब सी कालिमा चेहरे पर अधिकार कर लेती है, शरीर बेड़ौल हो जाता है और ऎसे व्यक्ति को दूर से देखने पर लगता है कि कहीं न कहीं जीवन में ऎसा असंतुलन आ गया है कि जेब, बैंक बेलेंस और घर भरने के चक्कर में आदमी का दिल और दिमाग खाली होता जा रहा है।

ऎसे लोग फिर चाहे कितने इंपोर्टेड़ क्रीम मलें, घण्टों ब्यूटी पॉर्लर में बैठे रहें, कुटिल मुस्कान और आडम्बरी चेहरों से प्रसन्नता के भाव झलकायें, मगर यह सब कुछ नकली होता भी है और सामने वाले को इस कृत्रिमता का अनुभव हो भी जाता है।

किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व की थाह पानी हो तो इसके लिए चेहरा, शरीर की बनावट और चलन आरंभिक संकेत होते हैं। जिन लोगों की मनोवृत्तियाँ अपनी ही अपनी ओर केन्दि्रत होती हैं उनका चेहरा अवतल दर्पण की तरह हो जाता है जिसे प्रथम दृष्ट्या देखने पर आभास होता है कि कहीं भीतर अंधकार की ओर जा रहे हैं।

जबकि जिन लोगों का मन-मस्तिष्क शुचिता भरा होता है, जिनकी वृत्तियाँ सेवा-परोपकार और समाजोन्मुखी होती हैं उनका चेहरा उत्तल दर्पण की तरह होता है। ऎसे चेहरों से रूबरू होने पर रोशनी के पसरकर  व प्रतिबिम्बित होकर वापस लौटने का सूक्ष्म अहसास होता है। इसी प्रकार शरीर की बनावट और चाल भी व्यक्तित्व का साफ संकेत देती है।

मलीनता भरे लोगों के शरीर की सँरचना कहीं न कहीं से असामान्य हो ही जाती है। किसी के कंधे या मुँह, सीट आदि थोड़ी एकतरफा हो जाती और चाल में अहंकार को देखा जा सकता है। इन लोगों के हर व्यवहार में कृत्रिमता और बनावटीपन नज़र आता है। कई लोग वाहन पर बैठे हों, वाहन चला रहे हों या कहीं भी चल-फिर-बैठ रहे हों, थोड़े से टेढ़े ही रहते व दिखते हैं। ऎसे लोगों के व्यक्तित्व में कहीं न कहीं टेढ़ापन जरूर होता है जो मन-मस्तिष्क में सूक्ष्म धरातल पर होता है लेकिन शरीर तक पहुंच कर स्थूल रूप ग्रहण कर लेता है।

चेहरे की चमक-दमक और सौंदर्य तथा सेहत की चाहत रखने वाले लोगों को चाहिए कि वे अपने चित्त को शुद्ध रखें, हमेशा प्रयास करें कि मस्तिष्क में वैचारिक मलीनता की धुंध न छाए, षड़यंत्रों और गोरखधंधों में रमे न रहें तथा खान-पान में शुद्धता को अपनाएं, ऎसा कर देने मात्र से हमारा व्यक्तित्व अपने आप चमक-दमक देने वाला हो जाएगा। हृदय और मस्तिष्क की शुचिता के बिना न चेहरे पर तेज आ सकता है, न शारीरिक सौष्ठव ही पाया जा सकता है, और न ही अपने कर्मों की कोई गंध पसर पाती है।

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