माता क्यों कही जाती है-गाय?

राकेश कुमार आर्य
गाय को हमारे यहां माता का सम्मान जनक स्थान प्राप्त है। इसका कारण केवल ये है कि गाय का पंचगव्य हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी है। चिकित्सा शास्त्रों में जहां-जहां भी दूध, घी, दही, छाछ बात कही गयी है, वहीं-वहीं उसका अर्थ गोदुग्ध, गोघृत, गोदधि और गऊ छाछ से लिया जाना चाहिए। इनमें पांचवां गोमूत्र सम्मिलित कर लिया जाए तो पंचगव्य बन जाता है। यह पंचगव्य हमारे लिए कितना उपयोगी है, इसी पर इस लेख में चिंतन करते हैं। लेखक चिकित्सक नही है, यहां पर प्रस्तुत किये जा रहे योग कुछ स्वानुभूत हैं, कुछ अनुभवी लोगों से सुने गये हैं और कुछ विद्वानों से संकलित किये गये हैं। इन्हें हम यहां पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं।
रतौंधी: गौ की खीस (ब्याते ही दो तीन दिन तक जो दूध आता है) नेत्र ज्योति के लिए बहुत उत्तम है। बचपन में हम अपने गांव में देखा करते थे कि जिन लोगों को रतौंधी रोग होता था, उन्हें गाय के ब्याते ही पहली बार निकलने वाला दूध पिलाया जाता था, और चमत्कार होता था कि रतौंधी रोग दो दिन में ही भाग जाता था।
नक्तान्धता (रतौंधी) : काली गाय का मूत्र दो दो बूंद प्रात: सायं 2-3 मास तक निरंतर आंखों में डालने से रतौंधी रोग नष्ट हो जाता है।
नजला : नजला एक ऐसा रोग है, जिसकी पीड़ा केवल वही जानता है जो उसे भोगता है। यह रोग फेफड़ों में बलगम भर देता है, जिससे फेफड़ों में शुद्घ वायु का प्रवेश बाधित हो जाता है। अत: फेफड़े हृदय दुर्बलता का अनुभव करने लगते हैं। दीर्घकाल तक रोग रहने से व्यक्ति की सांस फूलने लगती है। कई बार बलगमी खांसी बन जाती है और व्यक्ति कफ निकालने के लिए इतनी देर तक खांसता है कि कई रोगी तो खांसते खांसते ही चल बसते हैं। ऐसे रोगी यदि गाय का घी नाक से लगभग दो तोला भी पी लें तो यह नजला का रोग एक या दो बार में ही इस योग का प्रयोग करने से शांत हो सकता है। एक वृद्घ व्यक्ति ने यह योग बचपन में बताया था, करके देखा तो परिणाम बहुत ही अच्छा आया।
अतिसार (दस्त): इस रोग के लिए देशी गाय के घी में भुनी हुई 3 ग्राम भांग को शहद में मिलाकर रात्रि में चटाना चाहिए। रोगी को इस दवा से नींद अच्छी आएगी और अतिसार संग्रहणी व अपच रोग में लाभ मिलेगा।
अण्डकोश-वृद्घि:गोमूत्र 120 ग्राम, गूगल शुद्घ 6 ग्राम, अरण्डी का तेल 12 ग्राम इन तीनों को मिलाकर निरंतर एक मास तक पीने से 15-20 दिन में ही रोग ठीक हो जाता है।
रोग अनेक औषधि एक: आधा किलो गो दुग्ध लें। इसमें गेंहूं का दलिया भुना हुआ 25 ग्राम, मूसली सफेद का चूर्ण 10 ग्राम उबालें। जब दलिया गल जाए तब उतार लें। ठण्डा होने पर गोघृत 10 ग्राम और मधु 20 ग्र्र्राम मिलाकर खिला दें। सात दिन तक सेवन कराने से शरीर में बल वीर्य की वृद्घि होती है, और दुर्बलता का नाश होकर तदजनित कई रोगों से मुक्ति मिलती है।
आयुर्वेदिक चाय का योग: गेंहूं के आटे को छानने पर जो चोकर शेष बचता है, उसे चिकित्सकों ने प्राचीनकाल से ही मानव शरीर के लिए अतीव गुणकारी माना है। 10 ग्राम चोकर को एक प्याला पानी में अच्छी प्रकार उबालकर कपड़े से छान लें। फिर इसमें गाय का दूध और मीठा मिलाकर प्रात: सायं चाय की भांति पियें। इसके निरंतर सेवन करने से शरीर सुदृढ़ और शक्तिशाली बनता है। जो लोग अंग्रेजी चाय के आदी हो चुके हैं और उस चाय को पी पीकर अपना स्वास्थ्य और सौंदर्य खो बैठे हैं वो इस योग को अपनाकर गौमाता के उपकारों का भलीभांति अनुमान लगा सकते हैं। यदि इसमें बादाम की पांच गिरियां भली प्रकार रगड़कर मिला दी जाएं तो व्यक्ति पर वृद्घावस्था का प्रभाव नही पड़ता है। बुद्घि तीव्र होती है और स्मरण शक्ति में वृद्घि होती है। नजला, सिर दर्द, जुकाम में भी अत्यंत लाभदायक है। सचमुच सर्वाधिक न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध होने वाला अतीव गुणकारी योग है ये।
