सत्यार्थ प्रकाश – चतुर्थ समुल्लास – नियोग प्रकरण

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पति और स्त्री का वियोग दो प्रकार का होता है-
[प्रथम], कहीं कार्यार्थ देशान्तर में जाना और
दूसरा, मृत्यु से वियोग होना।
इनमें से प्रथम का उपाय यही है कि दूर देश में यात्रार्थ जावे तो स्त्री को भी साथ रक्खे। इसका प्रयोजन यह है कि बहुत समय तक वियोग न रहना चाहिये।

प्रश्न- स्त्री और पुरुष के बहु-विवाह होने योग्य हैं वा नहीं?
उत्तर- युगपत् न अर्थात् एक समय में नहीं।

प्रश्न-क्या समयान्तर में अनेक विवाह भी होने चाहियें?९
उत्तर-हां, जैसे-
या स्त्री त्वक्षतयोनिः स्याद् गतप्रत्यागतापि वा।
पौनर्भवेन भा सा पुनः संस्कारमर्हति॥१॥ [मनु० ९ । १७६]
जिस स्त्री वा पुरुष का पाणिग्रहणसंस्कार-मात्र हुआ हो और संयोग न हुआ हो अर्थात् अक्षतयोनि स्त्री [और]३ अक्षतवीर्य पुरुष हो तो उस स्त्री वा पुरुष का अन्य पुरुष वा स्त्री से पुनर्विवाह होना चाहिये। और शूद्रवर्ण में चाहे कैसा ही हो, पुनर्विवाह हो सकता है, किन्तु ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्गों में क्षतयोनि स्त्री [और] क्षतवीर्य पुरुष का पुनर्विवाह न होना चाहिये।

प्रश्न-पुनर्विवाह में क्या दोष हैं ?
उत्तर-(पहला) स्त्री-पुरुष में प्रेम न्यून होना। क्योंकि जब चाहे तब पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष छोड़ कर दूसरे के साथ सम्बन्ध कर ले।
(दूसरा) जब स्त्री वा पुरुष, पति [वा] स्त्री के मरने के पश्चात् दूसरा विवाह करना चाहेंगे, तब पूर्व-पति वा प्रथम-स्त्री के पदार्थों को उड़ा ले जाना और उनके कुटुम्बवालों का उनसे झगड़ा करना।
(तीसरा) बहुत-से भद्रकुलों का नाम वा चिह्न भी न रहकर, उनके पदार्थ छिन्न-भिन्न हो जाना।
(चौथा) पातिव्रत्य और स्त्रीव्रत धर्म नष्ट होना।
इत्यादि दोषों के अर्थ द्विजों में पुनर्विवाह वा अनेक विवाह कभी न होने चाहिये।

प्रश्न-जब वंशच्छेदन हो जायगा, तब उसका कुल भी नष्ट हो जायगा। और स्त्री-पुरुष व्याभिचारादि कर्म करके गर्भपातनादि बहुत-से दुष्ट कर्म करेंगे। इसलिये पुनर्विवाह का होना अच्छा है।
उत्तर-नहीं; क्योंकि जो स्त्री-पुरुष ब्रह्मचर्य में स्थित रहना चाहें, तो कोई भी उपद्रव न होगा। और जो कुल की परम्परा रखने के लिये कोई स्वजाति का लड़का गोद ले लेंगे, उससे कुल चलेगा और
व्यभिचार भी न होगा। और जो ब्रह्मचर्य न रख सकें तो नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कर लें।

