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वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?

वंदे मातरम पर बवाल क्यों ? अध्याय 6

राष्ट्रगीत का हिंदी भावार्थ

‘ वंदेमातरम’ के बारे में कहा जाता है कि अंग्रेजों ने जब ‘ गॉड सेव द क्वीन’ नामक अपने गीत को भारत के प्रत्येक विद्यालय में लागू करके उसे भारत के नन्हें-मुन्हें नौनिहालों को गाने के लिए विवश करने की नीति अपनाई तो बंकिम चंद्र चटर्जी को ब्रिटिश सरकार का यह कृत्य किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं लगा। बंकिम चंद्र चटर्जी को लगा कि इस प्रकार का गीत भारत के विद्यालयों में लागू करना भारत के आत्मसम्मान के साथ खिलवाड़ करना है। इससे भारत के लोगों में अपने देश के प्रति उदासीनता का भाव पैदा होगा। परिणामस्वरुप धीरे-धीरे वे विदेशी सरकार के प्रति अपने आपको समर्पित करते चले जाएंगे। जिसे राष्ट्रहित में कदापि स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसीलिए उन्होंने ७ नवंबर १८७५ को राष्ट्र प्रेम से भरे अपने गीत ‘ वंदेमातरम ‘ की रचना की। बंकिम चंद्र चटर्जी राष्ट्रवादी चिंतनधारा के कवि थे। उन्होंने अपने इस देश भक्ति के गीत के माध्यम से देशवासियों को स्पष्ट संदेश दिया कि उन्हें जागना होगा और देश, धर्म व संस्कृति के प्रति समर्पित होकर राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए काम करना होगा। यदि वह नहीं जगे तो उन्हें ‘ गॉड सेव द क्वीन’ जैसे आत्मसम्मान का विनाश करने वाले गीतों को गाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
उन्होंने अपने गीत के माध्यम से देशवासियों को संदेश दिया कि आज यदि हमको ” गॉड सेव द क्वीन ” जैसा गीत गाने के लिए भी विवश किया जा रहा है तो कल को हमसे कहा जाएगा कि ” गॉड सेव द ब्रिटिश अंपायर ” गाइए। इस प्रकार हमारे आत्मसम्मान को पूर्णतया कुचल दिया जाएगा।
हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि १७५७ में जब प्लासी के युद्ध के पश्चात अंग्रेजों को भारत में अपनी राजनीतिक जड़ें जमाने में सफलता मिली तो भारत के लोगों ने निराशा को अपना दुर्भाग्य नहीं बनने दिया। वे निरंतर अपनी स्वाधीनता के लिए संघर्ष करते रहे। ३० से अधिक क्रांतियां हमने अगले १९० वर्ष के कालखंड में कर डालीं। इनमें से एक १८५७ की क्रांति को वीर सावरकर जी ने विशेष रूप से उछाल दिया तो वह हम सब की दृष्टि में आ गई, परंतु उससे अलग जो लड़ाइयां लड़ी गईं वे सभी दृष्टि से ओझल रहीं। नीचे हम इन सभी क्रांतियों अथवा आंदोलनों की सूची दे रहे हैं। जिनसे यह स्पष्ट हो जाएगा कि हमें अपने इतिहास पर कितना शोध कार्य करने की आवश्यकता है ?

प्लासी का युद्ध (सन् १७५७)

चुआड़ विद्रोह (सन् १७६६ )

संन्यासी एवं फकीर विद्रोह (सन् १७६३ से १७७३ तक)

बंगाल का द्वितीय सैनिक विद्रोह (सन् १७९५ )

चुआड़ विद्रोह (सन् १७९८ से १८३१ तक)

वेल्लौर का सैनिक विद्रोह (सन् १८०३ )

वेलू थाम्पी का संघर्ष ( १८०८ – ०९ )

भील विद्रोह ( सन १७१७ )

नायक विद्रोह (सन् १८२१ )

बैरकपुर का प्रथम सैनिक विद्रोह (सन् १८२४ )

कोल विद्रोह (सन् १८३१ – ३३ )

भूमिज विद्रोह (सन् १८३२ से १८३४ तक)

गुजरात का महीकांत विद्रोह (सन् १८३६)

धर राव विद्रोह (सन् १८४१ )

कोल्हापुर विद्रोह (सन् १८४४)

