Categories
आज का चिंतन भारतीय संस्कृति

अधिकार से पहले कर्तव्य : अध्याय 3 , माता पिता के प्रति हम क्यों बनें सेवाभावी ?

माँ का हमारे जीवन में अति महत्वपूर्ण स्थान है । माँ के बिना हमारे जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती । माँ है तो यह संसार चल रहा है और यदि संसार में मातृशक्ति नहीं है तो संसार का विनाश निश्चित है । यही कारण रहा है कि संसार में मातृशक्ति का सम्मान करने के दृष्टिकोण से वैदिक ऋषियों ने माँ का स्थान सर्वोपरि मानते हुए उसे बच्चे की प्रथम पाठशाला कहा है । सचमुच माँ बच्चे की प्रथम पाठशाला ही होती है । क्योंकि उसके दिए हुए संस्कार हमारे जीवन भर काम आते हैं । हमारे निर्माण में माता के दिये हुए संस्कारों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है ।
‘माँ’ को ‘अंबा’, ‘अम्बिका’, ‘दुर्गा’, ‘देवी’, ‘सरस्वती’, ‘शक्ति’, ‘ज्योति’, ‘पृथ्वी’ आदि नामों से संबोधित किया गया है। ‘माँ’ को ‘माता’, ‘मात’, ‘मातृ’, ‘अम्मा’, ‘अम्मी’, ‘जननी’, ‘जन्मदात्री’, ‘जीवनदायिनी’, ‘जनयत्री’, ‘धात्री’, ‘प्रसू’ आदि अनेक नामों से भी पुकारा जाता है।
ऋग्वेद में ‘माँ’ की महिमा का यशोगान कुछ इस प्रकार से किया गया है, ‘हे उषा के समान प्राणदायिनी माँ ! हमें महान सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करो। तुम हमें नियम-परायण बनाओं। हमें यश और अद्धत ऐश्वर्य प्रदान करो।’
सामवेद में एक प्रेरणादायक मंत्र मिलता है, जिसका अभिप्राय है, ‘हे जिज्ञासु पुत्र ! तू माता की आज्ञा का पालन कर, अपने दुराचरण से माता को कष्ट मत दे। अपनी माता को अपने समीप रख, मन को शुद्ध कर और आचरण की ज्योति को प्रकाशित कर।’
शास्त्रों में माता के लिए कहा जाता है – “मातृ देवो: भव:”, माँ देवता के समान है l माता ने हमें जीवन ही नहीं दिया बल्कि हमें पाल – पोसकर बड़ा करने में भी अपनी अप्रतिम ,अतुलनीय ,अनुपमेय सेवाएं भी हमें प्रदान कीं । उसकी ममता यदि नहीं होती तो हमारे जीवन में बहुत सारे गुणों का अभाव होता । जिन बच्चों की मां बचपन में छोड़ कर मर जाती है या किसी भी कारण से जो बच्चे मां के प्यार से वंचित रह जाते हैं उनमें अक्सर क्रूरता का अवगुण देखा जाता है।

माँ के बारे में चाणक्य के विचार

माँ के बारे में चाणक्य का कहना है कि :–
राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी तथैव च।
पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैताः मातर स्मृताः॥
राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, पत्नी की माँ, तथा अपनी माँ, ये पांच प्रकार की माँ होती हैं।
भारतीय संस्कृति और समाज में हम देखते भी हैं कि इन पांचों प्रकार की माताओं के प्रति हम एक जैसा ही सम्मान भाव रखते और प्रदर्शित करते हैं।
इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर भी चाणक्य कहते हैं:-
माता यस्य गृहे नास्ति भार्या चाप्रियवादिनी।
अरण्यं तेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम् ॥
जिसके घर में माँ न हो और स्त्री क्लेश करने वाली हो , उसे वन में चले जाना चाहिए , क्योंकि उसके लिए घर और वन दोनों समान ही हैं। स्पष्ट है कि यदि पत्नी क्लेश करने वाली है , परंतु व्यक्ति की माँ जीवित है तो माँ अपना प्यार देकर उस क्लेश से उपजे हताशा के भाव को शांत कर सकती हैं । यदि मां भी नहीं है और पत्नी क्लेश करने वाली है तो स्थिति सचमुच ऐसी ही बन जाती है जिसमें व्यक्ति को घर छोड़ ही देना चाहिए।
महाभारत में जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठर से प्रश्न करते हैं कि ‘भूमि से भारी कौन है ?’ तब युधिष्ठर उत्तर देते हैं:
‘माता गुरूतरा भूमेः।’
अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।
महाभारत में अनुशासन पर्व में पितामह भीष्म कहते हैं कि ‘भूमि के समान कोई दान नहीं, माता के समान कोई गुरू नहीं, सत्य के समान कोई धर्म नहीं और दान के समान को पुण्य नहीं है।’
इसके साथ ही महाभारत महाकाव्य के रचियता महर्षि वेदव्यास ने ‘माँ’ के बारे में लिखा है कि:–