प्रश्न-पुनर्विवाह और नियोग में क्या भेद है?
उत्तर-(पहला) जैसे विवाह करने में कन्या अपने पिता का घर छोड़ पति के घर को प्राप्त होती है और पिता से विशेष सम्बन्ध नहीं रहता; किन्तु विधवा स्त्री उसी विवाहित पति के घर में रहती है।
(दूसरा) उसी विवाहिता स्त्री के लड़के उसी विवाहित पति के दायभागी होते हैं। और विधवा स्त्री के लड़के वीर्यदाता के न पुत्र कहलाते, न उसका गोत्र होता, और न उसका स्वत्व उन लड़कों पर रहता [है], किन्तु वे मृतपति के पुत्र बजते, उसी का गोत्र रहता और उसी के पदार्थों के दायभागी होकर उसी के घर में रहते हैं।
(तीसरा) विवाहित स्त्री-पुरुष को परस्पर-सेवा और पालन करना आवश्यक है, और नियुक्त स्त्री-पुरुष का [ऐसा] कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता।
(चौथा) विवाहित स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध मरणपर्यन्त रहता है और नियुक्त स्त्री-पुरुष का कार्यसिद्धि के पश्चात् छूट जाता है।
(पांचवां) विवाहित स्त्री-पुरुष आपस में गृह के कार्यों की सिद्धि करने में यत्न किया करते हैं और नियुक्त स्त्री-पुरुष अपने-अपने घर के काम किया करते हैं।

प्रश्न-विवाह और नियोग के नियम एक-से हैं, वा पृथक्-पृथक् ?
उत्तर-कुछ थोड़ा-सा भेद है। जितने पूर्व कह आये, और दूसरा यह कि विवाहित स्त्री-पुरुष एक पति और एक ही स्त्री मिलके दश सन्तान तक उत्पन्न कर सकते हैं और नियुक्त स्त्री-पुरुष दो वा चार से अधिक सन्तानोत्पत्ति नहीं कर सकते। अर्थात् जैसे’ कुमार-कुमारी का ही विवाह होता है, वैसे जिसकी स्त्री वा पुरुष मर जाता है, उन्हीं का नियोग होता है, कुमार-कुमारी का नहीं। जैसे विवाहित स्त्री-पुरुष सदा सङ्ग में रहते हैं, वैसे नियुक्त स्त्री-पुरुष का व्यवहार नहीं, किन्तु विना ऋतुदान के समय एकत्र न हों। जो स्त्री अपने लिये नियोग करे, तो जब दूसरा गर्भ रहै, उसी दिन से स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध छूट जाय। और जो पुरुष अपने लिये करे तो भी दूसरा गर्भ रहने से सम्बन्ध छूट जाय। परन्तु वही नियुक्त स्त्री दो-तीन वर्ष पर्यन्त उन सन्तानों का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देवे। ऐसे एक विधवा स्त्री दो अपने लिये और दो-दो अन्य चार नियुक्त पुरुषों के लिये सन्तान कर सकती है और एक मृतस्त्रीक-पुरुष भी दो अपने लिये और दो-दो अन्य-अन्य चार विधवाओं के लिये सन्तान उत्पन्न कर सकता है। ऐसे मिलकर दस-दस सन्तानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है। जैसे –
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगो कृणु।
दास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि॥
ऋ०, म० १० । सूक्त ८५ । मं० ४५॥
हे (मीढ्वः, इन्द्र०) वीर्यसेचन में समर्थ ऐश्वर्ययुक्त पुरुष! तू इस विवाहित स्त्री वा विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य-युक्त कर। इस विवाहित स्त्री में दश पुत्र’ उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्रि! तू भी विवाहित पुरुष वा नियुक्त पुरुषों से दश सन्तान उत्पन्न कर और ग्यारहवाँ पति को समझ।

वेद की इस आज्ञा से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यवर्णस्थ स्त्री और पुरुष दस-दस सन्तान से अधिक उत्पन्न न करें; क्योंकि अधिक करने से सन्तान निर्बल, निर्बुद्धि, अल्पायु होते हैं और स्त्री तथा पुरुष भी निर्बल, अल्पायु और रोगी होकर वृद्धावस्था में बहुत-से दुःख पाते हैं।

