ईश्वर ने सृष्टि की उत्पत्ति क्यों की ?

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ब्रह्म ने अपने अंदर व्याप्य प्रकृति और परमाणु से स्थूल जगत को बनाकर बाहर स्थूल रूप कर और आप उसी में व्यापक होकर साक्षी भूत आनंदमय हो रहा है। जब जगत उत्पन्न होता है तभी जीवों के विचार, ज्ञान ,ध्यान, उपदेश श्रवण में परमेश्वर प्रसिद्ध और बहुत स्थूल पदार्थों से सह वर्तमान होता है ।लेकिन जब प्रलय होता है तब परमेश्वर और मुक्त जीवों को छोड़कर उसको कोई नहीं जानता।
सृष्टि के अंत से जब तक दूसरी बार सृष्टि नहीं होगी तब तक भी जगत का कारण सूक्ष्म होता है। सृष्टि से पहले यह जगत अंधकार से आवृत था और प्रलय के पश्चात भी ऐसा ही होता है ।उस समय न किसी के जानने में ,न तर्क में लाने और न प्रसिद्ध चिह्नो से युक्त इंद्रियों से जानने योग्य होता है और न होगा।

सृष्टि का प्रयोजन

“ईश्वर के अंदर जगत की रचना करने का विज्ञान ,बल और क्रिया है ।ईश्वर के न्याय , धारण, दया आदि गुण भी तभी सार्थक हो सकते हैं जब वह जगत को बनावे। उसका अनंत सामर्थ्य जगत की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और व्यवस्था करने से ही सफल है। इसलिए ईश्वर जगत की रचना किया करता है।”
( ‘सत्यार्थ प्रकाश’ अष्टम समुल्लास )
इससे स्पष्ट हुआ कि जगत की उत्पत्ति , स्थिति और प्रलय करने से जगत पिता की सामर्थ्य ,बल एवं क्रिया की जानकारी होती है।
यह ब्रह्मांड ,यह सारी सृष्टि ईश्वर की बनाई हुई है। परमात्मा ने इतने बड़े ब्रह्मांड को प्रकृति से बनाया है। परंतु इसमें आत्मा परमात्मा का ही अंश है। मुक्त अवस्था में आत्मा परमात्मा के साथ विचरण करता है और मन आत्मा से अलग हो जाता है, क्योंकि मन प्रकृति जन्य है।

परंतु इस प्रकार के संसार में परमात्मा का क्या महत्व है ? सृष्टि की उत्पत्ति कैसे करता है ईश्वर?
परमात्मा ब्रह्मा की शक्ति बनकर संसार को उत्पन्न करता है । परमात्मा के सृष्टि रचने में सामर्थ्य होने के कारण ही ब्रह्मा कहते हैं। परमात्मा स्वयं सृष्टि की स्थापना करता है ।प्रश्न पैदा होता है कि कैसे बनाता है? और किस पदार्थ से बनाता है ? इसके लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहेंगे कि जैसे यज्ञ का ब्रह्मा यज्ञशाला में विराजमान होकर अपने शरीर से अतिरिक्त भिन्न द्रव्यों का आयोजन यज्ञ के लिए करता है और कराता है । यज्ञवेदी को रचाता है तो यजमान उससे भिन्न होते हैं। इसी प्रकार से मूल प्रकृति को महत्व प्रदान करके सृष्टि उत्पन्न करता है। यह प्रकृति प्रलय काल में अव्यक्त रूप में अर्थात शून्य रूप में थी ।उसी सूक्ष्म रूप प्रकृति को महतत्व रूप में परिवर्तित करके, इसमें प्राण प्रदान करके, तथा क्रिया पैदा करके, तन्मात्राओं को पैदा करता है । तन्मात्रा से यह पंचभूत और पंच भूतों से यह संसार बनता है। महान परमात्मा ने इस सूक्ष्म और महान प्रकृति से संसार को बनाया है। हमारे शरीरों को बनाया है। अनेक प्रकार के विषय सूक्ष्म रूप से हैं।
परमात्मा को शून्य या अव्यक्त प्रकृति को चेतन में लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी ? परमात्मा ने यह सब सृष्टि किसके लिए बनाई ?
यह सर्व सिद्ध है कि परमात्मा तो पूर्ण है ।इस पर दो मत नहीं है । परमात्मा को स्वयं संसार में आने की अथवा यह संसार बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है,? जैसे एक माता अपनी लोरियों में बालक को जीवनदान करती है ।उसी प्रकार हम आत्माओं के लिए परमात्मा ने इस सृष्टि को उत्पन्न किया है ।प्रलय के समय यह सारी सृष्टि और सारे जीव उस परमात्मा के गर्भ में होते हैं। इसलिए यह परमात्मा के ही सब अंश हैं।
परमात्मा हमारे लिए सृष्टि को उत्पन्न करता है। क्योंकि हम उसमें कर्म करने के लिए तत्पर हो रहे हैं। जैसे मुक्ति के पश्चात आत्मा पुनः संसार में आकर कर्म करना चाहती है। निष्कर्ष आता है कि यह संसार ईश्वर ने हम आत्माओं के लिए बनाया है। मानव के लिए, आत्मा के लिए ही परमात्मा ने संसार को बनाया है। यह मनुष्य को अच्छी प्रकार जान लेना चाहिए।आत्मा को कर्म करने के लिए बनाया है। जिससे कि आत्मा शुभ कर्म करें, और पुनः मोक्ष को प्राप्त हो। यदि इस संसार में आकर के परमात्मा की बनाई हुई संपूर्ण सृष्टि में अच्छे कर्म नहीं करेंगे तो हमारे जैसा मूर्ख और कोई नहीं होगा, हमारे जैसा अज्ञानी और कोई नहीं होगा। इसलिए मानव को इस संसार क्षेत्र में आकर अच्छा कर्म करना चाहिए।
संसार में हमारे दो प्रकार के कार्य होते हैं एक आध्यात्मिक कर्म दूसरे भौतिक कर्म। इन दोनों को ही समयानुसार और उचित मात्रा में मनुष्य को करना चाहिए, लेकिन आज का मानव तो केवल भौतिक कार्यों में ही उलझ कर रह गया है ।आध्यात्मिक कर्मों को त्यागता जा रहा है। भौतिक उन्नति के साथ_ साथ आध्यात्मिक उन्नति भी की जाए ।केवल उदर पूर्ति तक ही सीमित न रह जाएं।