संथाल विद्रोह (सन् १८५५ से १८५६ तक)

सन् १८५५ का सैनिक विद्रोह

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (सन् १८५७ )

नील विद्रोह (सन् १८५० से १८६०तक)

कूका विद्रोह (सन् १८७२ )

वासुदेव बलवंत फड़के के मुक्ति प्रयास (सन् १८७५ से १८७९ )

चाफेकर संघ (सन् १८७९ के आसपास)

बंग-भंग आंदोलन (सन् १९०५ )

यूरोप में भारतीय क्रांतिकारियों के मुक्ति प्रयास (सन् १९०५ के आसपास)

अमेरिका तथा कनाडा में गदर पार्टी (प्रथम विश्वयुद्ध के आगे-पीछे)

रासबिहारी बोस की क्रांति चेष्टा

हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ (सन् १९१५ के लगभग)

सशस्त्र क्रांति का प्रगतिशील युग

अगस्त क्रांति (सन् १९४२ का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’)

दक्षिण-पूर्व एशिया में आजाद हिंद आन्दोलन

नौसैनिक विद्रोह (सन् १९४६)

गोवा मुक्ति संघर्ष

दादरा तथा नगर हवेली मुक्ति संग्राम

हमारे देश में हुई इन विभिन्न क्रांतियों अथवा आंदोलनों की यह सूची हमें बता रही है कि भारत के लोगों ने अंग्रेजों की गुलामी को कभी स्वीकार नहीं किया। जिस प्रकार भारतवासी अंग्रेजों से पहले मुसलमानों के शासनकाल के विरुद्ध संघर्षरत रहे, उसी प्रकार वे अंग्रेजों के विरुद्ध भी क्रांति का बिगुल निरंतर फूंकते रहे। जिस समय बंकिम चंद्र चटर्जी ने ” गॉड सेव द क्वीन ” जैसे आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाले गीत के विरुद्ध भारतीयों के लिए ‘ वंदेमातरम’ जैसा राष्ट्र प्रेम से भरा गीत बनाया, उस समय भी भारत वर्ष में क्रांति का परिवेश था। वासुदेव बलवंत फड़के और उनके साथी क्रांति की धूम मचा रहे थे। इन क्रांतिकारियों के इस प्रकार के मुक्ति प्रयासों से बंकिम चंद्र जैसा राष्ट्रवादी कवि निरपेक्ष रहा हो, ऐसा माना ही नहीं जा सकता ? इस प्रकार बंकिम चंद्र चटर्जी का यह गीत अर्थात वंदे मातरम वासुदेव बलवंत फड़के जैसे क्रांतिकारियों के मुक्ति प्रयासों को एक प्रकार की नई ऊर्जा देने का एक प्रयास था।
जितने भर भी लोग वासुदेव बलवंत फड़के जैसे क्रांतिकारियों के मुक्ति प्रयासों का समर्थन कर रहे थे या देश के दूरस्थ क्षेत्रों में इसी प्रकार के कार्यों में लगे हुए थे, उनके कानों तक ‘ वंदेमातरम ‘ को पहुंचाना उस समय का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और साहसिक कार्य था। यहां तक कि इस प्रकार के गीत की रचना करना भी उस समय का एक साहसिक कार्य ही माना जाना चाहिए। क्योंकि ब्रिटिश सरकार इस प्रकार के गीतों पर तो प्रतिबंध लगाती ही थी, इस प्रकार के गीतों को रचने वाले लोगों को भी अनेक प्रकार की यातनाएं देकर उनके जीवन को बहुत ही कष्ट पूर्ण बना देती थी। ब्रिटिश सरकार की इस प्रकार की नीतियों के चलते बंकिम चंद्र चटर्जी ने यदि ‘ वंदेमातरम ‘ की रचना की तो इससे उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उन्हें अपने प्राणों की कोई चिंता नहीं थी। उन्हें चिंता थी तो केवल अपने देश की चिन्ता थी। इसके लिए यदि उनके प्राण जाते हों तो वे सहर्ष अपना बलिदान दे सकते थे।
बंकिम चंद्र चटर्जी के वंदेमातरम के छह छंद और उनकी हिंदी व्याख्या इस प्रकार है :-

वन्दे मातरम्
सुजलाम् सुफलाम् मलयज शीतलाम्
शस्य-श्यामलाम् मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ १॥

