‘उगता भारत’ का संपादकीय : ऐतिहासिक तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में भारत – नेपाल सीमा विवाद

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चीन प्रारंभ से ही भारत को एशिया में दबाकर रखना चाहता रहा है । विश्व का नेतृत्व अपने हाथों में लेने के लिए वह हरसंभव यह प्रयास करता है कि भारत किसी भी रूप में उभरने न पाए । इसके लिए उसने पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध हर समय उकसाने में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी है । अब जबकि सारा विश्व चीन उत्पादित कोरोना महासंकट से जूझ रहा है , तब चीन ने भारत के साथ ‘रोटी – बेटी’ का संबंध रखने वाले नेपाल को भी भारत के सामने सीना ठोककर खड़ा होने के लिए पीछे से उकसा दिया है । यद्यपि चीन दिखावे के रूप में यह कह रहा है कि नेपाल और भारत के बढ़ते विवाद से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है और यह इन दोनों देशों के बीच का मामला है । जिसे वह जैसे चाहे सुलझा लें । परंतु यह सभी जानते हैं कि चीन की कथनी और करनी में कितना अंतर होता है ? वह बहुत बड़ा ‘पाप’ करके भी चेहरे पर मुस्कान बनाए रखने में माहिर देश है।

वास्तव में इस समय भारत और नेपाल की सरकारें लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी के स्‍वाम‍ित्‍व को लेकर आमने-सामने हैं। भारत के सड़क बनाए जाने के बाद अब नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने घोषणा की है क‍ि इन क्षेत्रों को भारत के कब्‍जे से वापस कराया जाएगा। केपी शर्मा ओली के बारे में सभी जानते हैं कि वह चीन की गोद में क्यों बैठना पसंद करते हैं और वह भारत से क्यों दूरी बनाए रखने में विश्वास रखते हैं ? उनके नेतृत्व में नेपाल जिस मार्ग पर चल पड़ा है वह उसके आत्मविश्वास का रास्ता है , इसीलिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि नेपाल तिब्बत के हश्र को ध्यान में रखकर आगे बढ़े।
नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भारत को आंख दिखाते हुए कहा है कि भारत ‘सिंहमेव जयते’ की राह पर चल रहा है। श्री शर्मा के इस व्यंग्य से उनके भारत के प्रति दृष्टिकोण का पता चलता है।
वास्तव में काला पानी एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर भारत , नेपाल और चीन की सीमाएं मिलती हैं । यह वैसा ही है जैसा कि डोकलाम में भारत , भूटान और चीन की सीमाएं मिलती हैं । यह क्षेत्र ऊंचाई पर स्थित है और भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है । यही कारण है कि चीन इस क्षेत्र से भारत को विदा करने की युक्तियां खोजता रहता है। भारत के सैनिक यहां पर ऊंचाई पर होने के कारण चीन के किसी भी शत्रुतापूर्ण कार्य को पूर्ण नहीं होने देते हैं और उस पर अपनी गहरी और पैनी नजर बनाए रखते हैं । चीन यदि नेपाल को उकसाकर इस क्षेत्र को नेपाल को दिलवाने में सफल हो जाता है तो स्पष्ट है कि वह इस क्षेत्र पर फिर अपना कब्जा करेगा । जिससे भारत के लिए समस्याएं बढ़ेंगी ।
यही कारण है कि भारत भी अपने लिए सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र को छोड़ने के लिए कभी तैयार नहीं होगा । जहां तक नेपाल की बात है तो वह चीन के इशारे पर चाहे कितने ही भड़काऊ बयान दे ले या कितनी ही राजनीतिक उठा पटक कर ले , उसका उसे कोई लाभ नहीं होने वाला। भारत के लोग आज भी नेपाल के लोगों को अपना भाई समझते हैं और उनके साथ मित्रतापूर्ण बर्ताव करने को ही प्राथमिकता देते हैं । निश्चय ही केपी ओली की सरकार नेपाल और भारत के इन सांस्कृतिक संबंधों को इस समय दांव पर लगा रही है। जिससे नेपाल के अस्तित्व और संप्रभुता के लिए भविष्य में संकट खड़ा हो सकता है।
भारत और नेपाल के वर्तमान सीमा विवाद का बीजारोपण सन 1816 की सिंगोली की संधि में हुआ था जब अंग्रेजों ने पराजित नेपाल के साथ यह संधि की थी । जिसमें उन्‍हें सिक्किम, नैनीताल, दार्जिलिंग, लिपुलेख, कालापानी को भारत को देना पड़ा था।अंग्रेजों ने बाद में कुछ भूभाग नेपाल को लौटा द‍िया। उस समय तराई का क्षेत्र भी अंग्रेजों ने नेपाल से हथिया लिया था । पर जब 1857 की क्रांति के समय नेपाल के तत्कालीन राजा ने भारत के क्रांतिकारियों का साथ न देकर विदेशी शासक अंग्रेजों का साथ दिया तो क्रांति के बाद अंग्रेजों ने उसे पुरस्कार देते हुए तराई का यह क्षेत्र लौटा दिया था । अंग्रेजों ने ऐसा करके नेपाल के साथ भारत के भविष्य के विवाद को बढ़ाने की नींव रखी । क्योंकि सच यह था कि तराई के क्षेत्र में भारतीय मूल के लोग रहते थे । जिनका अपने देश भारत से आत्मीय लगाव था । उन्हें नेपाल की गोद में देना निश्चय ही एक अन्याय था।