‘नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।’

अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।

हमारे जीवन में पिता का स्थान

जिस प्रकार हमारे जीवन में माता का स्थान है वैसे ही पिता का स्थान भी बहुत पूजनीय और प्रातःस्मरणीय माना गया है। इसीलिए “पितृ देवो: भव:”, पिता देवता के समान है – ऐसी शास्त्रगत मान्यता हमारे देश में रही है । सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि जन्म देने वाला व्यक्ति ही पिता होता है , पर वास्तव में ऐसा नहीं है। आचार्य चाणक्य के अनुसार पांच प्रकार के पिता बताए गए हैं-

जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति।
अन्नदाता भयत्राता पञ्चैचे पितर: स्मृता:।।

इस श्लोक का अर्थ है कि संसार में पांच प्रकार के पिता बताए गए हैं। जन्म देने वाला, शिक्षा देने वाला, यज्ञोपवीत आदि संस्कार करने वाला, अन्न देने वाला और भय से बचाने वाला भी पिता ही कहा गया है।
इस प्रकार हमारे संस्कारों में पिता की परिभाषा बहुत विस्तृत है । जन्म देने वाले तक पिता को मानना पिता की परिभाषा को बहुत संकीर्ण कर देना है । हमारे जीवन में उपरोक्त पांच पिताओं का कहाँ – कहाँ कैसे-कैसे योगदान रहा है ? उस पर चिंतन करते हुए हमारे कई पिता जब हमारे सामने खड़े होते हैं तो हम उनके प्रति श्रद्धा भाव से स्वाभाविक रूप से झुक जाते हैं । यही भारतीय संस्कृति और संस्कार का तकाजा है। हम सगे चाचा , ताऊ , मामा , फूफा सहित गांव के रिश्ते नातों में लगने वाले चाचा, ताऊ आदि सभी को पिता की श्रेणी में ही रखकर चलने वाले लोग रहे हैं। इतना ही नहीं बड़े भाई को भी पिता तुल्य सम्मान देना और उसके प्रति वैसी ही श्रद्धा रखना भी हमारी संस्कृति और संस्कारों में सम्मिलित है। अपने परिवार के दादा – दादी , नाना – नानी भी हमारे लिए सम्मान और श्रद्धा की इसी श्रेणी में आते हैं।

माँ – बाप हमारे लिए कितने कष्ट उठाते हैं ?

