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वैश्विक चिन्तन के धनी कवि : रामधारी सिंह ‘दिनकर’

क्रान्तदर्शी होना कवि का स्वाभाविक गुण है , उसकी प्रकृति है , उसे नैसर्गिक रूप से मिला हुआ एक वरदान है । कहने का अभिप्राय है कि क्रांतदर्शिता के अभाव में कोई व्यक्ति कवि नहीं हो सकता । जैसे विधाता की रचना और सृष्टा की सृष्टि का होना तभी संभव है , जब रचना और सृष्टि के विषय में वह सGर्वज्ञ हो , वैसे ही कवि की कविता भी तभी फूटेगी जब वह कविता के विषय में सर्वज्ञ हो ।
हमारे वेद भी काव्यमय हैं , हमारे रामायण ,महाभारत , गीता आदि ग्रंथ भी काव्यमय हैं , इसका कारण यही है कि यह सारा जगत ही संगीतमय है । ‘ओ३म ‘ की पवित्र ध्वनि का संगीत इसमें जीवनी – शक्ति का संचार कर रहा है । अब तो इस बात की पुष्टि अमेरिका के ‘ नासा ‘ ने भी कर दी है कि सूर्य की किरणों से भी ‘ ओ३म ‘ की ध्वनि का संगीत निकल रहा है ।
हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि विश्व को कविता , काव्य और संगीत का रसास्वादन हमने कराया था । हमारे यहां से कविता ने संसार के अन्य क्षेत्रों के लिए प्रस्थान किया । वह जहां – जहां भी गई वहीं – वहीं उसने भारत के ‘ कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ‘ और ‘ वसुधैव कुटुंबकम ‘ का संगीत सुनाया और संपूर्ण वसुधा के निवासियों ,को समरसता और एकता के भावसूत्रों से आबद्ध करने में सफलता प्राप्त की ।
रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘ जी की कविता और उनका साहित्य भी भारत के ‘ कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ‘ और ‘ वसुधैव कुटुंबकम ‘ की इसी पवित्र भावना से सिंचित और अभिषिक्त हुआ दिखाई देता है। जो उन्हें राष्ट्रकवि नहीं , अपितु विश्वकवि बनाता है ।
भारत के इस वैश्विक चिंतन को जब हम रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘ के साहित्य और कविता में खोजते हैं तो सर्वत्र उनका वैश्विक मानस हमें प्रस्फुटित होता परिलक्षित होता है । किसी चिंतनशील व्यक्ति के चिंतन की उत्कृष्टता का बोध होना वैसे ही थोड़ा कठिन होता है जैसे किसी स्वाभिमानी व्यक्ति के विषय में यह ज्ञात करना कठिन होता है कि वह स्वाभिमानी होते – होते अभिमानी कब हो गया ? – कवि के हृदय की सरसता , कोमलता , निर्मलता , पवित्रता, उत्कृष्टता ,सहृदयता , सर्व कल्याण की साधना और उसका धर्म उसे कब व्यष्टि से समष्टिमूलक चिंतन में ले गया ? – इसका बोध संभवत: उसे स्वयं भी नहीं होता ।
रामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ ने कहा था, ‘मैं जीवन भर गांधी और मार्क्स के बीच झटके खाता रहा हूं । इसलिए उजले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है, वही रंग मेरी कविता का है । मेरा विश्वास है कि अंततोगत्वा यही रंग भारत के भविष्य का रंग होगा ।’
इसका अभिप्राय है कि गांधी की अहिंसा , भ्रातृत्व और प्रेम की वह नीतियां जो भारत के वैदिक धर्म की मूलभूत संरचना को प्रकट करती हैं और मार्क्स की दीन – हीन लोगों के प्रति सहानुभूति ही भविष्य के विश्व की नीतियां होंगी । यहां पर यह नहीं देखना है कि वह गांधी और मार्क्स से कितने प्रभावित थे ? देखने की बात केवल यह है कि दिनकर जी ने विश्व शांति के लिए इस प्रकार की नीतियों को उचित माना । यदि शासक वर्ग पूर्ण निष्ठा से इस प्रकार की नीतियों को अपनाए और बिना किसी पक्षपात के सभी के साथ न्याय करने का संकल्प ले तो निश्चय ही विश्व को पुनः एक परिवार बनाया जा सकता है।
रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘ किसी भी प्रकार की ऐसी तटस्थता या पक्षपात की भावना के विरोधी हैं , जो किसी वर्ग विशेष के साथ अन्याय करने के लिए हमको प्रेरित करे । जातीय या सांप्रदायिक आधार पर वह किसी भी प्रकार के तुष्टीकरण को स्वीकार नहीं करते । इसलिए जहां वह गांधी की नीतियों को कहीं अपने लिए स्वीकार्य मान रहे हैं तो वही वह यह भी कहते हैं :–