गलगण्ड या कण्ठमाला : कायफल को बारीक पीसकर तथा गोमूत्र में मिलाकर लेप करने से प्रत्येक प्रकार की कण्ठमाला ठीक हो जाती है।
कब्ज: त्रिफला, काली हरड़, सनाय, गुलाब के फूल, मुनक्का (बीज निकाला हुआ) बादाम की गिरी, काला दाना, बनफशा सभी वस्तुएं बराबर मात्रा में लेकर कूट पीसकर मिला लें। रात्रि में सोते समय 6 ग्राम दवा गोदुग्ध के साथ सेवन करें। प्रात: दस्त खुलकर आएगा। कुछ दिन तक निरंतर सेवन करने से कब्ज रोग जड़ मूल से नष्ट हो जाएगा।
-प्रतिदिन 15-20 मुनक्के गोदूध में उबालकर खाएं फिर उसी दूध को पीलें। कब्ज रोग बड़ी शीघ्रता से भागता है।
-त्रिफला 50 ग्राम बादाम गिरि 50 ग्राम, सौंफ 50 ग्राम, सोंठ 50 ग्राम, मिश्री 30 ग्राम लें। पहले त्रिफला, सौंफ और सोंठ को बारीक पीसकर छान लें, तत्पश्चात इसमें बादाम गिरि और मिश्री मिलाकर कूट लें। रात्रि में सोते समय 6 ग्राम औषधि गोदुग््र्रध के साथ सेवन करें। इस योग से कब्ज में अत्यंत शीघ्रता से लाभ होता है। मस्तिष्क को भी इस योग से बल मिलता है।
-30 ग्राम उत्तम कास्ट्रायल गरमा गरम गाय के दूध में मिश्री डालकर पिलायें। इस योग से कब्ज और बुखार दोनों ही दूर होते हैं।
पीपली कल्प: छोटी-पीपली 5 दाने आधा किलो गोदूध में डालकर इतना पकाएं कि पीपली नर्म हो जाएं। फिर पीपलों को निकालकर खा लें और दूध में मिश्री मिलाकर पी लें। अगले दिन 3 पीपली बढ़ा दें, और आठ दिन तक निरंतर 3-3 पीपलें बढ़ाते जाएं। नवें दिन से 3-3 पीपलें घटाते जाएं, यहां तक कि 5 पीपली पर आ जाएं।
यह आयुर्वेद की अनुपम और अद्वितीय चिकित्सा मानी गयी है। इसके सेवन से पुराने से पुराना बुखार, खांसी, श्वास, दमा, क्षय रोग, हिचकी, विषम ज्वर, आवाज बिगड़ना, बवासीर पेट का वायुगोला, जुकाम आदि रोग दूर होते हैं। भूख खुलकर लगने लगती है। यह योग दुर्बलों को सबल, पतलों को मोटा बनाता है, तथा जिनके गले की आवाज बिगड़ रही हो उनकी आवाज को भी खोलता है और सुरीली बनता है। आयु और बुद्घि को बढ़ाता है। पीलिया रोग को भी दूर करता है, तिल्ली और दूसरे रोगों को भी शांत करता है। इस औषधि के सेवन काल में दूध (गाय का उत्तम है) और भात के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नही खानी चाहिए। जो लोग अधिक पीपलें नही खा सकें उन्हें केवल दूध ही पिला दिया जाए।
सोंठकल्प : सोंठ उत्तम 2 किलो लेकर कूट पीसकर कपड़छन कर लें। इस चूर्ण में आधा किलो गुड़ और एक किलो गोघृत मिलायें। गाय की थोड़ी सी छाछ भी मिलाकर खूब मलें। फिर किसी चिकने मिट्टी के बर्तन में रखकर उस हांडी को कपड़ मिट्टी कर दें। सूखने पर एक मास तक धान के भीतर दबा दें। एक नित्य खिलायें। छह मास में सारे रोग नष्ट हो जाते हैं।
औषधि सेवन से पूर्व दो तीन दिन जुलाब लेकर पेट साफ कर लेना चाहिए।
कान दर्द : गर्म गो दूध आधा किलो में 20 ग्राम गाय का घी मिलाकर तीन दिन पीने से कान का दर्द दूर हो जाता है।
कोढ़ अथवा कुष्ठ रोग : कोढ़ जैसे घृणित रोग में भी गाय का घृत, दूध या मूत्र किसी न किसी प्रकार उपयोगी सिद्घ होता है। इस रोग के उपचार के लिए मनीषियों एवं अनुभवी सिद्घहस्त लोगों ने निम्नलिखित योग बताये हैं-
