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कालापानी पर नेपाल की बेचैनी का राज क्या है ?

डॉo सत्यवान सौरभ

हाल ही में भारत के लिये स्थिति उस समय असहज हो गई जब कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिये भारत द्वारा लिपुलेख-धाराचूला मार्ग के उद्घाटन करने के बाद नेपाल ने इसे एकतरफा गतिविधि बताते हुए आपत्ति जताई। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने यह दावा किया कि महाकाली नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल की सीमा में आता है। विदित है कि नेपाल ने आधिकारिक रूप से नवीन मानचित्र जारी किया गया, जो उत्तराखंड के कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख  को अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है। निश्चित रूप से नेपाल की इस प्रकार की प्रतिक्रिया ने भारत को अचंभित कर दिया है। इतना ही नहीं नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली ने नेपाल में कोरोना वायरस के प्रसार में भारत को दोष देकर दोनों देशों के बीच संबंधों को तनावपूर्ण कर दिया है।

विवाद के पीछे का जादू:-

वस्तुतः इसे ‘चीनी जादू’ कहा जाए या नेपाल की कूटनीतिक चाल कि पिछले कुछ वर्षों से लगातार भारत को परेशान करने की कोशिश हो रही है। भारत इन सभी कोशिशों को नेपाल की चीन से बढ़ती नजदीकी के रूप में देख रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने रिश्ते पर ‘चीनी चाल’ भारी पड़ रही है? या फिर यह मान लिया जाए कि हालिया दिनों में नेपाल ज़रूरत से ज्यादा महत्त्वाकांक्षी बन गया है और भारत उसकी आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा।

विवाद से  नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को अपनी सरकार की अक्षमता को छिपाने और लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में विफलता, और अपनी पार्टी के भीतर से विरोध के बढ़ते ज्वार से ध्यान हटाने का अवसर मिला। नेपाली संसद में उनकी तीखी टिप्पणी को भारत-नेपाल संबंधों के संरक्षण के हित में नजरअंदाज किया जाता है। चीन की नेपाल में बढ़त अब भारतीय हितो को नजरंदाज कर रही है। नेपाल ने अपने सुदूर पाश्चिम में कालापानी के करीब, छारुंग में अपनी सशस्त्र पुलिस तैनात कर दी।भारत-तिब्बत सीमा पुलिस भी कालापानी में स्थित है क्योंकि यह भारत-चीन सीमा के करीब है। नेपाल की वजह से भारतीय सेना वहां नहीं है। नेपाली सरकार ने इस कदम को और बढ़ा दिया है और भारत की रक्षा के लिए संवेदनशील क्षेत्र में अपने क्षेत्र का विस्तार करते हुए एक नया नक्शा अधिकृत करके जिस पर विवाद बढ़ गया है

भारत नेपाल विवादों के झरोखे :-

सीमा परिसीमन का लंबा इतिहास रहा है। 1816 की सुगौली संधि से पहले, नेपाली राज्य पश्चिम में सतलज नदी से पूर्व में तीस्ता नदी तक फैला हुआ था। नेपाल एंग्लो-नेपाली युद्ध हार गया और परिणामी संधि ने नेपाल को अपने वर्तमान क्षेत्रों तक सीमित कर दिया। सुगौली संधि में कहा गया है कि ” वह निपाल [नेपाल] का राजा है, जिसके द्वारा माननीय  ईस्ट इंडिया कंपनी को सभी उपर्युक्त प्रदेशों में शामिल किया गया है,” इसमें काली नदियों और राप्ती के मध्य की तराई के पूरे क्षेत्र तक विस्तारित है । ” यह आगे विस्तार से बताया गया है कि ” वह नेपाल का राजा है जो अपने लिए, अपने उत्तराधिकारियों और उत्तराधिकारियों के लिए त्याग करता है, सभी काली नदी के पश्चिम में स्थित देशों के साथ या संबंध का दावा करते हैं और उनसे कभी कोई संबंध नहीं रखते हैं। वर्तमान विवाद इस विषय से उत्पन्न हुआ की नेपाल मानता है कि कालापानी में महाकाली नदी से जुड़ने वाली सहायक नदी काली नदी नहीं है। नेपाल अब कहता है कि काली नदी लिपु लेख के पास पश्चिम में स्थित है।

अंग्रेजों ने तिब्बत और चीन के साथ व्यापार के लिए लिपु लेख दर्रे का इस्तेमाल किया। 1870 के दशक के बाद से सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे ने लिपु लेख के क्षेत्र को कालापानी से ब्रिटिश भारत के हिस्से के रूप में दिखाया। नेपाल और नेपाली राजाओं के राणा शासकों ने सीमा स्वीकार कर ली और भारत की स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार के साथ कोई आपत्ति नहीं की। 1857 के विद्रोह को खत्म करने में जंग बहादुर राणा द्वारा दी गई सैन्य मदद के लिए एक इनाम के रूप में, नेपालगंज और कपिलवस्तु के क्षेत्रों को नेपाल में जल्द ही बहाल किया गया था। अंग्रेजों ने कालापानी क्षेत्र सहित गढ़वाल या कुमाऊं के किसी भी हिस्से को नेपाल नहीं लौटाया।