प्रायः बुजुर्ग शब्द इन्हीं के लिए प्रयोग में लाया जाता है। माता-पिता युवावस्था में अपने पुत्र व पुत्रियों को जन्म तो देते ही हैं , उनका पालन-पोषण भी करते हैं । इस पालन-पोषण में अनेकों प्रकार के कष्टों को भी सहन करते हैं । जब हम माँ के गर्भ में होते हैं तो वह उस अवस्था में अनेकों सावधानियां बरतकर हमारी रक्षा करती है ।उस काल में माता की छोटी सी असावधानी से बच्चे के जीवन को खतरा हो सकता है। इसीलिए माँ को इस अवस्था में ऐसा भोजन लेना होता है जिससे गर्भ में बच्चे का विकास व निर्माण भलीभांति हो। बच्चे के जन्म के समय तो माता को असह्य प्रसव-पीड़ा होती है जिसका मुख्य कारण सन्तान का जन्म या वह सन्तान ही होती है। जन्म के समय माता की जान को खतरा भी होता है। कुछ माताओं की तो मृत्यु तक हो जाती है और इससे पिता का जीवन कष्टमय हो जाता है। जन्म के आरम्भ के कुछ वर्षों में माता को शिशु के पालन में अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं। कई रात्रियां बिना सोये जागकर बितानी पड़ती है। शैशव काल व बाद के जीवन में सन्तान को कुछ रोगों के होने पर माता-पिता उनकी चिकित्सा कराते हैं और इसमें धन व्यय के अतिरिक्त मानसिक व शारीरिक कष्ट उठाते हैं।
माता-पिता को बच्चों की शिक्षा के समय में भी अनेकों प्रकार के कष्टों को झेलना पड़ता है। बच्चे को स्कूल ले जाना, वापिस लाना, समय पर भोजन कराना, यह ऐसे कार्य हैं, जो पैसे लेकर कोई नौकर भी नहीं कर सकता। सन्तान के विवाह योग्य होने पर उनके विवाह आदि कराते हैं। सन्तानों को अपना घर बनवा कर उसमें रखते हैं व उन्हें दूर व पास के अच्छे-अच्छे स्थानों पर घुमाने ले जाते हैं। जहां वह स्वयं रहे, वहीं अपनी सन्तानों को भी रखते हैं, जो उनके प्यार व त्याग का प्रतीक है। बच्चे का जब जन्म होता है तो सुरक्षा की दृष्टि से प्राइवेट नर्सिंग होम या निजी हॉस्पिटलों आदि में प्रसव कराया जाता है। इन स्थानों का बिल भी हजारों रूपयों या कुछ प्रसवों में एक लाख रुपये तक भी आ जाता है। जिसे माता पिता सहर्ष वहन करते हैं। कई बार धन अपने पास भी नहीं होता है तो उधार लेकर धन की व्यवस्था करते हैं । यदि माता-पिता की इन सब सेवाओं का आर्थिक मूल्यांकन करें व इन पर ब्याज आदि जोड़ें, तो हम समझते हैं कि कोई भी सन्तान माता-पिता द्वारा उन पर किए गये व्यय को लौटा नहीं सकती। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में माता पिता के प्रति बहुत पवित्र कर्तव्यों को हमारे यहाँ पर रखा गया है। माता पिता से संतान किसी प्रकार के अधिकार की अपेक्षा नहीं कर सकती । माता – पिता हमारे प्रति जिन कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं उन्हीं से हमारे अधिकारों की रक्षा स्वयं होती रहती हैं । उनके पास जो कुछ भी धन आदि होता है वह सब हमारे लिए ही होता है। इस प्रकार उनके द्वारा जोड़ी गई संपदा पर हमारा अधिकार स्वयं हो जाता है। अनेकों माता – पिता ऐसे होते हैं जो सरकारी नौकरी करते हैं । वहां से सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्हें पेंशन मिलती है तो उसे भी वह अपनी संतानों के कल्याण पर ही खर्च करते रहते हैं।
माता – पिता यह कभी नहीं सोचते कि उनके बुढ़ापे में उनकी सेवा कौन करेगा ? इसीलिए वह अपनी सारे पैसा को अपनी संतानों पर बिना कल की चिंता किए खर्च करते जाते हैं। पर आयु बढ़ने के साथ स्वास्थ्य की समस्यायें बढ़ने लगती हैं। रोग आ घेरते हैं। पति-पत्नी में किसी एक की मृत्यु भी हो गई होती है। ऐसे अवसरों व समय में उन्हें अपेक्षा होती है कि उनकी सन्तानें अर्थात् पुत्र, पुत्र-वधु व पोते-पोतियां उनकी सेवा करें। उनको औषधियां मिलें , चिकित्सकीय परामर्श मिलें, वस्त्र, सेवा, भोजन व आश्रय मिले तथा सभी से अच्छा व्यवहार मिले। माता-पिता इसके अधिकारी होते ही हैं। इसका कारण यह है कि जब उन्होंने नि:स्वार्थ भाव से हमारी सेवा की , हमारा पालन-पोषण किया , निर्माण किया और हमें संसार में सम्मान के साथ जीने के लिए हर प्रकार की सुविधा दी तो वृद्धावस्था में हम उनके लिए ये सारी सुविधाएं उपलब्ध कराएं जिनके वे अब स्वाभाविक रूप से अधिकारी हो गए हैं।

