मनुष्य जीवन का वास्तविक ध्येय और अज्ञान रूपी अंधकार

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भौतिक भवन अथवा काया की हवेली के विनष्ट,ध्वस्त अथवा ढहने के साथ ही मनुष्य की सारी उपलब्धियां सारी योजनाएं , सारी इच्छाएं एवं वास्तविक ध्येय समाप्त हो जाते हैं। जिन योजनाओं को दृष्टिगत रखकर मनुष्य अपनी कामना, महत्वाकांक्षाओं व अपेक्षाओं की नींव रखता है ,मोह जाल को बुनता है ,अपने वास्तविक ध्येय से विमुख होकर दुष्ट प्रयोजनों के मकड़जाल में फंसकर ईश्वर को भूलकर
अपने जीवन को बर्बाद करता है वे धरी की धरी रह जाती हैं । इसलिए अंत समय मे तड़पता है। क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य का जीवन जब दिया था तो इस संसार रूपी रंगमंच पर अपना कल्याण श्रेष्ठ कार्यों के माध्यम से करते हुए जगत के कल्याण के हितों के रचनात्मक कार्य करने के लिए प्रेरित करके भेजा था।
लेकिन इसके विपरीत करने लगा और वास्तविक ध्येय से भटक गए। जगत का कल्याण और अपना कल्याण यह दोनों ही मनुष्य भुला देता है और इसीलिए कौड़ी के मोल बिक जाता है। सत्कर्म, परमार्थ, परोपकार ,दया सौहार्द ,सत चिंतन, मूल्य, आदर्श का रथ द्वेष, घृणा, वैमनस्यता, हिंसा, शोषण, अनाचार के विचारों के कीचड़ में फंस जाता है।
इस दिव्य व भव्य स्वर्गसम सृष्टि को वैचारिक कलुषता से नारकीय मनुष्य ने बना दिया । क्योंकि मनुष्य ने परम पिता परमेश्वर से किए गए सत्कर्म के अनुबंध के मूल उद्देश्य को ही भुला दिया । जीवन के मूल उद्देश्य को पहचान लेना ही जीवन को सफल बनाना है।
मनुष्य का वास्तविक ध्येय यह है :–

‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:।
एवं त्वयि ना न्यथेतोअस्ति न कर्मं लिप्यते नरे।।’
(यजुर्वेद 40/2)
‘इस संसार में धर्मयुक्त निष्काम कर्मों को करते हुए सौ वर्ष तक जीवन जीने की इच्छा करनी चाहिए। इस प्रकार जो धर्मयुक्त कर्मों में लगा रहता है, वह अधर्मयुक्त कर्मों में अपने को नहीं लगाता।’
दीर्घतमा ऋषि का कहना है:-
‘मनुष्य को चाहिए कि वह कर्म करता हुआ ही जीना चाहे। यदि वह कर्म नहीं करता है तो उसे जीवित रहने का अधिकार नहीं है। यह जीवन कर्म करने के लिए ही दिया गया है।..सर्वथा ‘मम’ ‘अहं’ को छोड़कर (तूं) कर्म करेगा तो तेरे ऐसे कर्म कभी बन्धनकारक नहीं होंगे। ऐसे निष्काम कर्मों का कभी तुझ नर में लेप नहीं होगा।’

उपरोक्त श्लोक का शाब्दिक अर्थ है:-
‘मनुष्य इस संसार में कर्मों को करता हुआ ही सौ वर्ष तक जीता रहना चाहे। इस तरह तुझ नर में कर्मलिप्त नहीं होगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नही है।’
(आचार्य अभयदेव)
यहाँ यह श्लोक भी याद दिलाना उचित लगता है कि
‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ और गोस्वामी तुलसीदास ने भी तो कर्म की महत्ता को स्वीकार करते हुए लिखा है कि :–
‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।
जो जस करहिं, सो तस फल चाखा।।’
आप भी तो कभी-कभी यही कह बैठते हैं- इसका तो कर्म ही ऐसा है!

पात्र व्यक्ति

गुरु द्रोणाचार्य के शिष्यों में पांच पांडव और 101 कौरव थे। लेकिन उनमें विशिष्ट योग्यता केवल अर्जुन में थी इसलिए गुरु द्रोणाचार्य पहचान गए कि एकमात्र अर्जुन ही ऐसा शिष्य है जिसके अंदर पात्रता है और ज्ञान भी ऐसे ही पात्र व्यक्ति को दिया जाना चाहिए।
एक कक्षा में 35 ,40 छात्र होते हैं , लेकिन अध्यापक द्वारा जब शिक्षा दी जाती होती है तो उसमें से कुछ ही छात्र ऐसे होते हैं जो उस शिक्षा को पूर्णतया ग्रहण करते हैं वही वास्तव में पात्र हैं ।
उपदेशक जब किसी सभा में उपदेश देता है तो वह सभी श्रोताओं को उपदेश देता है , लेकिन उनमें से कुछ लोग ही पात्र होते हैं जो उपदेश के सार्थक तत्व को ग्रहण करने में सक्षम होते हैं । हर व्यक्ति की ग्राह्य शक्ति भी अलग अलग होती है। जैसी उसकी ग्राह शक्ति होती है , उसके अनुसार ही वह अपने जीवन में बन पाता है। एक बर्तन 10 किलो दूध ग्रहण कर सकता है , एक 5 किलो कर सकता है तो एक 2 किलो कर सकता है । ऐसे ही व्यक्ति होता है जिनकी अलग-अलग ग्राहय शक्ति होती है। यह एक प्रकार की योग्यता ही है।
संसार में जो व्यक्ति आया है उसको व्यावहारिक जगत का ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान कितना है ? यह उसकी पात्रता पर ही निर्भर करता है। संसार में ऐसे लोग भी होते हैं जो अच्छा पद बिना पात्रता के प्राप्त कर लेते हैं तो उनको लोग हृदय से सम्मान नहीं करते , बल्कि कहते हैं कि यह इस पद के योग्य नहीं था और समाज यह भी कहता हुआ सुना गया है कि इस पद को अमुक व्यक्ति ने सुशोभित किया है , उससे इस पद की भी गरिमा और उच्चता में वृद्धि हुई है , दोनों बातों में महत्वपूर्ण अंतर है।
वह व्यक्ति जो केवल भौतिक वस्तुओं के प्राप्त होने में सुख का अनुभव करता है , वह उसी के लिए पात्र है। एक वह व्यक्ति जो भौतिक सुखों से अपना मन हटाकर ईश्वर की प्राप्ति में रत रहता है। वह ईश्वर को प्राप्त करने का पात्र है।