-काली हरड़ 30 ग्राम, चित्रा की छाल 30 ग्राम, काली मिर्च 20 ग्राम, मीठा तेलि या शुद्घ 10 ग्राम इन सबको बारीक पीसकर गाय के घी में चिकना कर लें, फिर चौगुना शहद मिलाकर अवलेह बना लें। प्रतिदिन 6 ग्राम दवा गुनगुने पानी के साथ खिलायें प्रत्येक प्रकार के कोढ़ के लिए उत्तम औषधि बतायी गयी है।
– नीम के फूल नीम के पत्ते, निम्बौली, नीम की जड़ प्रत्येक आधा किलो, काली मिर्च, हरड़ की छाल, बहेड़े की छाल, आंवला बावर्ची (गोमूत्र में शुद्घ की गयी) प्रत्येक 250 ग्राम। सबको बारीक पीसकर कपड़ छान लें। प्रतिदिन छह ग्राम दवा मजीठ के जोशांदे के साथ खिलाएं और रोगी को नीम के नीचे सुलाएं। इस दवा के सेवन से भयंकर से भयंकर कुष्ठ चार माह में दूर हो जाना बताया गया है।
– आमला की चूर्ण छह ग्राम 4 ग्राम गोघृत और 8 ग्राम मधु के साथ दिन में तीन बार छह मास तक सेवन करने से महाकुष्ठ भी नष्टï होकर पुन: नवीन नख, दांत और केश प्राप्त होते हैं।
-गिलोय को तिल और गोदुग्ध के साथ सेवन करने से कुष्ठ रोग जड़ से दूर होता है।
– बाबर्ची के बीजों का ऊपर का छिलका हटाकर उसके मगजों के तीन ग्राम चूर्ण को एक किलो गर्म गोदुग्ध में डालकर उसकी दही तैयार कर लें।
अगले दिन दही को मथकर मक्खन निकाल लें। इस मक्खन में शहद मिलाकर चाट लें। ऊपर से उस मठे को पी जाएं।
भयंकर से भयंकर कुष्ठ रोग को भी दूर करने के लिए सर्वोत्तम योग है।
गर्मी से बचाव के लिए पेय: छाछ
गाय का दूध तो अमृत है ही, साथ ही गोदधि और छाछ भी बहुत ही उपयोगी है। गर्मियों में हमारे यहां लोग प्रात:काल दलिया बनाते थे और उस दलिया को गोदुग्ध या गोदधि से बनी छाछ के साथ खाते थे। सारा दिन उनका शरीर गर्मी में कृषि कार्य करने के उपरांत भी ठंडा रहता था। शरीर को प्राकृतिक रूप से वातानुकूलित बना देता था गोदधि या छाछ। आजकल प्रात:काल में हम चाय लेते हैं जो हमारे जैसे गर्म देश के लोगों के शरीर में अनावश्यक गर्मी या उत्तेजना उत्पन्न करती है, जिससे उच्च रक्तचाप, एसिडिटी अपच, अनिद्रा जैसी व्याधियां इस देश के लोगों को घेर रही हैं।
हमें अपनी गोमाता के गुणों से परिचित नही कराया जा रहा है। क्योंकि हमारी सरकार ने बड़ी कठिनता से जिस गोमांस निर्यातक देश का स्थान प्राप्त किया है, इससे वह उससे छिन सकता है। हमें सब्सिडी चाहिए और सरकार हमारे भविष्य को उजाड़कर या उसे दांव पर लगाकर हमें सब्सिडी देती है। हम प्रसन्न हो जाते हैं कि हमें सब्सिडी मिल रही है-पर यह नही देखते कि यह सब्सिडी कितना मूल्य चुकाकर प्राप्त की गयी है? हमें सोचना चाहिए कि धन सरकार के घर में नही बनता है। वह धन एकत्र करती है जनता से राजस्व करों के माध्यम से।
जब जनता कहीं किसी प्रकार से सब्सिडी मांगती है, तो देश के नेता लोग ऐसी युक्ति निकालते या खोजते हैं कि धन संग्रह भी कर लिया जाए और जनता को पता भी नही चले। बस, इसी युक्ति को फलीभूत करने के लिए देश से गोमांस निर्यात किया जा रहा है। आने वाले 50 वर्ष में हमारा स्वास्थ्य हमारी कृषि, और हमारी अर्थव्यवस्था गोवंश के नाश होने पर सर्वनाश को प्राप्त हो जाएगी। तब हमें पता चलेगा कि सब्सिडी कहां से दी जा रही थी? इसलिए देश की जनता को समय रहते सावधान होना चाहिए। गोमांस निर्यातक देश का स्थान प्राप्त करना भारत जैसे गोभक्त देश के लिए लज्जा का विषय है। प्रकृति प्रदत्त इस अनमोल प्राणी की रक्षार्थ न सही हम अपने भविष्य की रक्षार्थ ही सही, जितनी शीघ्रता से उठ खड़े हों उतना ही लाभकारी है।

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