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध

तटस्थता हमसे पाप करवाती है और संसार को किसी ऐसी अनहोनी की ओर लेकर चलती है जो भारी विनाश का प्रतीक हो सकती है । इसलिए संपूर्ण वसुधा को किसी भी भावी संकट से बचाने के लिए वह देश , समाज , राष्ट्र और विश्व के जिम्मेदार लोगों को यह संदेश दे रहे हैं कि जो तटस्थ हैं , समय उनका भी अपराध लिखेगा अर्थात वह व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को सचेत कर रहे हैं कि समय पर बोलो , जिससे अन्यायी लोगों को अन्याय करने का अवसर ही न मिले। यदि विश्व नेतृत्व आज भी समय पर न्यायसंगत बोलना आरंभ कर दे तो इस महान कवि का विश्व शांति और विश्व – बंधुत्व का सपना साकार हो सकता है ।
दिनकर जी मानवीय संवेदनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले कवि हैं । उनकी चेतना ने मानवीय संवेदना के साथ पूर्ण समन्वय स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है । इसी से उनकी साहित्यिक लेखन शैली में मानवतावाद सर्वत्र बिखर गया है । उन्होंने मनुष्य के विश्व मानस के उलझे हुए तारों को खोलने का हर संभव प्रयास किया है । यही कारण है कि उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्मविभूषण आदि सभी बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया गया ।
इसके अतिरिक्त दिनकर जी दो बार राज्यसभा के सदस्य भी रहे । दिनकर की चर्चित पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की प्रस्तावना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिखी है । इस प्रस्तावना में नेहरू ने दिनकर को अपना ‘साथी’ और ‘मित्र’ कहकर संबोधित किया है । दिनकर जी के लिए इन शब्दों का प्रयोग नेहरू ने इसीलिए किया था कि वह उनके अंतरराष्ट्रवाद के सपने को साकार करने में सच्चे सहायक सिद्ध हो सकते थे।
किसी कवि के विश्व मानस का धनी होने का पता लगाने के लिए सरल सा उपाय है कि ऐसे कवि या साहित्यकार के साहित्य का अनुशीलन करते समय यह देखा जाए कि उसकी लेखनी धरती पर चलते हुए गांव , क्षेत्र , तहसील ,जनपद ,प्रांत या देश की सीमाओं में उलझी पड़ी है या उसकी कल्पना ने ऊंची उड़ान भरकर इन सारी सीमाओं को तोड़कर अनंत की उड़ान भर ली है । यदि उसके पंखों में इतना बल है कि वह ऊंची उड़ान भर सकता है तो निश्चय ही वैश्विक मानस का धनी कवि व साहित्यकार उसे माना जाना चाहिए । असीम को पाने के लिए ससीम बने रहना , विशालता को धारण करने के लिए संकीर्ण बने रहना , अनंत को पाने के लिए सांत बने रहना और स्थिर को पाने के लिए अस्थिर बने रहना , कवि के लिए एक बंधन है । इन बंधनों को तोड़ने के लिए उसे चिंतन में व्यापकता देनी ही होती है और इस कसौटी पर हमारे रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘ जी सर्वांशत: खरे उतरते हैं।

माना कि उनकी उपरोक्त पुस्तक की भूमिका पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे शांति प्रिय प्रधानमंत्री ने लिखी , परंतु अपने लेखनी धर्म का कर्तव्य निर्वाह करते समय उन्होंने प्रत्येक काल के शासक को इस बात के लिए भी सचेत किया –

क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो ।
उसको क्या, जो दंतहीन, विषरहित, विनीत सरल हो।।