श्रवण पात्रता

एक मनुष्य को अच्छा श्रोता होना चाहिए । वक्ता से श्रोता अच्छा होता है । वक्ता होने में गलती हो सकती है , भावों एवं विचारों का और बोलने का सामंजस्य नहीं हो सकता वाणी और मस्तिष्क का तादात्म्य वक्ता के अंदर यदि नहीं है तो वह असफल हो जाता है। इसलिए वक्ता की जगह श्रोता अच्छा होता है। क्योंकि सुनने से व्यक्ति में सकारात्मक विचार, सत्यता, कर्तव्य, प्रेम, सदाचार, समभाव, सद्भाव, सहयोग ,सहानुभूति , आत्मविश्वास आदि गुण उत्पन्न होते हैं। सुनकर ही मनुष्य की योग्यता विकसित हो जाती है , मानसिक रूप से शक्तिशाली हो जाता है। स्वयं ही अपने दोषों का विश्लेषण कर उन्हें दूर करने का प्रयास करने लगता है। वस्तुतः ऐसा व्यक्ति ही सफल कहा जाता है।

अज्ञानांधकार

किसी मनुष्य का अज्ञानमय होना अज्ञानता व अंधकार कहा जाता है और अज्ञानता मनुष्य के लिए घातक शत्रु है। इसके विपरीत ज्ञान से सब कुछ प्राप्त हो सकता है , इसलिए ज्ञान मित्रवत होता है, हितैषी है। अज्ञानता से दोष उत्पन्न होते हैं। अज्ञानी मनुष्य का जीवन निरुत्साहित ,भय व कुंठा ग्रस्त , अवसादपूर्ण, उमंगहीन, आशाहीन,प्रेरणाहीन ,उत्साहहीन आनंदहीन , पतनोन्मुखी , भारमय,नादान, अशांत, असृजनशील,अंधकारमय, असंतोषी, अतृप्त होता है।संध्या का मंत्र है :-

ओ३म् उद्वयंन्तमसस्परि
स्व: पश्यन्त उत्तरम्।
देवं देवत्रा सूर्यगन्म ज्योतिरूत्तमम्।।
यहां कहा गया है कि हे परमदेव परमेश्वर! आप सब संसार के अंधकार अर्थात अज्ञान से परे हैं आपको अंधकार छू भी नहीं गया है, और आप अंधकार से परे हैं तभी तो हम आपसे ‘तेजोअसि तेजोमयि धेहि’=अर्थात आप हमें अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले चलो-ऐसी प्रार्थना करते हैं। गायत्री मंत्र में आपके वरणीय तेज स्वरूप का ध्यान करते हैं, जो शत्रुनाशक है। ईश्वर से भक्त कह रहा है कि आप सुख स्वरूप हैं। नित्यता से प्रलय के पीछे रहने वाले हैं। आपके गुणों की कोई सीमा नहीं है, आप गुणों की खान=गुणनिधान, गुणागार और गुणों के कोष हैं। आपके दिव्य गुणों के समक्ष हम नतमस्तक हैं। आप देवों के देव हैं-अर्थात ‘त्वमेव सर्वम् मम् देव देवा्’-तुम मेरे देवों के देव महादेव हो। हे दयानिधान! आप इस चराचर जगत की आत्मा हो। हम आपके शत्रुसंतापक दिव्य सर्वोत्तम तेज को अपने हृदय में देखते हैं और धारण करते हैं, उसकी अनुभूति हमें आनन्दित करती है। हम अत्यन्त श्रद्घा और भक्ति से आपको प्राप्त हों। ऐसी कृपा हम पर आप करें।
ओ३म् उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति
केतव:। दृशे विश्वाय सूर्यम्।।
यहां पर ईश्वर को ‘जातवेदस’ कहा गया है। क्योंकि ईश्वर चारों वेदों की उत्पत्ति का कारण रूप है और वह प्रकृति के सकल पदार्थों में व्यापक और सकल जगत को जानने वाला है। वह सब पदार्थों में व्यापक है और दिव्य गुणों से युक्त होने के कारण प्रत्येक व्यवहार को जानता है। वह ईश्वर दिव्य गुणों की खान है। स्थावर और जंगम सृष्टि का सूत्रात्मा वह ईश्वर ही है। उस सर्वशक्तिमान परमेश्वर को वेद की अद्भुत रचना के ज्ञापक गुण तथा अन्य पदार्थ लाल, पीली, झंडियों की भांति निश्चय से सभी प्रकार दिखाते हैं, जिससे कि सब जन देख सकें।
मनुष्य की ऐसी सोच और दृष्टि बन जाती है तब समझो कि वह अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाने की शक्ति हासिल कर लेता है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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