वेद भारतीय चेतना के मूल स्रोत

वेद, सृष्टि का पहला ग्रंथ है । इसे आदि संविधान के नाम से भी जाना जा सकता है । वास्तव में संसार चक्र को चलाना और इसकी अनजानी अनेकों उलझनों को या गुत्थियों को सुलझाने के सारे उपाय सृष्टि प्रारंभ में ईश्वर ने वेद के माध्यम से मनुष्य को प्रदान किये । भारतीय संस्कृति में वेद सनातन सनातन मूल्यों के ध्वजवाहक हैं । यही वेद ग्रंथ हैं जिनके माध्यम से भारतीय संस्कृति का निर्माण हुआ है । भारतीय चेतना को हर क्षेत्र में जागृत रखने और उसके माध्यम से विश्व के लोगों का मार्गदर्शन करने का सफलतम कार्य वेदों ने ही किया है ।

‘वेद’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के विद् ज्ञाने धातु से हुई है। इस प्रकार वेद का शाब्दिक अर्थ ‘ज्ञान’ है। इसी धातु से ‘विदित’ (जाना हुआ), ‘विद्या’ (ज्ञान), ‘विद्वान’ (ज्ञानी) जैसे शब्द आए हैं।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय चेतना मूल रूप में ज्ञान से जुड़ी है । चेतना का ज्ञान से जुड़ जाना व्यक्ति के सार्वत्रिक कल्याण का सूचक होता है । इसका अभिप्राय होता है कि अब उसके पास एक ऐसा ज्ञान – विज्ञान है जो उसे प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ाने का कार्य करेगा । वेदों ने भारत का इसी प्रकार मार्गदर्शन किया । यहां पर हम जब वेद और भारत की बात कर रहे हैं तो समझना चाहिए कि संपूर्ण भूमंडल के निवासियों का मार्गदर्शन वेदों ने किया। संपूर्ण संसार के लोगों में आज तक भी जहां – जहां पर परिवार जैसी संस्था काम करती हुई दिखाई देती है या सामाजिक , आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्रों में एक सुव्यवस्था काम करती हुई दिखाई देती है , वह सारी की सारी वेदों की देन है । क्योंकि वेदों ने प्राचीन काल में संपूर्ण भूमंडल पर एक ऐसी सुव्यवस्थित सभ्यता का विकास करने में सहयोग किया था जिसने वैश्विक संस्कृति का निर्माण किया । इस प्रकार वेद न केवल भारत के अपितु संपूर्ण संसार के लोगों की चेतना के मूल स्रोत है। हरिऔध जी ने ठीक ही कहा है :–

सब विद्या के मूल, जनक हैं सकल कला के।

विविधा-ज्ञान आधार, रसायन हैं अचला के।

सुरुचि विचार विवेक विज्ञता के हैं आकर।

हैं अपार अज्ञान तिमिर के प्रखर प्रभाकर।

परम खिलाड़ी प्रभु करों के लोकोत्तार गेंद हैं।

भव-सागर के सेतु ए जगत उजागर वेद हैं।1।

जब सारा संसार अचेतन पड़ा हुआ था।

निज पाँवों पर जीव नहीं जब खड़ा हुआ था।

रहा जिन दिनों अंधकार भूतल पर छाया।

जब न ज्ञान रवि-बिम्ब निकलने भी था पाया।

तभी प्रगट हो जिन्होंने बतलाये सब भेद हैं।

वे ही सारे लोक के दिव्य विलोचन वेद हैं।2।

मूल रूप में तो वेद एक ही है , परंतु सुविधा की दृष्टि से इन्हें ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद के रूप में चार वेदों के रूप में जाना जाता है । ऋग्वेद चारों वेदों में सबसे प्राचीन वेद है , जिसके मंत्रों की संख्या लगभग साढ़े दस हजार है। इसका मूल विषय ज्ञान है । यजुर्वेद में कार्य (क्रिया) व यज्ञ (समर्पण) की प्रक्रिया के लिये 1975 गद्यात्मक मन्त्र हैं। जबकि सामवेद का प्रमुख विषय उपासना है । यह वेद संगीतमय है , जिसके कुल मंत्रों की संख्या 18 75 है। अथर्ववेद इसमें गुण, धर्म, आरोग्य, एवं यज्ञ के लिये 5977 पद्यात्मक मन्त्र हैं।