बात स्पष्ट है कि दिनकर जी किसी प्रकार के छद्मवाद के चक्कर में फंसना नहीं चाहते । वह अपने वैश्विक मानस को इस सत्य के साथ समायोजित करते हैं कि यदि आपके पास ब्रह्मबल के साथ-साथ क्षत्रबल नहीं है तो आपको कोई जीने नहीं देगा । अंतर्राष्ट्रीय शांति और विश्व – बंधुत्व की परिकल्पना तभी साकार हो सकती है जब दुष्ट और राक्षस प्रवृत्ति के लोगों के लिए आपके पास क्षत्रबल भी पर्याप्त मात्रा में हो , अन्यथा आपकी अहिंसा या आपके प्रेम और बंधुत्व के भावों को लोग उपहास की दृष्टि से देखेंगे – यही एक व्यावहारिक सत्य है । ऐसा नहीं है कि यह सत्य वैश्विक शांति की स्थापना में कहीं आड़े आता है , अपितु वह विश्व शांति को और भी अधिक प्रबल करता है । मानो ऐसा कहकर दिनकर जी वेद की इस बात को ही स्पष्ट कर रहे हैं कि- ” वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति ” – क्योंकि वह दुष्टों और अत्याचारियों का विनाश करने के लिए होती है । इसलिए दिनकर जी का यह स्पष्टवादी चिंतन विश्व के कल्याण के लिए ही है ।
दिनकर जी युद्ध को मानवता के लिये उचित नहीं मानते , परंतु थोपे गए युद्ध से पीठ फेरना या उसके लिए तैयारी ही न् करने को भी वह उचित नहीं मानते। यही कारण है कि वह 1946 ई0 में जहां ‘ कुरुक्षेत्र ‘ की रचना करते हैं , वहीं 1963 ई0 में वह ‘परशुराम की प्रतीक्षा ‘ की रचना करते हैं । यह वही समय था , जब हम चीन के हाथों पराजित हो चुके थे ।
इसका अभिप्राय है कि वह विश्व शांति के लिए युद्ध एक अभिशाप और युद्ध एक वरदान – के बीच समन्वय स्थापित करते हुए यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने के समर्थक थे । उनका स्पष्ट मानना था कि विश्व शांति में बाधक शक्तियों के विनाश के लिए युद्ध अनिवार्य होता है , यद्यपि युद्ध के लिए उतावला होना या अपनी ओर से आक्रामक होना उन्हें स्वीकार्य नहीं था । विश्व शांति के लिए भटकते आज के विश्व नेतृत्व के लिए राष्ट्रकवि दिनकर जी का यह चिंतन एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता है । ‘कुरुक्षेत्र ‘ और ‘परशुराम की प्रतीक्षा ‘ इन दोनों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रकवि दिनकर जी ने केवल यही संदेश देने का प्रयास किया है कि ‘ परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम् ‘ – ही विश्व शांति का मूल सूत्र है । इससे पलायन करना समझो विश्व को शत्रुओं , राक्षसों व अत्याचारियों के हाथों सौंप देना है।
‘ परशुराम की प्रतीक्षा ‘ से प्रभावित होकर ही हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने 1965 ई0 में ‘ जय जवान – जय किसान ‘ का नारा दिया था । उन्होंने किसान से पहले जवान को इसलिए रखा कि विश्व शांति के लिए ‘परशुराम ‘ बनना ही पड़ेगा । निश्चित रूप से इसमें हमारे इस विश्वकवि दिनकर जी की प्रेरणा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी।
अपनी निजता और सम्मान की सुरक्षा के लिए भारत का सामरिक शक्ति बनना दिनकर जी अनिवार्य मानते थे । एक सशक्त , समृद्ध ,सामरिक शक्ति संपन्न भारत ही विश्व शांति का ध्वजवाहक हो सकता है – यह उनकी सोच थी । जिसे 1974 ई0 में परमाणु पोखरण विस्फोट कर तत्कालीन नेतृत्व ने अपनी स्वीकृति प्रदान की।
‘ हिमालय’ में भी दिनकर जी ने अपने इसी चिंतन की झलक दी है :—

रे, रोक युधिष्ठिर को न यहां,
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर, फिरा हमें गाण्डीव-गदा,
लौटा दे अर्जुन-भीम वीर.