अर्थ – “हे माँ मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। माँ तुम पानी से भरी हुई हो, फलों से भरी हुई हो। हे माँ तुम्हें मलय से आती हुई हवा शीतलता प्रदान करती है। हे माँ तुम फसल से ढकी रहती हो। हे माँ मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। ”
अपनी भारत माता अथवा राष्ट्रभूमि , मातृभूमि के प्रति कितनी श्रद्धा, कितना विश्वास ,कितना प्रेम, कितना उल्लास और कितना आत्मीय लगाव झलकाने वाले शब्द हैं ये ? जिसने अपनी भारत माता के अपने प्रति किए गए उपकारों को समझ लिया है, वही हृदय इस प्रकार के शब्दों की रचना कर सकता है। यह किसी कवि की कल्पना मात्र नहीं है बल्कि एक जीवंत राष्ट्र की अपनी मातृभूमि के प्रति असीम प्रेम की अभिव्यक्ति है। कल्पना मन तक उतरती है, वह आत्मा को आनंदित नहीं कर सकती। क्योंकि आत्मा कल्पनाओं में नहीं रहती। आत्मा यथार्थ में रहती है और जब यथार्थ को छूने वाली कोई कविता या गीत उसके क्षेत्र में प्रवेश करता है तो वह उसके साथ अवश्य ही तारतम्य बना लेती है। आत्मा चेतन है, जिसे भ्रमित नहीं किया जा सकता।
इसके विपरीत मन एक जड़ वस्तु है और जड़ को भ्रमित किया जा सकता है। यदि ‘ वंदेमातरम ‘ हमारी चेतना को झंकृत करता है तो समझिए कि यह हमारी आत्मा का विषय है। तब निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि राष्ट्र भी हमारी आत्मा का ही विषय होता है।

शुभ्र-ज्योत्सनां पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्
सुहासिनीम् सुमधुर-भाषिणीम्।
सुखदाम् वरदाम् मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ २॥

अर्थ – ” वह जिसकी रात्रि को चाँद की रोशनी शोभायमान करती है, वह जिसकी भूमि खिले हुए फूलों से सुसज्जित पेड़ों से ढकी हुई है। सदैव हंसने वाली, मधुर भाषा बोलने वाली, सुख देने वाली, वरदान देने वाली माँ, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।”
युग – युगों से यह राष्ट्र भूमि, हमारी पवित्र भारत भूमि हम पर उपकार करती चली आ रही है। जिसने आज हमको ही नहीं – हमारे पिता, पितामह, प्रपितामह और उनके दादा परदादाओं का इसी प्रकार पालन पोषण किया है, उनको संरक्षण प्रदान किया है, उनकी हर प्रकार से रक्षा की है।
मेरा मानना है कि मैं आज जिस रूप में हूं ,उस रूप में मेरे दादा – परदादाओं की छाया मेरे साथ है। उनका आशीर्वाद मेरे साथ है। समझो मेरा शरीर उन्हीं के नए रूप में अवतरित हुआ है। जिसे यह मां उतना ही प्यार दे रही है, जितना इसने मेरे पूर्वजों को दिया था। इस पवित्र भारत भूमि के प्रति हमारा कर्तव्य है कि जब यह हमको युग-युगों से संरक्षण देती आई है, हमारा पालन पोषण करती आई है तो हम इसके प्रति कृतज्ञता के भाव व्यक्त करें। कृतज्ञ हृदय केवल और केवल गुण देखता है। अवगुणों पर उसकी दृष्टि जाती ही नहीं है। यदि इन पंक्तियों को देखें तो कवि अपनी मां के केवल गुणों को ही देख पा रहा है। मां में त्रुटि तो उसे रंच मात्र भी दिखाई नहीं दे रही है। ….और यह सत्य भी है कि मां में कोई त्रुटि होती भी नहीं है।

बंकिम चंद्र चटर्जी आगे लिखते हैं : –

कोटि-कोटि कंठ कल-कल निनाद कराले
कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ ३॥