1816 में जब सुगौली संधि हुई थी तब भारत मौजूद नहीं था। और भारत की वर्तमान सीमाएँ, न केवल नेपाल के साथ, बल्कि इसके कई अन्य पड़ोसियों के साथ, तत्कालीन ब्रिटिश शासन द्वारा खींची गई थीं। भारत को ब्रिटिश भारत की सीमाएँ विरासत में मिलीं। यह अब ऐतिहासिक अतीत को उजागर नहीं कर सकता। नेपाल-भारत तकनीकी स्तर संयुक्त सीमा कार्य समूह की स्थापना 1981 में सीमा मुद्दों को सुलझाने, अंतर्राष्ट्रीय सीमा के सीमांकन और सीमा स्तंभों के प्रबंधन के लिए की गई थी। 2007 तक, समूह ने 182 स्ट्रिप मानचित्रों की तैयारी पूरी कर ली, दोनों पक्षों के सर्वेक्षणकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए, सीमा के लगभग 98% को कवर किया, कालापानी और सुस्ता के दो विवादित क्षेत्रों को छोड़कर सभी पर विवाद समाप्त हो चूका है ।

नेपाल के शंख में चीनी फूंख:-

गौरतलब है कि चीन का प्रभाव दक्षिण एशिया में लगातार बढ़ रहा है। नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान या बांग्लादेश हर जगह चीन की मौजूदगी बढ़ी है। ये सभी देश चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना में शामिल हो गए हैं। लेकिन भारत इस परियोजना के पक्ष में नहीं है। नेपाल में चीन के बढ़ते दखल के बाद पिछले कुछ समय से भारत-नेपाल के बीच संबंधों में पहले जैसी गर्मजोशी देखने को नहीं मिल रही। चीन ने इसका पूरा-पूरा लाभ उठाते हुए नेपाल में अपनी स्थिति को और मज़बूत किया है। नेपाल के कई स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन को पढ़ना भी अनिवार्य कर दिया गया है। नेपाल में इस भाषा को पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतन का खर्चा भी चीन की सरकार उठाने के लिये तैयार है। चीन, नेपाल में ऐसा बुनियादी ढाँचा तैयार करने की परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जिन पर भारी खर्च आता है। आज नेपाल जो बोल जोर-जोर से बोल रहा है वो नेपाल की आवाज़ नहीं चीनी फूंख की करनी है.
भविष्य की सूर्य किरण:-

भारत व नेपाल के मध्य रोटी-बेटी का रिश्ता है। ऐसे में इन विवादों को दूर करना ज्यादा कठिन नहीं है । अगले चरणों में संबंधित सरकारों (नेपाली सरकार की अभी भी प्रतीक्षा है) द्वारा स्ट्रिप मानचित्रों की स्वीकृति है, कालापानी और सुस्ता पर मतभेदों के समाधान और क्षतिग्रस्त या लापता सीमा स्तंभों के निर्माण को गति प्रदान करना होगा भारत ने भूमि और समुद्री सीमाओं को कवर करते हुए, बांग्लादेश के साथ सीमा से अधिक दूर-दराज के मुद्दों को सफलतापूर्वक हल किया है। भूमि सीमा निपटान के लिए आबादी के हस्तांतरण और एक विपक्ष सहित दोनों देशों के प्रतिकूल कब्जे में क्षेत्रों के आदान-प्रदान की आवश्यकता है।

सीमा से संबंधित शेष मुद्दों को हल करना मुश्किल नहीं है जब तक कि वे घरेलू या अंतरराष्ट्रीय चिंताओं में न फंसे हों।  भारत को भी अपनी विदेश नीति की समीक्षा करने की भी जरूरत है। भारत को नेपाल के प्रति अपनी नीति दूरदर्शी बनानी होगी। जिस तरह से नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है, उससे भारत को अपने पड़ोस में आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन करने से पहले रणनीतिक लाभ–हानि पर विचार करना होगा। भारत और चीन के साथ नेपाल एक आज़ाद सौदागर की तरह व्यवहार कर रहा है और चीनी निवेश के सामने भारत की चमक फीकी पड़ रही है। लिहाज़ा, भारत को कूटनीतिक सुझबूझ का परिचय देना होगा और नेपाल के साथ प्रति वर्ष ‘सूर्य किरण’ नाम से संयुक्त सैन्य अभ्यास की तरह अब हर दिन रिश्तों को तरोताज़ा रखना होगा।

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