प्रश्न-यह नियोग की बात व्यभिचार के समान दीखती है।
उत्तर-जैसे विना विवाहितों का व्यभिचार होता है, वैसे विना नियुक्तों का व्यभिचार कहाता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जैसे नियम से विवाह होने पर व्यभिचार नहीं कहाता, तो नियमपूर्वक नियोग होने से व्यभिचार न कहावेगा। जैसे दूसरे की लड़की का दूसरे के लड़के के साथ शास्त्रोक्त विधिपूर्वक विवाह होने पर समागम में व्यभिचार, पाप वा लज्जा नहीं होती, वैसे ही वेदशास्त्रोक्त नियोग में व्यभिचार, पाप, वा लज्जा न माननी चाहिये।

प्रश्न- है तो ठीक, परन्तु यह वेश्या के सदृश कर्म दीखता है।
उत्तर- नहीं, क्योंकि वेश्या के समागम में कोई निश्चित पुरुष वा कोई नियम नहीं है और नियोग में विवाह के समान नियम हैं। जैसे दूसरे को लड़की देने, दूसरे के साथ समागम करने में विवाहपूर्वक लज्जा नहीं होती, वैसे ही नियोग में भी न होनी चाहिये। क्या जो व्यभिचारी पुरुष वा स्त्री होते हैं, वे विवाह होने पर भी कुकर्म से बचते हैं?

प्रश्न- हमको नियोग की बात में पाप मालूम पड़ता है।
उत्तर- जो नियोग की बात में पाप मानते हो तो विवाह में पाप क्यों नहीं मानते? पाप तो नियोग के रोकने में है। क्योंकि ईश्वर के सृष्टिक्रमानुकूल स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक व्यवहार रुक ही नहीं
सकते; सिवाय वैराग्यवान्, पूर्णविद्वान् योगियों के। क्या गर्भपातनरूप भ्रूणहत्या और विधवा स्त्रियों और मृतस्त्रीक-पुरुषों के महासन्ताप को पाप नहीं गिनते हो? क्योंकि जब तक वे युवावस्था में हैं, [तब तक] मन में सन्तानोत्पत्ति और विषय की चाहना होनेवालों को, किसी राजव्यवहार वा जातिव्यवहार से रुकावट होने से, गुप्त-गुप्त कुकर्म बुरी चाल से होते रहते हैं। इस व्यभिचार और कुकर्म के रोकने का एक यही श्रेष्ठ उपाय है कि जो जितेन्द्रिय रह सकें, वे विवाह वा नियोग भी न करें तो ठीक है। परन्तु जो ऐसे नहीं हैं, उनका विवाह और आपत्काल में नियोग अवश्य होना चाहिये।
इससे व्यभिचार का न्यून होना, प्रेम से उत्तम सन्तान होकर मनुष्यों की वृद्धि होना सम्भव है, और गर्भहत्या सर्वथा छूट जाती है। नीच पुरुषों से उत्तम स्त्रियों और वेश्यादि नीच स्त्रियों से उत्तम पुरुषों का व्यभिचाररूप कुकर्म, उत्तम कुल में कलंक, वंश का उच्छेद, स्त्री-पुरुषों का सन्ताप और गर्भहत्यादि कुकर्म विवाह और नियोग से निवृत्त होते हैं, इसलिये नियोग करना चाहिये।

प्रश्न–नियोग में क्या-क्या बातें होनी चाहियें?
उत्तर- जैसे प्रसिद्धि से विवाह [होता है], वैसे ही प्रसिद्धि से नियोग [होना चाहिये]। जैसे विवाह में भद्र पुरुषों की अनुमति और कन्या-वर की प्रसन्नता होती है, वैसे नियोग में भी होती है। अर्थात् जब स्त्री-पुरुष का नियोग होना हो, तब अपने कुटुम्ब में पुरुषों-स्त्रियों के सामने [प्रकट करें कि] “हम दोनों नियोग सन्तानोत्पत्ति के लिये करते हैं। जब नियोग का नियम पूरा होगा, तब हम संयोग न करेंगे। जो अन्यथा करें तो पापी, और जाति वा राज के दण्डनीय हों। महीने-महीने में एकवार गर्भाधान का कर्म करेंगे, गर्भ रहे पश्चात् एक वर्ष पर्यन्त पृथक् रहेंगे।”