अर्थ – ” करोड़ों कंठ मधुर वाणी में तुम्हारी प्रशंसा कर रहे हैं। करोड़ों हाथों में तेरी रक्षा के लिए धारदार तलवारें निकली हुई हैं। माँ कौन कहता है कि तुम अबला हो ? तुम बल धारण किए हुए हो। तुम तारने वाली हो, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। माँ तुम शत्रुओं को समाप्त करने वाली हो। माँ मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।”
‘ करोड़ों कंठ मधुर वाणी में तुम्हारी प्रशंसा कर रहे हैं ‘ इस पंक्ति का अर्थ है कि जितने भी राष्ट्रभक्त राष्ट्रवासी, ज्ञानी- ध्यानी- तपसी- महात्मा जन हैं, वे सभी तुम्हारे प्रति श्रद्धा के गीत गाते हैं। क्योंकि उन सबको तुम्हारे महत्व और तुम्हारी सत्तर का आभास है, ज्ञान है। ज्ञानी, ध्यानी कविजन तुम्हारी आरती उतारते हैं। तुम्हारा गुणगान करते हैं । तुम्हारा संकीर्तन करते हैं। वेद में ऐसे लोगों को अज्ञान से लड़ने वाले ब्राह्मण कहा गया है । अगली पंक्ति में बंकिम चंद्र चटर्जी कह रहे हैं कि ” करोड़ों हाथों में तेरी रक्षा के लिए धारदार तलवारें निकली हुई हैं ।” तलवारों को हाथों में लिए ये कौन लोग हैं ? निश्चित रूप से यहां पर कवि का संकेत देश की क्षत्रिय शक्ति की ओर है। जो अन्याय नाम के अत्याचारी शत्रु से लड़ते हैं अर्थात राष्ट्र में कहीं पर भी यदि कोई उपद्रव कर अशांति फैलाता है या राष्ट्र के लिए किसी भी प्रकार का अशांत वातावरण सृजित करता है तो उनसे लड़ने के लिए हमारे क्षत्रियों के हाथों में तलवारें चमचमाती हुई दिखाई देती हैं। ये लोग और कोई नहीं हैं, ये मातृभूमि के रक्षक क्षत्रिय हैं। जो अपनी मां के लिए चौबीसों घंटे रक्षक बनकर काम करते हैं।
इन क्षत्रियों के भीतर मां के द्वारा दिए जाने वाले अन्न से ही बल उत्पन्न होता है। ओज और शक्ति प्राप्त होती है। इसलिए मां तुम प्रणम्य हो।

गीत के अगले शब्द हैं: –

तुमि विद्या तुमि धर्म
तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणा: शरीरे
बाहु ते तुमि मां शक्ति
हृदये तुमि मां भक्ति
तोमारइ प्रतिमा गङि मंदिरे मंदिरे॥ वन्दे मातरम्॥ ४॥

अर्थ –” तुम ही विद्या हो, तुम ही धर्म हो। तुम ही हृदय, तुम ही तत्व हो। तुम ही शरीर में स्थित प्राण हो। हमारी बाँहों में जो शक्ति है वो तुम ही हो। हृदय में जो भक्ति है वो तुम ही हो। तुम्हारी ही प्रतिमा हर मन्दिर में गड़ी हुई है। माँ मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।”

राष्ट्र भूमि की वंदना में इन शब्दों का भी बहुत गहरा अर्थ है। कवि को सर्वत्र मां ही मां दिखाई दे रही है। वास्तव में ये मां का विराट स्वरूप है। विद्या में भी वही है। धर्म में भी वही है। हृदय में भी वही है। तत्व, शरीर और हमारी बांहों की शक्ति भी वही है, हृदय में वही भक्ति के रूप में प्रवाहित है। वास्तव में ये माता की शक्ति के विभिन्न स्वरूप हैं।

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणीम्
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वां, नमामि कमलाम्।
अमलाम्, अतुलाम्, सुजलाम्, सुफलाम्, मातरम्॥ ५॥

