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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्वगुरू के रूप में भारत-19

भारत की स्थापत्य कला में देखने वाली बात ये होती है कि हजारों वर्ष पूर्व निर्मित किये गये भव्य-भवन, राजप्रासाद, दुर्गादि के निर्माण में लोहे का प्रयोग नहीं किया गया है और ना ही सीमेंट प्रयोग हुआ है। परंतु उसके उपरांत भी ये भव्य-भवन, राजप्रासाद, दुर्गादि बहुत से भूकंपों और प्राकृतिक आपदाओं को झेलकर भी ठीक ठाक अवस्था में खड़े हैं। आज हम जो भी भवनादि बना रहे हैं-उनके निर्माण में आधुनिकतम तकनीक का प्रयोग करने के उपरांत भी उनकी आयु उतनी नहीं हो पाती, जितनी भारत के प्राचीन स्मारकों की हो चुकी है। इसका अभिप्राय है हमारे पूर्वज स्थापत्य कला के विषय में आज के इंजीनियरों से भी ऊंचा ज्ञान रखते थे।
भारत की संगीत कला
भारत के वेदादि धर्मग्रंथ पद्य में लिखे गये हैं। वैसे भी इस ब्रह्माण्ड की रचना ओ३म् की ध्वनि के संगीतमय फव्वारे के बीच हुई है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की ‘बिग बैंग थ्योरी’ भारत की देन है, जिससे एक अति मनोरम संगीत उत्पन्न हुआ और यह संसार बनने व रचने लगा। कहने का अभिप्राय है कि संगीत मानव से पूर्व भी था और जब संगीत था तो पद्य और गीतकार का होना भी अवश्यम्भावी है। वेद से अलग संसार के जो भी धर्मग्रंथ लिखे गये हैं-वे सभी गद्य में हैं। इसका अभिप्राय है कि वेद ने संगीत और मनुष्य के मार्मिक संबंध को अन्य धर्मग्रंथों की अपेक्षा कहीं अधिक गहराई से समझा है। भारत के धर्मग्रंथ वेद का पद्यात्मक शैली में होना यह बताता है कि उनका रचयिता अर्थात ईश्वर भी कवि है। कवि क्रान्तदर्शी होता है-तत्वदर्शी होता है और नवीनता व पुरातनता को इस प्रकार सिलता है कि वह सिलने के पश्चात सनातन बन जाता है। शाश्वत और सार्वभौम बन जाता है। वेद की रचना कविता में हुई-जिसे कोई क्रांतदर्शी ही कर सकता है। अत: जिसके धर्मग्रंथ का रचयिता स्वयं कवि हो उसका संगीतप्रेमी होना स्वाभाविक है।
जब सृष्टि का निर्माण हुआ तो उस समय एक ध्वनि (ओ३म् की ध्वनि) गंूज रही थी। यह ध्वनि संगीतमयी थी। जिसने संगीत के संसार की रचना की। वैज्ञानिकों का मानना है कियह सूर्य आज भी ओ३म् की ध्वनि का संगीत बजा रहा है। उसकी किरणों से ओ३म् की ध्वनि गूंज रही है। कहने का अभिप्राय है कि संगीत और मनुष्य का शाश्वत संबंध है।
भारत ने संगीत को सृष्टि के रोम-रोम में और कण-कण में पहचाना और जाना है। इसे पश्चिमी जगत का विज्ञान आज तक भी नहीं पहचान पाया है। संगीत से नृत्य की उत्पत्ति होती है। संगीत संगीतकार को थिरकने के लिए प्रेरित करता है। उसी थिरकन से नृत्य की उत्पत्ति होती है। हमारा मानना है कि संगीत पहले है, उसकी प्रतिक्रिया नृत्य है और नृत्य को ऊंचाई देने के लिए वाद्य कला उसके पश्चात है।
नाट्यकला
भारत में नाट्यकला भगवान शंकर के ताण्डव नृत्य के रूप में प्राचीनकाल से उपलब्ध मानी जाती है। आजकल नाट्यकला एक व्यवसाय के रूप में आ गयी है, अन्यथा प्राचीनकाल में यह व्यक्ति के या महिला के शारीरिक स्वास्थ्य एवं सौंदर्य को चिरस्थायी रखने और उसे आत्मिक प्रसन्नता प्रदान करने के लिए किया जाता था। उस समय इसे ईश्वरीय देन माना जाता था। आज भी देखा जाता है कि जैसे ही हमारे हृदय में प्रसन्नता का कोई भाव प्रकट होता है वैसे ही हमारे पैर नृत्य के लिए थिरकने लगते हैं। इस प्रकार नृत्य और हृदय की प्रसन्न्ता का गहरा संबंध है। हमारे धर्म शास्त्रों में और वैदिक ग्रंथों में संगीत एवं नाट्यकला के विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। नारद का वीणावादन, श्रीकृष्ण की वंशी और महादेव का डमरू भारत में आज भी प्रसिद्घ हैं।