प्रश्न– नियोग अपने वर्ण में होना चाहिये वा अन्य वर्णस्थ के साथ भी?
उत्तर- अपने वर्ण में वा अपने से उत्तमवर्णस्थ पुरुष के साथ। अर्थात् वैश्या स्त्री वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण के साथ, क्षत्रिया क्षत्रिय और ब्राह्मण के साथ, ब्राह्मणी ब्राह्मण के साथ नियोग कर सकती है। इसका तात्पर्य यह है कि वीर्य सम वा उत्तम वर्ण का [होना]” चाहिये, अपने से नीचे के वर्ण का नहीं। स्त्री और पुरुष की सृष्टि का यही प्रयोजन है कि धर्म से अर्थात् वेदोक्त रीति से विवाह वा नियोग से सन्तानोत्पत्ति करना।

प्रश्न- पुरुष को नियोग करने की क्या आवश्यकता है, क्योंकि वह दूसरा विवाह कर लेगा।
उत्तर- हम लिख आये हैं [कि] द्विजों में स्त्री और पुरुष का एक वार ही विवाह होना वेदादि-शास्त्रों में लिखा है, द्वितीय वार नहीं। कुमार और कुमारी का ही विवाह होने में न्याय [है] और विधवा स्त्री के साथ कुमार पुरुष और कुमारी स्त्री के साथ मृतस्त्रीक-पुरुष का विवाह होने में अन्याय अर्थात् अधर्म है। जैसे विधवा स्त्री के साथ कुमार’ पुरुष विवाह नहीं किया चाहता, वैसे ही विवाह और स्त्री से समागम किये हुए पुरुष के साथ विवाह करने की इच्छा कुमारी भी न करेगी। जब विवाह किये हुए पुरुष का कोई कुमारी कन्या [ग्रहण न करेगी] और विधवा स्त्री का ग्रहण कोई कुमार पुरुष न करेगा, तब पुरुष और स्त्री को नियोग करने की आवश्यकता होगी। और यही धर्म है कि जैसे के साथ वैसे का ही सम्बन्ध होना चाहिये।

प्रश्न-जैसे विवाह में वेदादि-शास्त्रों का प्रमाण है, वैसे नियोग में प्रमाण है वा नहीं?
उत्तर-इस विषय में बहुत प्रमाण हैं, देखो और सुनो-
कुह स्विदोषा कुह वस्तौरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहौषतुः।
को वौ शयुत्रा विधवैव देवरं मर्यं न यो| कृणुते सधस्थ आ॥१॥
ऋ०, म० १० । सूक्त ४० । मं० २॥
उदीर्घ नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप॑ शेष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वम॒भि सं बभूथ॥२॥
ऋ०, म० १० । सूक्त १८ । मं०८॥
हे (अश्विना) स्त्री-पुरुषो! जैसे (देवरं विधवेव) देवर को विधवा और (योषा मर्यं न) विवाहिता स्त्री अपने पति को (सधस्थे) समान स्थान शय्या में एकत्र होकर सन्तानों को (आ कृणुते) सब प्रकार से उत्पन्न करती है, वैसे तुम दोनों स्त्री पुरुष (कुहस्विघोषा) कहां रात्रि और (कुह वस्तः) कहां दिन में वसे थे? (कुहाभिपित्वम्) कहां पदार्थों की प्राप्ति (करतः) की? और ( कुहोषतुः) किस समय कहां वास करते थे? (को वां शयुत्रा) तुम्हारा शयनस्थान कहां है? तथा कौन वा किस देश के रहने वाले हो? इससे यह सिद्ध हुआ कि देश-विदेश में स्त्री-पुरुष संग में ही रहैं। और विवाहित पति के समान नियुक्त पति को ग्रहण करके विधवा स्त्री भी सन्तानोत्पत्ति कर लेवे ॥१॥