वेदों को अपौरुषेय माना जाता है , क्योंकि इन्हें सृष्टि के प्रारंभ में ईश्वर ने ही अग्नि , वायु , आदित्य और अंगिरा जैसे महान तपस्वी ऋषियों के अंतःकरण में प्रकट किया । ईश्वरप्रदत्त यह ज्ञान श्रुति परम्परा के माध्यम से हमारे ऋषियों के द्वारा आगे बढ़ना आरंभ हुआ । सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने वेद ज्ञान को अग्नि , वायु, आदित्य और अंगिरा से प्राप्त किया । श्रुति का अर्थ है ‘सुना हुआ ज्ञान’ ।

श्रुति के पश्चात हमारे ऋषियों ने वेद ज्ञान को अपनी स्मृति में सुरक्षित रखा । उसके आधार पर उन्होंने जिन ग्रंथों की रचना की , उन्हें हम स्मृति के रूप में ही जानते हैं । इस प्रकार वेद की भांति स्मृतियां भी आर्ष ग्रंथों की श्रेणी के ग्रंथ हैं । वेदों के छह अंग हैं जिन्हें हम शिक्षा , कल्प , निरुक्त, व्याकरण , छंद और ज्योतिष के नाम से जानते हैं । हमारे 6 दर्शन हैं । जिनमें पूर्व मीमांसा , वैशेषिक दर्शन , न्याय दर्शन, योग दर्शन , सांख्यदर्शन और वेदान्त के नाम उल्लेखनीय हैं । जबकि ईश , केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडुक्य, ऐतरेय, तैतिरीय, छान्दोग्य , बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर ये 11 उपनिषद हैं। इनको पढ़कर कोई भी विद्यार्थी जीवन और जगत की सारी गूढ़ समस्याओं का समाधान पा लेता था और उसे अपने जीवन को बहुत सहज व सरलता के साथ जीने का हुनर आ जाता था।

हमारे यहां पर ऐसे अनेकों ऋषि महर्षि हुए , जिन्होंने जीवन के अंतिम लक्ष्य अर्थात मोक्ष को प्राप्त किया । उनके तप ,त्याग ,तेज और प्रताप के कारण आर्य संस्कृति विश्व की महानतम संस्कृति के रूप में स्थापित हुई । अनेकों पीढ़ियों तक ऋषि महर्षियों के त्याग , तप व साधना के कारण भारत आगे बढ़ता रहा । इनके जाने के उपरांत भी इनके तेज व तप ने भारत का हजारों लाखों वर्ष तक मार्गदर्शन किया । जिस कारण वेद , वैदिक ज्ञान और वैदिक संस्कृति भारतीय चेतना के मूल स्त्रोत बने।

वशिष्ठ, शक्ति, पराशर, वेदव्यास, जैमिनी, याज्ञवल्क्य, कात्यायन इत्यादि ऋषियों को वेदों के ऐसे ही ऋषि थे जिन्होंने अपने तेज और त्याग से भारतीय संस्कृति के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। यूरोप के विद्वानों ने वेदों में आए कुछ शब्दों को पकड़कर भारतीय इतिहास को वेदों में ढूंढने का वैज्ञानिक और तार्किक प्रयास किया है । उन्होंने ऐसा इसलिए किया है कि वे अपने यहां का इतिहास अपने पौरुषेय ग्रंथों में ढूंढ कर सफल हो जाते हैं । वे इस बात को समझ नहीं पाए कि भारत का वैदिक ज्ञान अपौरूषेय है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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