वर्तमान समय में माता-पिता की परेशानियां

आज के जमाने में बच्चे माता – पिता की सेवा करने से जी चुराते हैं । कई वृद्ध ऐसे हैं जिन्हें बच्चों द्वारा घर से निकाल दिया गया है या वृद्धाश्रम में डाल दिया गया है । जहां पर वह यातना पूर्ण जीवन जी रहे हैं । कई माताएं और पिताएं ऐसे भी हैं जिन्हें संतान बारी बारी से अपने पास रखती हैं अर्थात संतान यदि तीन हैं तो दो 2 महीने एक संतान अपने पास रखती है तो 2 महीने दूसरी और फिर 2 महीने तीसरी संतान अपने पास रखती है । इस प्रकार की व्यवस्था से ऐसे माता-पिता गेंद बन कर रह जाते हैं। कभी कोई इधर से पैर मारता है तो कभी उधर से पैर मारता है । वह इस फुटबॉल बनी जिंदगी से दुखी हो जाते हैं । ऐसी संतानें माता-पिता के प्रति कोई सम्मान का भाव न रखकर उनकी संपत्ति पर गिद्ध दृष्टि बनाए रखते हैं और इस प्रतीक्षा में रहते हैं कि जैसे ही उनकी आंखें बन्द हों तो वे उस संपत्ति को हस्तगत कर लें। इस प्रकार की स्थितियां भारतीय संस्कृति और संस्कारों के विपरीत हैं । आज के सभ्य समाज को समाज की इस स्थिति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा में संस्कारों को प्रमुखता प्रदान की जाए । आज की शिक्षा में संस्कारों पर अधिक बल नहीं दिया जा रहा । उसे रोजगारपरक बनाया जा रहा है। जिससे यह सारी व्यवस्था विनष्ट होती जा रही है । हमारे यहाँ तो बड़ों के पास जाने पर उनके प्रति अभिवादन की विधि भी निर्धारित की गई है । जैसे :–

अभिवादात्परं विप्रो ज्यायांसं अभिवादयन् ।
असौ नामाहं अस्मीति स्वं नाम परिकीर्तयेत ।

अर्थात विप्रः द्विज ज्यायांसम् अभिवादयन् अपने से बड़े को नमस्कार करते हुए अभिवादात् परम् अभिवादनसूचक शब्द के बाद ‘अहं असौ नामा अस्मि’ इति ‘मैं अमुक नाम वाला हूँ’ ऐसा कहते हुए स्वं नाम परिकीत्र्तयेत् अपना नाम बतलाये, जैसे – अभिवादये अहं देववत्तः…………………… ।
माता पिता या बड़ों के प्रति सेवा या अभिवादन के इस भाव से हमें क्या मिलता है ? – इस पर भी हमारे चिंतनशील ऋषियों ने हमारा मार्गदर्शन इस प्रकार किया है :-
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वथ्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ।।

अर्थात जो व्यक्ति सुशील और विनम्र होते हैं बड़ों का अभिवादन व सम्मान करने वाले होते हैं ,तथा अपने वृद्धों की सेवा करने वाले होते हैं , उनकी आयु ,विद्या ,कीर्ति और बल, इन चारों में सदैव वृद्धि होती है ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि माता-पिता के प्रति सेवाभावी या कर्तव्यपरायण होने से हम कुछ भी खोते नहीं हैं अपितु पाते ही पाते हैं । इसलिए हमें माता – पिता के प्रति सेवाभावी और कर्तव्य परायण होना ही चाहिए ।सचमुच वह संतान अभागी होती है जो पाने के अवसर को भी खोने में विश्वास रखती है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
betpark giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
Hititbet Giriş
xslot giriş
kralbet
betnano
kralbet
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
bettilt giriş
meritking giriş
matbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
kralbet
kralbet
imajbet giriş
xslot giriş
xslot giriş
betvole giriş
betvole giriş
bettilt
betvole giriş
betvole giriş
bettilt
gobahis giriş