प्रश्न-जिस विधवा का देवर अर्थात् पति का छोटा भाई न हो तो नियोग किसके साथ करे?
उत्तर-देवर के साथ। परन्तु देवर शब्द का अर्थ जैसा तुम समझे हो, वैसा नहीं [है] । देखो, ‘निरुक्त’ में-
“देवरः कस्माद् द्वितीयो वर उच्यते॥” निरुक्त, अ० ३। खण्ड १५ ॥
‘देवर’ उसको कहते हैं कि जो विधवा का दूसरा पति होता है, चाहे छोटा भाई वा बड़ा भाई, अथवा अपने वर्ण वा अपने से उत्तम वर्ण वाला हो; जिससे नियोग करे, उसी का नाम ‘देवर’१ है॥१॥
हे (नारि) विधवे! तू ( एतं गतासुम् ) इस मरे हुए पति की आशा छोड़के (शेषे) बाकी पुरुषों में से (अभिजीवलोकम् ) जीते हुए दूसरे पति को (उपैहि) प्राप्त हो और (उदीर्ध्व) इस बात का
विचार और निश्चय रख कि जो (हस्तग्राभस्य दिधिषोः ) तुझ विधवा के पुनः पाणिग्रहण करनेवाले नियुक्त पति के सम्बन्ध के लिये नियोग होगा तो (इदम् ) यह (जनित्वम्) जना हुआ बालक उसी नियुक्त (पत्युः) पति का होगा और जो तू अपने लिये नियोग करेगी तो यह सन्तान (तव) तेरा होगा; ऐसे निश्चययुक्त (अभि सम् बभूथ) हो, और नियुक्त पुरुष भी इसी नियम का पालन करे॥२॥
अदैवृघ्न्यपतिनीहैधि शिवा पशुभ्यः सुया सुवर्चाः।
प्रजावती वीरसूर्दैवृकामा स्योनेममग्निं गार्हपत्यं सपर्य॥२
अथर्व०, कां० १४ । [प्रपा० २९ सूक्त २।] अनु० २। मं० १८॥
हे (अपतिघ्नि-अदेवृघ्नि) पति और देवर को दुःख न देनेवाली स्त्रि! तू (इह) इस गृहाश्रम में, (पशुभ्यः) पशुओं के लिये, (शिवा) कल्याण करनेहारी, (सुयमा) अच्छे प्रकार धर्मनियम में चलने
[वाली] (सुवर्चाः) रूप और सर्वशास्त्रविद्यायुक्त, (प्रजावती) उत्तम-पुत्र-पौत्रादि-सहित, (वीरसूः) शूरवीर पुत्रों को जनने, (देवृकामा) देवर की कामना करने (स्योना) और सुख देने हारी, पति वा
देवर को, (एधि) प्राप्त होके, (इमम् ) इस, (गार्हपत्यम् ) गृहस्थसम्बन्धी, (अग्निम् ) अग्निहोत्र को, (सपर्य) सेवन किया कर।
“तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः॥”
मनु० [९।६९]
जो अक्षतयोनि स्त्री विधवा हो जाय, तो पति का निज छोटा भाई भी उससे विवाह कर सकता है।

प्रश्न-एक स्त्री वा पुरुष कितने नियोग कर सकते हैं? और विवाहित [एवं] नियुक्त पतियों का नाम क्या होता है?
उत्तर- सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः।
तृतीयौ अनिष्ट पतिस्तुरीयस्ते मनुष्य॒जाः॥
ऋ०, म० १० । सूक्त ८५ । मं० ४०॥
हे स्त्रि! जो (ते) तेरा (प्रथमः ) पहिला विवाहित (पतिः) पति तुझको (विविदे) प्राप्त होता है, उसका नाम (सोमः) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से ‘सोम’; जो दूसरा नियोग होने से ( विविदे) प्राप्त
होता है, वह (गन्धर्वः) स्त्री से [दूसरा] सम्भोग करने से ‘गन्धर्व’; जो (तृतीय उत्तरः) दो के पश्चात् तीसरा पति होता है, वह (अग्निः) अत्युष्णतायुक्त होने से ‘अग्नि’ संज्ञक; और जो (ते) तेरे
(तुरीयः) चौथे से लेके ग्यारहवें [पुरुष के रूप में अपने पति को मानने] तक नियोग में पति होते हैं, वे (मनुष्यजाः) ‘मनुष्य’ नाम से कहाते हैं। जैसे (इमां त्वमिन्द्र०) इस मन्त्र में [निर्देश है कि] ग्यारहवें पुरुष [के रूप में अपने पति को मानने] तक स्त्री नियोग कर सकती है, वैसे पुरुष भी ग्यारहवीं स्त्री [के रूप में अपनी पत्नी को मानने] तक नियोग कर सकता है।