हमारे राजाओं के राज्याभिषेकों के अवसरों पर या विवाहादि समारोहों के अवसर पर संगीत, नृत्य एवं वाद्ययंत्रों का भरपूर प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार भारत में संगीत, नृत्य एवं वाद्यकला इतनी पुरानी है-जिसकी संसार के अन्य देश कल्पना भी नहीं कर सकते। पश्चिमी जगत नृत्यादि की कला को आज भी सीख रहा है। उसका संगीत, नृत्य और वाद्ययंत्र इतने हृदयस्पर्शी नहीं हैं-जितने भारत के रहे हैं। भारत में आजकल की फिल्मों में पश्चिमी संगीत, नृत्य एवं वाद्ययंत्रों का प्रयोग बढ़ा है-पर लोग उसे पसंद नहीं कर रहे हैं। आज भी लोग भारत की पुरानी फिल्मों के पुराने गानों को इसलिए पसंद करते हैं कि उनका संगीत, नृत्य और वाद्ययंत्र सभी शालीन थे, मर्यादित थे और लोगों को उनका अर्थ समझ में आता था। कहने का अभिप्राय है कि पश्चिम का अंधानुकरण करते भारत में भी यदि पश्चिमी संगीत, नृत्य एवं वाद्यकला को नकारा जा रहा है तो इसका अभिप्राय है कि भारत का संगीत, नृत्य व वाद्ययंत्र समय की कसौटी पर खरा उतर चुका है। हर भारतीय को अपने संगीत, नृत्य और वाद्यकला से आत्मिक प्रसन्नता की अनुभूति होती है।
वेशभूषा एवं अलंकार
पश्चिमी जगत हो या संसार का कोई अन्य क्षेत्र हो-ये 15वीं 16वीं सदी तक भी जंगली रूप में रहते थे। यहां तक कि ब्रिटेन भी (इंग्लैंड के रूप में) जंगली देशों की गिनती में ही आता था। उसकी अंग्रेजी भाषा भी वहां मूर्खों, अज्ञानियों और ज्ञान के क्षेत्र में बहुत पिछड़े हुए लोगों की भाषा मानी जाती थी। यही कारण रहा कि अज्ञान और अशिक्षा के कारण ये देश बहुत पिछड़े हुए थे। वास्तव में ये देश जंगली, लुटेरी जातियों से बने थे। लुटेरों का सरदार ही अपने क्षेत्र की जनता का राजा बन जाता था। पश्चिमी जगत में राज्य की उत्पत्ति के सिद्घांतों में एक सिद्घांत यह भी है कि एक समय ऐसा था जब कुछ लोगों में से सर्वाधिक बलशाली व्यक्ति उनका राजा बन जाता था।
यह सिद्घांत बताता है कि उनके राजा के बनने की प्रक्रिया ही तानाशाही वाली है। ऐसे में उन लोगों की कला के क्षेत्र में विकास की अपेक्षा करना बेमानी है। ये लोग तो उस समय वस्त्राभूषण पहनना या अलंकार ग्रहण करने की सोच भी नहीं सकते थे-जब भारत में बड़े-बड़े कारखाने वस्त्रों का निर्माण कर रहे थे और लोग विभिन्न प्रकार के वस्त्राभूषण व अलंकरणों को ग्रहण करने लगे थे।
भारत में कर्म के अनुसार अथवा वर्णगत व्यवस्था के अनुसार वस्त्राभूषण और अलंकरण पहनने की परंपरा रही है। आजकल किसी कंपनी, संस्थान, विद्यालय आदि का एक जैसा गणवेश रखने की परंपरा है-यह भारत की वर्णगत व्यवस्था के अनुसार वस्त्र धारण करने की परंपरा का ही अनुकरण है। भारत में देहात में कहावत है कि ‘जैसा देश वैसा भेष’ रखना चाहिए इसका अभिप्राय भी यही है कि जैसे स्थान पर (देश में) आप हैं-उसी के अनुसार अपना भेष रखो। इससे हमारे ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य व शूद्र की पहचान अपने आप हो जाती थी। इतना ही नहीं राजकर्मचारियों और सैन्य बलों में सम्मिलित लोगों की भी जानकारी उनके गणवेश से हो जाती थी। इस कला को शेष विश्व ने भारत से सीखा।
 हमारे घरों में शय्या सजाना भी एक कला थी। भवनों में शयन कक्ष अलग रखने, प्रसूतिगृह अलग बनाने तथा कोपभवन तक अलग रखने की व्यवस्था की गयी थी। कितनी सुंदर व्यवस्था थी कि यदि आप क्रोध में हैं तो उसका कोप झाडऩे के लिए आप अपने भवन के एक विशेष कमरे में जाएंगे ना कि सारे भवन को ही कुपित करते रहेंगे। कोपभवन में प्रवेश करने वाले व्यक्ति के वस्त्र व आभूषण भी अलग होते थे। इस प्रकार भारत में वस्त्रधारण एवं अलंकार ग्रहण में भी पूरी एक व्यवस्था वैज्ञानिक ढंग से विकसित कर ली थी।
रसायन मिश्रण अन्य 64 कलाएं
रसायन मिश्रण की कला भी भारत में ही जन्मी है और भारत के लोगों ने इस रसायन मिश्रण का भली प्रकार प्रयोग किया है। स्वर्ण जैसी धातुओं को और अनेक औषधियों के साथ मिला देने का नाम एक कला है। इस मिश्रण को फिर अलग-अलग कर देने का नाम भी ‘कला’ ही माना गया है।
क्रमश:

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