‘ युद्ध में भी धर्म और धर्म में भी युद्ध ‘ – की अनोखी भावना भारतीय वांग्मय में मिलती है । युद्ध में धर्म का निर्वाह करना बड़ा कठिन है , लेकिन यहां पर युद्ध प्रारंभ होने से पहले युद्ध के नियम बनते थे । जिन्हें अनिवार्य रूप से सबको पालन करना ही होता था। यही युद्ध में धर्म की भूमिका थी , जबकि धर्म में युद्ध अर्थात सज्जन शक्ति का विनाश करने वाले अधर्मियों का विनाश करने की तैयारी अथवा योजना को धर्म में युद्ध कहा जा सकता है । इसी भाव ,भावना और कामना को हमारे विश्वकवि दिनकर जी अपने वांग्मय में स्थान – स्थान पर उकेरते हुए दिखाई देते हैं। जब विश्व नेतृत्व युद्ध में अधर्म और अधर्म में युद्ध की योजनाओं में संलिप्त होता है तो मानवता विनाश की ओर बढ़ती है ।
जैसे कि आजकल आतंकवाद एक युद्ध है । इस युद्ध को लड़ने वाले देश जब पाकिस्तान के साथ कोई अन्य नीति अपनाते हैं और आतंकवाद की मार झेल रहे भारत के साथ दूसरी नीति अपनाते हैं , तो यह युद्ध में अधर्म है। जबकि सज्जन शक्ति का परिष्कार व कल्याण न करना , आतंकवादियों को संरक्षण देने की योजनाएं बनाना अधर्म में युद्ध की भावना को प्रकट करता है। यह सारे के सारे लक्षण विश्व को विनाश की ओर ले जाने के लक्षण हैं। इसको रोकने के लिए ही दिनकर जी अर्जुन और भीम की आवश्यकता अनुभव कर रहे हैं । उनके भीतर कोई अंतर्द्वंद नहीं है । वह पूर्णतया स्पष्ट हैं । उनका चिंतन शांति की बात करता है , परंतु वह शांति के शत्रुओं के विनाश के भी समर्थक हैं ।
जब राज धर्म का निर्वाह करने वाले लोग अपने राजधर्म के निर्वाह में चूक कर जाते हैं , या उसके निर्वाह में अपना पलायनवादी और कायरतावादी दृष्टिकोण प्रदर्शित करते हैं तो ऐसे शासक विश्व शांति के लिए खतरा होते हैं । जिन्हें जनता को हटाने का पूर्ण अधिकार होता है । भारत की प्राचीन परंपरा के दृष्टिगत ही विश्व शांति के समर्थक हमारे इस महान कवि ने यह लिखा :—

सदियों की ठंडी, बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है.
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.

यह कविता दिनकर जी ने भारत के प्रथम गणतंत्र के अवसर पर लिखी थी ।. ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पुस्तक के आरम्भ में दिनकर ने टैगोर की एक बांग्ला कविता का प्रयोग किया है:—-

हेथाय आर्य, हेथा अनार्य, हेथाय द्राविड़-चीन
शाक-हूण-दल, पाठान-मोगल एक देहे होलो लीन