प्रश्न-‘एकादश’ शब्द से [अपने विवाहित पति से उत्पन्न] दश पुत्र और ग्यारहवां [अपने] पति को क्यों न गिनें?
उत्तर-जो ऐसा अर्थ करोगे तो ‘विधवेव देवरम्’ [ऋग्० १०।४०।२] ‘देवरः कस्माद् द्वितीयो वर उच्यते’ [निरुक्त ३ । १५] ‘अदेवृघ्नि’ [अथर्व० १४ । २ । १८] और ‘गन्धर्वो विविद उत्तरः’ [ऋग्० १०। ८५ । ४०] इत्यादि वेदप्रमाणों से विरुद्धार्थ होगा; क्योंकि तुम्हारे अर्थ से [तो] दूसरा पति ही प्राप्त नहीं हो सकेगा [जबकि इनमें दूसरे, तीसरे, चौथे नियुक्त पति का स्पष्ट उल्लेख है] ।
देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यनियुक्तया।
प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ॥१॥
ज्येष्ठो यवीयसो भार्यां यवीयान्वाग्रजस्त्रियम्।
पतितौ भवतो गत्वा नियुक्तावप्यनापदि॥२॥
औरसः क्षेत्रजश्चैव०॥३॥
मनु० [९।५९, ५८, १५९]
इत्यादि मनु जी ने लिखा है कि (सपिण्ड) अर्थात् पति की छ: पीढ़ियों में पति का छोटा वा बड़ा भाई अथवा स्ववर्णस्थ तथा अपने से उत्तम वर्णस्थ पुरुष से विधवा स्त्री का नियोग होना चाहिये।
परन्तु जो वह मृतस्त्रीक-पुरुष और विधवा स्त्री सन्तानोत्पत्ति की इच्छा करती हो, तो नियोग होना उचित है। और जब सन्तान का सर्वथा क्षय हो, तब नियोग होवे॥१॥
जो आपत्काल के विना अर्थात् सन्तानों के होने की इच्छा न होने पर, बड़े भाई की स्त्री से छोटे का और छोटे की स्त्री से बड़े भाई का नियोग होकर सन्तानोत्पत्ति हो जाने पर भी, पुनः वे नियुक्त भी आपस में समागम करें तो पतित हो जायें; अर्थात् एक नियोग में दूसरे पुत्र के गर्भ रहने तक नियोग की अवधि है, इसके पश्चात् समागम न करें॥२॥
और जो दोनों के लिये नियोग हुआ हो, तो चौथे गर्भ तक, अर्थात् पूर्वोक्त रीति से दश सन्तान तक हो सकते हैं। पश्चात् विषयासक्ति गिनी जाती है, इससे वे पतित गिने जाते हैं। और जो विवाहित स्त्री पुरुष भी दशवें गर्भ से अधिक समागम करें, तो कामी और निन्दित होते हैं। अर्थात् विवाह वा नियोग सन्तानों के ही अर्थ किये जाते हैं, पशुवत् कामक्रीड़ा के लिये नहीं।