आत्मा का भोजन

यह मनुष्य भौतिक शरीर के लिए भौतिक पदार्थों का उदर पूर्ति के लिए बहुत प्रबंध करता है। परंतु जो शरीर में आत्मा विराजमान है उसके भोजन का प्रबंध करना प्राय:भूल जाता है। आत्मा का भोजन सत्संग है। आत्मा का भोजन वेद के वाक्यों को पाना ,श्लोकों का,मंत्रों का अध्ययन करना है। आत्मा का भोजन परमात्मा का विचार करना है। आत्मा का भोजन ज्ञान है।
जब मनुष्य भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार का कर्म करता है तो उसके जीवन का विकास बहुत अल्प समय में हो जाता है। परंतु संसार में रहते उदर पूर्ति भी कर ले और आध्यात्मिक कार्य भी कर ले यह कैसे संभव हो पाता है?
हमारे जीवन के चार भाग हो सकते हैं । उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति धन उपार्जन करता है तो उस को चार भागों में बांट लेना चाहिए। एक भाग उन्हें देना चाहिए जिनसे उसने लिया है अर्थात माता-पिता से बचपन में लिया था ।जब हमारा पालन – पोषण उन्होंने किया था ।एक भाग उनको देना चाहिए ।
दूसरा भाग वेदों के विद्वान और वेदों का प्रचार करने वाले सदाचारी ब्राह्मणों, अतिथियों, और महान योगियों की सेवा में देना चाहिए । यह दिया हुआ परलोक में काम आता है। तीसरा, संसार के व्यक्तियों को देना चाहिए जो आवश्यकतानुसार वापस लिया जा सकता है। इसको हम उधार की श्रेणी में भी रख सकते हैं।
चौथा भाग अपने लिए और अपनी पत्नी के लिए रखना चाहिए। जिससे कि आनंद में रहें। सुख पूर्वक रहें। हमारे जीवन का उद्देश्य परमात्मा को पाना है।
प्रलय के समय जगत और परमात्मा कहां रहते हैं ?
प्रलय काल में संसार के समस्त पदार्थ परमाणु रूप में बदलकर ये परमाणु अंतरिक्ष में रमण करते हैं।
सृष्टि के प्रारंभ में अव्यक्त अथवा शून्य प्रकृति को दिया हुआ महतत्व परमात्मा में रमण कर जाता है ।यह महान व सामान्य कार्य परमात्मा कर रहा है। वह सर्व संसार को चला रहा है ।जब प्रलय काल आता है तब परमात्मा स्वयं महान प्रकृति को शून्य रूप में अर्थात अव्यक्त रूप में अपने गर्भ में धारण कर लेता है। तब व्यापक परमात्मा इसको गर्भ में धारण करके पूर्ववत ही रमण करता रहता है। जैसे एक माता अपनी संतान को अपने गर्भ में धारण करती है ।वैसे ही माताओं की माता दुर्गा (दुर्गा यहां ईश्वर की शक्ति को कहा गया है) सारी प्रकृति को और सारे जीवों को अपने गर्भ में धारण करके प्रकृति को आश्रय दे करके फिर से उसके शिथिलता का, उस की निर्बलता का हरण करके उसमें कार्य करने की शक्ति को फिर से स्थापित कर देती है।