अर्थात भारत में जितनी भी विदेशी जातियां आईं, वे सब भारत के महासमुद्र में विलीन हो गईं ।
जब वह ऐसा लिखते हैं तो कई उन इतिहासकारों और लेखकों की धारणाएं भूमिसात हो जाती हैं जो भारत की संस्कृति को अन्य संस्कृतियों को निगलने वाली संस्कृति मानते हैं । इसके विपरीत दिनकर जी भारत की संस्कृति को सर्व समन्वयी संस्कृति मानते हुए उसे सभी संस्कृतियों का मूल स्रोत मानते हैं । एक ऐसी संस्कृति मानते हैं जिससे सारी संस्कृतियां ऊर्जावान होती हैं । ऐसी संस्कृति किसी को निगलने की बात नहीं कर सकती , अपितु वह सब के साथ समन्वय स्थापित कर सबको अपनी अच्छाई उसी प्रकार प्रदान कर देती है जैसे सूर्य चुपचाप अपना प्रकाश चन्द्रमा को देकर उसे भी चमकने में सहायता प्रदान करता है। वास्तव में ऐसी संस्कृति ही विश्व शांति और वैश्विक मानस के धनी महान पुरुषों का निर्माण कर सकती है। इसी संस्कृति को दिनकर जी संसार के लिए उपयोगी मानते हैं।
दिनकर की पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ को भारत के भविष्य की कल्पना और भारत को समझने की दिशा में स्थापित किया गया एक मील का पत्थर कहकर परिभाषित किया जा सकता है। इसे कई लोगों ने पंडित जवाहरलाल नेहरू की ‘भारत की खोज ‘ नामक पुस्तक की पूरक पुस्तक के रूप में भी मान्यता देने का प्रयास किया है , परंतु हमारा मानना है कि ‘भारत की खोज ‘ और दिनकर जी की इस पुस्तक में भारी अंतर है। इस पुस्तक में भारतीय इतिहास, समाज, संस्कृति, धर्म और दर्शन का गहन अध्ययन समाविष्ट है। साथ ही मानव को व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाने का ऐसा उदात्त चिंतन भी प्रस्तुत किया गया है जो संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन और नेतृत्व कर सकता है।
हिंदू मुस्लिम एकता के लिए भी उन्होंने ऐसा रास्ता अपनाने का प्रयास जिसे एक व्यवहारिक दृष्टिकोण कहा जा सकता है इस संदर्भ में उन्होंने लिखा : — ‘हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए इतिहास की घटनाओं पर पर्दा नहीं डाला जा सकता , न यही योग्य है कि हम इस्लाम पर पड़ने वाले हिंदू प्रभाव अथवा हिंदुत्व पर पड़ने वाले मुस्लिम प्रभाव को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करें । जो बातें जैसी हैं, इतिहास में उनका वर्णन वैसा ही रहेगा । मुसलमानों को यह समझना होगा कि आदमी की धर्म-भक्ति और उनके स्वदेश प्रेम में विरोध नहीं है. अमीर खुसरो, जायसी, अकबर, रहीम, दाराशिकोह मुसलमान भी थे और भारत-भक्त भी । हिंदुओं को भी इस बात का ज्ञान प्राप्त करना है कि इस्लाम का भी अर्थ शांति-धर्म ही है । इस धर्म का मौलिक रूप अत्यंत तेजस्वी था तथा जिन लोगों ने इस्लाम की ओर से भारत पर अत्याचार किए, वे शुद्ध इस्लाम के प्रतिनिधि नहीं थे । इन अत्याचारों को हमें इसलिए भूलना है कि उनका कारण ऐतिहासिक परिस्थितियां थीं, जो अब समाप्त हैं और इसलिए भी कि उन्हें भूले बिना हम देश में एकता स्थापित नहीं कर सकते । ‘
वास्तव में दिनकर जी के माध्यम से भारत को समझने के लिए और भारत के सांस्कृतिक मूल्यों के अनुसार विश्व शांति को स्थापित करने के लिए ‘ संस्कृति के चार अध्याय ‘ नामक पुस्तक का अध्ययन बहुत आवश्यक है। इसमें दिनकर जी का वैश्विक मानस पूर्णतया परिलक्षित होता है । उन्होंने भारत की संस्कृति को विश्व संस्कृति के रूप में स्थापित करने में इस पुस्तक के माध्यम से सफलता प्राप्त की है ।
अंत में मैं इतना ही कहूंगा: —

दिनकर तुम ‘ दिनकर ‘ हो यह बात गर्व से कहते हम , मानवता के हितचिंतक हो मूल्यों का रक्षक कहते हम । साहित्यिक क्षेत्र में झलकता मानवतावादी चिंतन शुद्ध , भव्य भारत के उन्नायक हो संस्कृति पोषक कहते हम ।।

वैश्विक मानस के धनी और वैश्विक चिंतन के पुरोधा दिनकर जी को विश्वकवि के रूप में स्थापित करने का समय आ गया है । उनके व्यापक , विराट और चिंतनपरक साहित्य का समीक्षण , परीक्षण करते हुए उनकी चेतना के साथ तादात्म्य स्थापित कर उनके विशाल व्यक्तित्व के साथ अब न्याय होना ही चाहिए । दिनकर जी की महान मेधाशक्ति और साहित्यिक विलक्षणता को नमन करते हुए अपनी लेखनी को विराम देता हूं । इत्योमशम: ।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

निवास : सी ई – 121 , अंसल गोल्फ लिंक ,
तिलपता चौक , ग्रेटर नोएडा , जनपद गौतमबुद्ध नगर
पिन कोड : 2013 10 ( उत्तर प्रदेश )

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