प्रश्न–नियोग मरे पीछे ही होता है वा पति के जीते भी?
उत्तर-जीते भी होता है-
“अन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्॥” ऋ०, म० १०। सूक्त १०। [मन्त्र १०] ॥
जब पति सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ होवे, तब अपनी स्त्री को आज्ञा देवे कि हे ‘सुभगे! = सौभाग्य की इच्छा करनेहारी स्त्री तू (मत् ) मुझ से (अन्यम् ) दूसरे पति की (इच्छस्व) इच्छा कर, क्योंकि अब मुझसे सन्तानोत्पत्ति न हो सकेगी।’ तब स्त्री दूसरे से नियोग करके सन्तानोत्पत्ति करे’, परन्तु उस विवाहित महाशय पति की सेवा में तत्पर रहै। वैसे ही स्त्री भी जब रोगादि दोषों से ग्रस्त होकर सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ होवे, तब अपने पति को आज्ञा देवे कि हे स्वामी! आप मुझसे सन्तानोत्पत्ति की इच्छा छोड़के, किसी दूसरी विधवा स्त्री से नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कीजिये। जैसे कि पाण्डु राजा की स्त्री कुन्ती और माद्री आदि ने किया और जैसे व्यास जी ने चित्राङ्गद और विचित्रवीर्य के
मर जाने के पश्चात् उस अपने भाई [विचित्रवीर्य] की स्त्रियों से नियोग करके अम्बिका में धृतराष्ट्र और अम्बालिका में पाण्डु और दासी६ में विदुर की उत्पत्ति की, इत्यादि इतिहास भी इस बात में प्रमाण हैं।
प्रोषितो धर्मकार्यार्थं प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः।
विद्यार्थं षड् यशोऽर्थं वा कामार्थं त्रींस्तु वत्सरान्॥१॥
वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा।
एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी॥२॥ मनु० [९।७६, ८१]
विवाहित स्त्री, जो विवाहित पति धर्म के अर्थ परदेश गया हो तो आठ वर्ष, विद्या और कीर्ति के लिये गया हो तो छ:, और धनादि कामना के लिये गया हो तो तीन वर्ष तक वाट देखके, पश्चात्
नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कर ले। जब विवाहित पति आवे, तब नियुक्त पति छूट जावे॥१॥
वैसे ही पुरुष के लिये भी नियम है। जब विवाह से आठवें वर्ष तक स्त्री को गर्भ न रहे, वन्ध्या हो तो आठवें, सन्तान होकर मर जायें तो दशवें, जब-जब हो तब-तब कन्या हो और पुत्र न होवे तो
ग्यारहवें, और जो स्त्री अप्रिय बोलने वाली होवे, तो तुरन्त उसको छोड़के दूसरी स्त्री से नियोग करके, सन्तानोत्पत्ति कर लेवे। वैसे ही जो पुरुष अत्यन्त दुःखदायक हो तो स्त्री को उचित है कि तुरन्त उसको छोड़के दूसरे पुरुष से नियोग कर सन्तानोत्पत्ति करके, उसी विवाहित पति के दायभागी सन्तान कर लेवे ॥२॥
इत्यादि प्रमाण और युक्तियों से स्वयंवर विवाह और नियोग से अपने-अपने कुल की उन्नति करें। जैसे ‘औरस’ अर्थात् विवाहित पति से उत्पन्न हुआ पुत्र, पिता के पदार्थों का स्वामी होता है, वैसे
ही ‘क्षेत्रज’ अर्थात् नियोग से उत्पन्न हुए पुत्र भी मृतपिता के दायभागी होते हैं।
अब इस पर स्त्री और पुरुष को ध्यान रखना चाहिये कि वीर्य और रज को अमूल्य समझें। जो कोई इस अमूल्य पदार्थ को परस्त्री, वेश्या वा दुष्ट पुरुषों के संग में खोते हैं, वे महामूर्ख कहाते हैं; क्योंकि किसान वा माली मूर्ख होकर भी, अपने खेत वा वाटिका के विना, अन्यत्र बीज नहीं बोते। जो कि साधारण बीज का और मूर्ख का यह वर्तमान है, तो जो [शिक्षित होकर भी] सर्वोत्तम मनुष्यशरीररूप वृक्ष के बीज को कुक्षेत्र वा वेश्या में बोता है, वह महामूर्ख कहाता है, क्योंकि उसका फल उसको नहीं मिलता। और ‘आत्मा वै जायते पुत्रः’ यह ब्राह्मणग्रन्थ का वचन है।
[तुलना-शत० ब्रा०, कां० १४। प्रपा० ७। ब्रा० ५। कं० २६]
अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादधि जायसे।
आत्मासि पुत्र मा मृथाः स जीव शरदः शतम्॥१॥
यह सामवेद [के ब्राह्मण] का मन्त्र है॥६
[सामब्रा०, मन्त्रपर्व, प्रपा० १ । खं० ५। कं० १७ का पूर्वार्द्ध और १८ का उत्तरार्द्ध]
हे पुत्र! तू अङ्ग-अङ्ग से उत्पन्न हुए वीर्य से और हृदय से उत्पन्न होता है, इसलिये तू मेरा आत्मा है, मुझसे पूर्व न मरना, किन्तु सौ वर्ष तक जी। जिससे ऐसे-ऐसे महात्मा महाशयों का शरीर उत्पन्न
होता है, उसको वेश्यादि दुष्टक्षेत्र में बोना, वा दुष्टबीज अच्छे क्षेत्र में बुवाना, महापाप का काम है।