इसके उपरांत भी नेपाल में अधिकारियों में एक ऐसा वर्ग है जो सन 1816 में हुई सिंगोली संधि के लिए भारत को ही आज तक जिम्मेदार मानता है । यद्यपि वह अंग्रेजों के द्वारा दोनों देशों के बीच दरार डालने की एक ऐसी कूटनीतिक संधि थी जिससे भारत के नहीं बल्कि अंग्रेजों के हित सधते थे। परंतु नेपाल के कई अधिकारी उसके लिए भारत को दोषी मानते हैं ।चीन अब इस कूटनीतिक संधि को हवा देकर दोनों देशों के संबंधों को और अधिक बिगाड़ने का काम कर रहा है।
यदि इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो पता चलता है कि 1803 में नेपाल में 8.5 रिएक्टर स्केल का एक विनाशकारी भूकंप आया था । जिससे सारा गढ़वाल क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ था । गढ़वाल के उस प्राकृतिक विनाश का लाभ उठाते हुए अमरसिंह थापा और हस्तीदल चौतरिया के नेतृत्व में नेपाली सेना ने गढ़वाल पर हमला कर दिया और कुछ हिस्सों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया ।
तब गढ़वाल नरेश प्रद्युम्नशाह ने अपनी सेना को एकत्र किया और नेपाली गोरखाओं पर अपनी ओर से प्रबल आक्रमण कर दिया । 14 मई 1804 को देहरादून के खुड़बुड़ा के मैदान में यह युद्ध हुआ था। जिसमें राजा प्रद्युम्न शाह वीरगति को प्राप्त हो गए थे। कुमायूं और गढ़वाल पर नेपाली गोरखाओं का अधिकार स्थापित हो गया।
राजा प्रद्युम्न शाह के पश्चात उनके पुत्र सुदर्शनशाह ने गद्दी संभाली तो उसे अपने पिता की यह अपमानजनक पराजय कुरेदती रही । फलस्वरूप उसने वारेन हेस्टिंग्स की सहायता मांगी । अंग्रेजों ने 1815 में गढ़वाल को गोरखाओं से स्वतंत्र करा लिया। पर कुमायूं अभी भी स्वतंत्र नहीं हो सका था। फलस्वरूप उसे स्वतंत्र कराने के लिए फिर एक आक्रमण अंग्रेजों ने किया । 27 अप्रैल 1815 को कर्नल गार्डनर और नेपाली गोरखा शासक बमशाह के बीच एक संधि हुई ।
उस संधि के अंतर्गत कुमायूं की सत्ता अंग्रेजों को सौंप दी गई । 28 नवंबर 1815 को बिहार के चंपारण जिले के सिंगोली में अंग्रेजों और गोरखाओं के मध्य यह संधि संपन्न हुई । जिसे प्रारंभ में तो नेपालियों ने मानने से मना कर दिया पर जब अंग्रेजों ने फरवरी 1816 में काठमांडू पर हमला कर दिया और नेपालियों को करारी पराजय दी तो मार्च 1816 में नेपाल ने इस संधि को मान्यता प्रदान कर दी।
नेपाल को उसके नियंत्रण वाले भूभाग का एक तिहाई भाग ब्रिटिश सेना को सौंपना पड़ा । साथ ही उसने एक रेजीमेंट काठमांडू में रखना भी स्वीकार कर लिया। काली नदी के पश्चिम का क्षेत्र नेपाल के राजा ने ब्रिटिश सरकार को देना भी स्वीकार कर लिया अर्थात काली नदी जिसे भारत में शारदा नदी के नाम से पुकारा जाता है के पश्चिम का क्षेत्र ब्रिटिश इंडिया का और काली नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल का होगा , ऐसा प्रावधान इस संधि में कर दिया गया । जिस पर दोनों देश सहमत हो गए। परंतु संधि में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था कि नदी यदि अपने प्रवाह को बदलती है तो स्थिति क्या होगी ? बस उस समय नदी जहां बह रही थी, उसके पूर्व का क्षेत्र किसका और पश्चिम का क्षेत्र किसका है ? – इस व्यवस्था को लागू कर रही थी । इसका अभिप्राय था कि भविष्य में नदी चाहे अपना प्रवाह बदले पर जो क्षेत्र आज जिस देश को दे दिए गए हैं , भविष्य में वही क्षेत्र उसी देश के रहेंगे।
अब नेपाल ने चीन के इशारे पर भारत से पंगा तो ले लिया है पर पंगा लेने के और नक्शा संबंधी संसदीय प्रस्ताव पास करने के पश्चात उसे यह बुद्धि आई है कि पहले एक कमीशन यह जांच करे कि कालापानी पर उसका अधिकार किन प्रमाणों के आधार पर है ? यदि एकमात्र प्रमाण सिंगोली संधि को नेपाल लेकर चलता है तो उसकी पराजय निश्चित है । परंतु इसके उपरांत भी हमारे दोनों देशों के नागरिक एक दूसरे से कितनी दूर चले जाएंगे या दोनों देशों के संबंधों में आई खटास का भविष्य पर क्या परिणाम होगा ? इसकी भरपाई करना सचमुच बड़ा कठिन होगा। दोनों देशों को ही अपने परंपरागत रोटी बेटी के रिश्तों के दृष्टिगत बहुत विवेक से काम लेना चाहिए और ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहिए जिससे आने वाली पीढ़ियों को उसके परिणाम भुगतने पड़े।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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