स्पष्ट किया जाता है कि लाखों , करोड़ों वर्षों तक सृष्टि के चलते रहने से उसमें शिथिलता एवं निर्बलता आ जाती है। इसी शिथिलता और निर्बलता को दूर करने के लिए प्रलय करना परमात्मा को आवश्यक हो जाता है अर्थात मनुष्य एवं अन्य प्राणधारी अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं । तब सृष्टि में निर्बलता आ जाती है। वह परमात्मा इस संसार को प्रकृति से बनाता है जो शून्यरूप में , परमाणु रूप में उसके गर्भ में स्थित होती है।
ईश्वर को विश्वकर्मा भी कहते हैं। प्रभु ने सर्वप्रथम इस संसार को महतत्व दिया तथा तन्मात्राओं के द्वारा इस संसार को उत्पन्न किया। इसके बाद पृथ्वी में धीरे धीरे शीतलता आने लगी और समता आने लगी । तन्मात्राएं और पंचभूत इन सबका संगठन बनाकर के सृष्टि का कार्य चलने लगा। फिर परमात्मा ने मनुष्य के लिए वनस्पतियों का निर्माण किया। जिसे स्थावर सृष्टि कहते हैं। इसी स्थावर सृष्टि में अनेक प्रकार की औषधियां व पौष्टिक पदार्थ मानव के जीवन निर्वाह के लिए ईश्वर ने दी हैं। प्रकृति में जो है वह इसमें स्वत: ही पूर्व की भांति सब बीजरूप में अंकुर रहता है। जैसे वट वृक्ष का एक सूक्ष्म सा बीज होता है ।लेकिन जब उगता है तो महान वृक्ष बन जाता है। परमाणु रूप में ,बीज रूप में ईश्वर सबको धारण करता है। जो ईश्वर ने अपनी महत्वता और अपनी चेतन सत्ता से रचाया।
वृक्ष योनि के बा द अंडज सृष्टि उत्पन्न किया । जिसको हम उदभिज सृष्टि भी कह सकते हैं। जल में रहने वाले जीवधारी भी मनुष्य के लिए बहुत उपयोगी होते हैं , इसलिए मनुष्य से पहले वह पैदा किए। मगरमच्छ जल में रहते हुए वहां के गंदगी को दूर करता है,जल को शुद्ध करता है ।वह मृतक शरीरों को भी अपना आहार बना लेता है अर्थात उससे जल की शुद्धि होती है। इसके अलावा जूं आदि ऐसे प्राणी है जो पसीने से पैदा होते हैं , उन्हें हमारे पूर्वजों ने स्वेदज कहा है।
इसके पश्चात ईश्वर ने जरायुज सृष्टि का निर्माण किया। जिसे जंगम सृष्टि भी कह सकते हैं। इसमें नाना जातियां हैं , जैसे पशु गाय बैल भैंस आदि।
इसके बाद मानव संरचना हुई। उदाहरण के तौर पर हम यह सोचते हैं कि एक बेल के ऊपर फल लगता है परंतु जब वह कच्चा होता है तो बेल से बहुत ही शक्ति से जुड़ा रहता है परंतु परिपक्व हो जाने पर वह बेल से स्वयं पृथक हो जाता है इसी प्रकार इस पृथ्वी से मानव जाति का अंकुर उत्पन्न होने के पश्चात इसका संबंध नाभि के द्वारा होता है ।और यह माता पृथ्वी से रस लेता रहा ।जैसे वृक्ष और नाना योंनियां उत्पन्न हुईं । माता पृथ्वी और पिता प्रभु दोनों की समता हो करके सृष्टि का निर्माण हो जाता है । अपनी महान कारीगरी से उस प्रभु विश्वकर्मा ने इस संसार को रचा है।इनमें सब उत्पन्न हुए।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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