प्रश्न-विवाह क्यों करना [चाहिये] ? क्योंकि इससे स्त्री और पुरुष को बन्धन में पड़के बहुत संकोच करना और दुःख भोगना पड़ता है। इसलिये जिसके साथ [जब तक] जिसकी प्रीति हो तब
तक वे मिले रहैं, जब प्रीति छूट जाय तो छोड़ देवें।
उत्तर— यह पशु-पक्षियों का व्यवहार है, मनुष्यों का नहीं। जो मनुष्यों में विवाह का नियम न रहै, तो गृहाश्रम के अच्छे व्यवहार सब नष्ट-भ्रष्ट हो जायें। कोई किसी से भय वा लज्जा न करे। वृद्धावस्था में कोई किसी की सेवा भी नहीं करे और महाव्यभिचार बढ़कर सब रोगी, निर्बल और अल्पायु होकर शीघ्र-शीघ्र मर जायें। कोई किसी के पदार्थ का स्वामी वा दायभागी न हो सके और न किसी का किसी पदार्थ पर दीर्घकाल-पर्यन्त स्वत्व रहै, इत्यादि दोषों के निवारणार्थ विवाह अवश्य होना चाहिये।

प्रश्न-जब एक विवाह होगा, एक पुरुष की एक स्त्री और एक स्त्री का एक पुरुष रहेगा, तब स्त्री गर्भवती वा स्थिररोगिणी, अथवा पुरुष दीर्घरोगी हो और दोनों की युवावस्था हो; उनसे न रहा जाय, तो फिर क्या करें?
उत्तर- इसका प्रत्युत्तर वहां ‘नियोग-विषय’ में दे चुके हैं। और जब गर्भवती स्त्री से एक वर्ष पर्यन्त समागम न करने के समय में पुरुष से न रहा जाय, तो किसी विधवा से नियोग कर, उसके लिये पुत्रोत्पत्ति कर दे, परन्तु वेश्यागमन वा व्यभिचार कभी न करे। जहाँ तक हो सके वहाँ तक, अप्राप्त वस्तु की इच्छा, प्राप्त का रक्षण और रक्षित की वृद्धि और बढ़े हुए धन का व्यय देशोपकार में किया करें। सब प्रकार के अर्थात् पूर्वोक्त रीति से अपने-अपने वर्णाश्रम के व्यवहारों को अत्युत्साह, प्रयत्न, तन-मन-धन से किया करें। अपने माता, पिता, सास, श्वशुर की अत्यन्त शुश्रूषा किया करें। मित्र, पड़ोसी, राजा, विद्वान्, वैद्य और सत्पुरुषों से प्रीति रखे और दुष्टों से उपेक्षा रखके अर्थात् घृणा छोड़कर उनको सुधारने का प्रयत्न किया करें। जहां तक बने वहां तक, प्रेम से अपने सन्तानों को विद्वान् और सुशिक्षित करने-कराने में धनादि को लगावें। धर्म से सब व्यवहार करके मोक्ष का साधन भी किया करें कि जिसकी प्राप्ति से परमानन्द होवे।

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