हल्दीघाटी का युद्ध और उसके बाद की परिस्थितियां

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‘तबकाते अकबरी’ के लेखक का मानना है कि महाराणा प्रताप ने 1572 ई. में जब मेवाड़ का राज्यभार संभाला था तो अकबर ने उन्हें समझा-बुझाकर अपने दरबार में बुलाने का प्रयास किया था। अकबर ने महाराणा को समझाने – बुझाने के लिए चार बार अपने दूत भेजे थे। इन दूतों में पहला व्यक्ति अकबर का अतिविश्वसनीय सरदार जलाल खां कोची था, जिसे अकबर ने भीलवाड़ा के बागौर नामक स्थान से सितंबर 1572 ई. में भेजा था। परंतु वह निराश होकर 21 नवंबर 1572 ई. को लौट आया। राजा मानसिंह और महाराणा प्रतापसिंह 1573 ई. में कछवाहा राजा मानसिंह के नेतृत्व में एक दूतमंडल गठित करके महाराणा के पास भेजा गया, परंतु इस दूत मंडल को भी निराश होकर ही लौटना पड़ा था। इस दूतमंडल की महाराणा प्रताप ने स्वयं अगवानी की थी, परंतु उस दूतमंडल की शर्तों से वह सहमत नही हो पाये। अंत में इस दूत मंडल के साथ महाराणा की अनबन हो गयी।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मानसिंह स्वयं ही महाराणा से मिलने के लिए उस समय गया था, जब वह एक विजय अभियान से लौट रहा था। कहा जाता है कि महाराणा ने उससे मिलने से इंकार कर दिया था और अस्वस्थ होने के कारण उसके साथ भोजन करने के लिए अपने पुत्र अमर सिंह को भेज दिया था। इस भोज का आयोजन उदयसागर झील के किनारे किया गया। मानसिंह के बार-बार आग्रह के पश्चात भी जब महाराणा उसके साथ भोज के लिए उपस्थित नही हुए तो वह मारे क्रोध के बिना खाना खाये ही यह कहकर चल दिया था कि मैं शीघ्र ही महाराणा के सिरदर्द की औषधि लेकर उपस्थित होऊंगा। महाराणा प्रतापसिंह मानंसिह के इस कथन को सुन चुके थे, इसलिए उन्होंने मानसिंह से कह दिया कि -‘अपने फूफा (अकबर को) को भी मालिश के लिए साथ ले आना।’
महाराणा के इस कथन ने जलती आग में घी का काम किया था। जिसने युद्घ की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। हमारा मानना है कि यहां महाराणा प्रताप से कूटनीतिक भूल हुई थी। उन्हें मानसिंह को अपने साथ लाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए था, और उसको राजपूती परंपरा से परिचित कराते हुए, साथ ही स्वतंत्र भारत कराने की अपनी योजना से अवगत कराते हुए स्वतंत्रता के लिए साथ मिलकर काम करने की बात करनी चाहिए थी। यदि वह नही मानता तो भी उससे अपशब्द अपने स्तर पर प्रयोग नही करने चाहिए थे। परंतु जो कुछ भी हुआ वह महाराणा ने अति उत्साह और स्वाभिमान के अतिवादी प्रदर्शन के वशीभूत कर दिया। फलस्वरूप युद्घ अब निकट आ गया।

महाराणा को ‘समझाने’ का तीसरा प्रयास अकबर नामा (भाग 3 पृष्ठ 89) के लेखक अबुल फजल के अनुसार-‘‘अकबर ने अपना तीसरा दूतमंडल 1573 ई. में अहमदाबाद से राजा भगवानदास के नेतृत्व में ईडर के मार्ग से भेजा था। उस दूतमंडल को यह स्पष्ट आदेश दिया गया था कि वह राणा के देश के विरोधी तत्वों को दबाते हुए उन्हें उचित दण्ड दे। राणा के साथ कैसा बर्ताव किया जाए? संभवत: अकबर यह बतलाना भूल गया था।’’ इस दूतमंडल को जिस प्रकार के कठोर कार्यवाही के आदेश दिये गये थे, उनसे स्पष्ट है कि इसे कुछ अधिक अधिकारों से युक्त करके महाराणा प्रताप के पास भेजा गया था। अकबर यह स्पष्ट करना चाहता था कि यदि प्यार से महाराणा प्रताप अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार नही होते हैं तो उनके विरूद्घ शक्ति का प्रयोग भी किया जाएगा। महाराणा प्रतापसिंह को जब इस दूतमंडल की जानकारी मिली तो उन्होंने इस दूतमंडल का भी आगे बढक़र स्वागत किया और सम्मान पूर्वक उनसे चर्चा की। उन्हें अपने निवास स्थान गोगूंदा में पूर्ण सम्मान के स्थान टिकाया भी। राजा भगवानदास जो कि इस दूत मंडल का नेतृत्व कर रहे थे महाराणा के सेवाभाव से अभिभूत भी हुए। पर महाराणा प्रताप ने पुन: स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्रता से कोई समझौता नही हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में केवल मानसिंह और महाराणा प्रताप की मुलाकात को ही 1576 के हल्दीघाटी युद्ध एकमेव कारण नहीं माना जा सकता।
हल्दीघाटी युद्ध के विषय में हम पूर्व में ही प्रकाश डाल चुके हैं अब हम इस युद्ध के बाद की परिस्थितियों पर थोड़ा विचार करते हैं । क्या आपने कभी सोचा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ ? इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा , क्योंकि वही हिन्दू साहस और शौर्य के प्रतीक हैं।इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई । ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक ‘अकबरनामा’ में दर्ज है।
क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना..महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सीमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलों के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था। मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके । हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ ? – वह हम बताते हैं।
हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे..और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था । उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायी और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में स्थापित नहीं होने दिया । महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर वर्ष 1577 से 1585 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में पूर्णरूपेण असफल रहे।
हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए । इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी । बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी आरम्भ की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी।
उसके बाद आरम्भ हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है. इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया गया है।
बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महाराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया । उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे । कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है । ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं । कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे।
दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारों की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारों , बरछों , भालों और कटारों से बींध दिए गए। युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया। उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।
महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है । ये घटनाएं मुगलों को भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया। दिवेर के युद्ध ने मुगलों का मनोबल इस तरह तोड़ दिया कि जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनाये अपने सारे 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक कि मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातोंरात खाली कर भाग गए।
दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ कोछोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए।
अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानों पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मंगाई जाती थी।
दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलों के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतों ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलों में ऐसे भय का संचार कर दिया कि अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए।
इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली ।अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा , लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने का ही डर था कि वह सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया।

ये इतिहास के वे स्वर्णिम पृष्ठ हैं – जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है। जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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