भारत दुर्गा का उपासक है। जिसका अभिप्राय है कि हम शक्ति की,अस्त्र-शस्त्र की उपासना करने वाले लोग हैं। हम हर उस अत्याचारी, दुष्ट, राक्षस व्यक्ति के विरुद्ध हथियार उठा लेते हैं जो मानवता का हत्यारा होता है। जो धर्म का हत्यारा होता है और जो राष्ट्र का हत्यारा होता है। इस रूप में हम अपनी मातृभूमि को ‘ दुर्गा ‘ के रूप में उपासित करते हैं। इस कार्य को राष्ट्र में क्षत्रिय लोग करते हैं। सारे क्षत्रिय लोग मां दुर्गा के उपासक हैं। हम समृद्धि की कामना करने वाले लोग हैं। देश में सुख समृद्धि की कामना में लगे रहने वाले लोग हमारे यहां पर वैश्य कहे जाते हैं। वैश्य लक्ष्मी के उपासक हैं। भारत माता दुर्गा इसलिए है कि वह क्षत्रियों का निर्माण करने वाली है।
हम सरस्वती के अर्थात ज्ञान – विज्ञान के भी उपासक हैं। इस कार्य में लगे हुए लोग ब्राह्मण कहे जाते हैं। ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य सब मिलकर शूद्र की भलाई के लिए उसके कल्याण के लिए काम करते हैं। इस प्रकार पूरा राष्ट्र दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती की उपासना करते हुए अपने शूद्र वर्ग के कल्याण के कामों में लगा रहता है। अंततः इस सब के लिए साधन हमारी मातृभूमि ही प्रदान करती है। इसलिए हम सब मिलकर सामूहिक रूप से मातृभूमि के गीत गाने वाले लोग हैं। हम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य दुर्गा – लक्ष्मी- सरस्वती के अलग-अलग उपासक नहीं हैं , मूल रूप में तो हम एक ही शक्ति के उपासक हैं। इन तीनों के गुण-कर्म- स्वभाव अलग हो सकते हैं , परंतु अंततः हम एक ही शक्ति के समक्ष नतमस्तक होते हैं और वह शक्ति हमारी मातृभूमि है। यह मातृभूमि समझो हमारी संस्कृति का केंद्र है। हमारे राष्ट्रवाद का केंद्र है। हमारे धर्म का केंद्र है। हमारी सनातन मान्यताओं का केंद्र है। जिससे इन तीनों की अर्थात गंगा – जमुना- सरस्वती की त्रिवेणी निकलती हैं। वास्तव में हमको अपनी इन तीनों शक्तियों को अर्थात ब्राह्मण- क्षत्रिय – वैश्य , गंगा- यमुना – सरस्वती और दुर्गा – लक्ष्मी- सरस्वती को पहचानना होगा। जिन लोगों ने इनका गलत अर्थ निकाला, उनको आपत्ति रही कि हम ‘ वंदेमातरम ‘ नहीं गाएंगे और उन्होंने ही ‘ वंदेमातरम’ पर बवाल काटना आरंभ कर दिया । आज भी काट रहे हैं। जिन लोगों को इन शब्दों के अर्थ ज्ञात नहीं थे, वे नहीं समझ पाए कि पूरा राष्ट्र इसी त्रिवेणी में स्नान कर रहा है और पवित्रता का अनुभव कर रहा है। इसलिए वह बवाल काटने वालों को भी समझा नहीं पाए । क्योंकि वे धर्मनिरपेक्ष हो गए थे।
इस छंद में कवि ने ‘ दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती ‘ के रूपक के साथ राष्ट्र की वंदना की है। उन्होंने यह भी कहा है कि हे मां ! मैं तुम्हारे लिए इसलिए भी प्रणाम करता हूं क्योंकि तुम पवित्र, अतुलनीय, जल और फल से भरपूर हो।
बंकिम चंद्र चटर्जी आगे लिखते हैं: –

श्यामलाम्, सरलाम्, सुस्मिताम्, भूषिताम्
धरणीम्, भरणीम्, मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ ६॥

यहां पर कवि महोदय कह रहे हैं कि “श्यामवर्ण वाली,अति सरल,सदैव हँसने वाली,भूषित,धारण करने वाली,पालन-पोषण करने वाली माँ हो तुम।
माँ मैं तुम्हारी वन्दना करता हूँ।”
हमारा पालन पोषण कर रही हो-
इसलिए तुम हमारे लिए वंदनीय हो,
हमारे जीवन के लिए सारे साधन उपलब्ध करा रही हो- इसलिए हमारे लिए वंदनीय हो तुम,
हमारा वृद्धि और विकास कर रही हो
– इसलिए हमारे लिए अभिनंदनीय हो तुम,
हमारे व्यक्तित्व का निरंतर विकास कर रही हो-
इसलिए हमारे लिए प्रातः स्मरणीय हो तुम।

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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