मनुष्य का आत्मा कर्म करने में स्वतन्त्र और फल भोगने में परतंत्र है

aatma-soul
  • मनमोहन कुमार आर्य

हमें ज्ञात है व सबको ज्ञात होना चाहिये कि संसार में तीन अनादि व नित्य पदार्थों का अस्तित्व है। यह तीन पदार्थ ईश्वर, जीव व प्रकृति हैं। ईश्वर व जीव सत्य एवं चेतन पदार्थ हैं। ईश्वर स्वभाव से आनन्द से युक्त होने से आनन्दस्वरूप है तथा जीव आनन्द व सुख से युक्त न होने के कारण आनन्द व सुख प्राप्ति की चेष्टा करता है। ईश्वर जीव को सुख व आनन्द देने में सहायक होता है। जीवों को सुख आदि देने के लिये ही ईश्वर ने इस सृष्टि को रचा है व वही इसका पालन करता है जिससे सभी जीवों को उनके जन्म-जन्मान्तरों के सभी शुभ व अशुभ कर्मों का युक्तियुक्त अर्थात् पूरा-पूरा, न कम व न अधिक, सुख व दुःखरूपी फल प्राप्त हो सके। परमात्मा ने इस सृष्टि वा ब्रह्माण्ड को प्रकृति नामी अनादि पदार्थ से बनाया है। यदि यह तीन अनादि व नित्य पदार्थ न होते तो हम भी न होते, न ही ईश्वर होता और न ही यह संसार व ब्रह्माण्ड होता। इस ब्रह्माण्ड में ईश्वर अपने समान एक मात्र सत्ता है। संसार में दूसरा व तीसरा कोई ईश्वर व उसके समान नहीं है। जीवात्माओं की संख्या अगण्य वा अनन्त है एवं यह सब एक समान हैं। जीवात्मा अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेकर अपने पूर्वकृत कर्मों का सुख व दुःख रूपी फलों का भोग कर रही हैं व परमात्मा इनको भोग प्रदान कर रहा है। संसार में जीव संख्या अगण्य वा अनन्त हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि उसको गणित की दृष्टि से नहीं जाना व बताया जा सकता परन्तु ईश्वर के ज्ञान में जीवों की यह अनन्त संख्या भी सीमित ही मानी जाती है। इस प्रकार ईश्वर से रचित यह संसार अस्तित्व में आकर जीवों के कर्म फल चक्र को क्रियान्वित करने वा उसे पूरा करने के लिए चलता जाता है। अनादि काल से यह चल रहा है और अनन्त काल तक इसी प्रकार से चलता रहेगा। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय परमात्मा के द्वारा होती रहती है। एक सृष्टि की आयु 4 अरब 32 करोड़ वर्ष होती है। इसे ईश्वर का एक दिन कहा जाता है। इतनी ही बड़ी रात्रि होती है। यह दोनों मिलकर 8 अरब 64 करोड़ वर्षों की अवधि होती है जो ईश्वर का एक दिन, जिसमें सृष्टि की स्थिति व प्रलय काल सम्मिलित है, कहलाता है। सृष्टि के इस कल्प के सृष्टि की उत्पत्ति होने के पश्चात 1 अरब 96 करोड़ वर्षों का भोग हो चुका है। शेष काल का भोग अभी होना है। इससे ज्ञात होता है कि अभी यह सृष्टि अपनी 4 अरब 32 करोड़ वर्ष की आयु को प्राप्त कर प्रलय को प्राप्त होगी।

ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानना प्रत्येक मनुष्य के लिये आवश्यक एवं अनिवार्य है अन्यथा मनुष्य का जीवन सार्थक नहीं होगा। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान के आधार पर बताया है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। हमारा यह ईश्वर सर्वज्ञ है, उसी ने जीवों के कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल का भोग कराने व मुक्ति प्रदान करने के लिये साधन रूप में इस सृष्टि को बनाया है। ईश्वर जीवों के कर्म फलों का विधाता व व्यवस्थापक है। वह वेदज्ञान का दाता भी है। जीव सत्य व चेतन स्वरूपवाली अल्पज्ञ, अनादि, अमर, अविनाशी, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा, वेदाचरण से जन्म मरण से मुक्त होने वाली तथा मोक्षानन्द को प्राप्त होने वाली सत्ता है। ईश्वर ने सृष्टि जीवात्माओं के द्वारा कर्मों के फलों के भोग के लिये बनाई है। वेदों में ईश्वर की आज्ञा है कि जीव इस सृष्टि का भोग त्यागपूर्वक करे। वेद में यह भी बताया गया है कि मनुष्य को लोभ व लालच नहीं करनी चाहिये। मृत्यु होने पर यह सब धन व पदार्थ यहीं रह जाते हैं, यह जीवात्मा के साथ परलोक जहां जीवात्म का पुनर्जन्म होता है वहां नहीं जाते। जीवात्मा के साथ उसके ज्ञान आदि कर्म व संस्कार ही रहते हैं व परजन्म में भी साथ जाते हैं। इसलिये विवेकशील मनुष्यों को भौतिक पदार्थों व सम्पत्ति का अधिक मात्रा में संचय न कर दैवीय गुणों का धारण व परोपकार के कार्यों को करके सद्कर्म-सम्पत्ति का संचय करना चाहिये। इसी से जीव का कल्याण होता है। ऐसा करके ही संसार के सभी जीव अपने लिये आवश्यकता की सुख की सामग्री को प्राप्त कर सकते हैं। अधिक संचय से दूसरे प्राणियों के भोग में बाधा पहुंचती हैं, इसलिये आवश्यकता से अधिक संचय का विचार व मान्यता अनुचित होने से जीवों के हित में नहीं होती। ऐसा ही वेद से भी अनुमोदित होता है।

परमात्मा की व्यवस्था में सभी जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं। कर्मों का फल भोगने के लिये ही जीवों के जन्म व जन्म के बाद पुनर्जन्मों का क्रम चलता जाता है। कोई भी कर्म उस कर्म का फल भोगे बिना छूटता व निष्फल नहीं होता है। कर्म के फलों की प्राप्ति में सभी जीव ईश्वर के अधीन होते हैं। कोई आचार्य व धर्माचार्य भी कर्म फल भोग से अपने आप को बचा नहीं सकता। ईश्वर का कर्म फल सिद्धान्त अटल है। वह ईश्वर पक्षपात रहित होकर सभी जीवों, विद्वानों, आचार्यों व मत-पन्थ सम्प्रदायों के प्रवर्तकों को उनके कर्मों के अनुसार न्याय करते हुए कर्मों का फल प्रदान करते हैं। संसार में कुछ मतों ने यह मिथ्या सिद्धान्त प्रवृत्त है कि किसी मत विशेष को मानने से मनुष्य के पाप रूपी फल क्षमा कर दिये जाते हैं। यह सिद्धान्त मिथ्या है। इस सिद्धान्त को तर्क की कसौटी पर सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। यदि इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया जाये तो इसका अर्थ है कि सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक तथा सर्वज्ञ परमेश्वर की न्यायव्यवस्था का भंग होना। यदि ईश्वर किसी व्यक्ति या मत विशेष के अनुयायी या अनुयायियों के पापों को क्षमा करेगा तो निश्चय ही वह निष्पक्ष न होकर पक्षपाता कहलायेगा। ईश्वर ऐसा ऐसा नहीं करता अर्थात् वह पक्षपात कभी नहीं करता क्योंकि वह न्यायकारी एवं निष्पक्ष है। पाप क्षमा करने की मान्यता मत-मतान्तरों की मिथ्या कल्पना है। जो लोग ऐसा मानते हैं वह ईश्वर के वेदज्ञान वा विधान से अनभिज्ञ होने के कारण ऐसा मानते व कहते हैं। इसका एक कारण स्वमत के अनुयायियों की संख्या में वृद्धि करना भी होता है। सभी जीवों वा मनुष्यों को अपने-अपने कर्मों के परिमाण के अनुरूप फल अवश्य ही भोगने ही पड़ते हैं।

सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी ईश्वर की दृष्टि से किसी जीव का कोई कर्म छुपता नही है। कोई भी जीव रात्रि के गहन अन्धकार में भी जो शुभ व अशुभ विचार करते हैं वह सर्वान्तर्यामी ईश्वर को विदित होता है। अतः ईश्वर को जीवों को उनके सभी कर्मों का फल देने में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होती। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में तर्क व युक्तियों से कर्म फल भोग करने व ईश्वर द्वारा पाप क्षमा न करने के सिद्धान्त को पुष्ट किया है। सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर कर्म फल भोग के इस सिद्धान्त को समझा जा सकता है कि सभी जीव अपने अपने कर्मों का फल भोगने में ईश्वर की व्यवस्था में परतन्त्र हैं। उन्हंे कोई भी सत्ता व साधन कर्मों का फल भोगने से बचा नहीं सकते। शुभ व पुण्य कर्मों का फल सुख तथा अशुभ व पाप कर्मों का फल दुःख सभी जीवों को भोगना ही पड़ता है। अतः सभी मनुष्यों को वेद व सत्यार्थप्रकाश आदि वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिये और भविष्य तथा जन्म-जन्मान्तर में उन्हें किसी प्रकार के दुःख न हों, इसके लिये वेदविहित शुभ कर्मों का आश्रय लेने के साथ वेद निषिद्ध अशुभ कर्मों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिये। ऐसा करके ही जीव की उन्नति होकर उसे सुख व आनन्द की प्राप्ति होती है व हो सकती है। संसार में हम मनुष्य व इतर योनियों में जीवों को जो दुःख भोगते हुए देखते हैं उनमें से उनके अनेक दुःखों का कारण पूर्वजन्म के कर्म हुआ करते हैं। पूर्वजन्म के कर्मों के कारण ही मनुष्य को नाना प्राणी योनियों में से एक योनि जिसे जाति कहा जाता है, परमात्मा से प्राप्त होती है। आयु, मनुष्य व पशु आदि योनि सहित सुख व दुःख भी पूर्वजन्मों के अभुक्त कर्मों के आधार पर ही परमात्मा द्वारा प्रदान किये जाते हैं। मनुष्य स्वयं विचार कर अथवा शास्त्रों का अध्ययन कर स्वयं इन सिद्धान्तों को समझ सकते हैं और इस विषय में निभ्र्रान्त हो सकते हैं।

हमारे इस संसार का अस्तित्व परमात्मा के कारण है। परमात्मा ने ही इस जगत को बनाया है। यह संसार ईश्वर की कृति है और उसके अस्तित्व के होने का साक्षात प्रमाण है। संसार में यह सिद्धान्त भी प्रवृत्त है कि रचना को देखकर रचयिता का ज्ञान होता है। हम मनुष्य निर्मित कोई भी रचना देखते हैं तो हमें विदित होता है कि यह किसी मनुष्य ने बनाई अथवा मनुष्यों द्वारा किसी उद्योग में बनाई गई है। यदि मनुष्य न होते तो मनुष्यकृत रचनायें भी न होती। इसी प्रकार से इस सृष्टि व इसके भिन्न-भिन्न सूर्य, चन्द्र, गृह, उपग्रह, पृथिवी, अग्नि, जल, वायु, आकाश, अन्न, ओषधि, प्राणी आदि सभी अपौरुषेय पदार्थों को एकमात्र ईश्वर ने अपनी व्यवस्था से ही बनाया है। ईश्वर है इसीलिये यह बनें हैं। यदि वह न होता तो न बनते। यह सृष्टि व पदार्थ किसी अन्य सत्ता द्वारा बनायें नहीं जा सकते थे। इसलिये ईश्वर का अस्तित्व यथार्थ एवं सिद्ध है। मनुष्य योनि हो व अन्य प्राणी योनियां, सर्वत्र हम सब प्राणियों को सुख व दुःख से युक्त देखते हैं। इससे भी ईश्वर व उसकी व्यवस्था का ज्ञान होता है। यजुर्वेद में कहा गया है कि मनुष्य को वेदविहित शुभ कर्मों को करते हुए ही एक सौ व कुछ अधिक वर्ष जीनें की इच्छा करनी चाहिये। कर्मफल सिद्धान्त पर एक संस्कृत श्लोक से अच्छा प्रकाश पड़ता है। इस श्लोक के कुछ शब्द हैं ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।’ अर्थात् मनुष्य को अपने किये हुए शुभ व अशुभ कर्मों के फल अवश्य ही भोगने होते हैं। यह सिद्धान्त विचार व चिन्तन करने पर सत्य सिद्ध होता है। सत्यार्थप्रकाश में ऋषि दयानन्द ने इस विषय संबंधी जो चिन्तन प्रस्तुत किया है उससे भी इस सिद्धान्त की पुष्टि होती है।

हम जीव हैं, अनादि व नित्य सत्ता हैं, हम जन्म व मरण धर्मा हैं। हमारा अर्थात् हमारी आत्मा का जन्म व मरण होता है। मरण के बाद पुनर्जन्म होता है तथा जन्म से पूर्व मरण हुआ होता है। इन सब व्यवस्थाओं को ईश्वर भली प्रकार से क्रियान्वित करते हैं। जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं। ईश्वर किसी जीव को किसी कर्म को करने से रोकते नहीं हैं। हां, वह आत्मा में अशुभ कर्मों को न करने तथा शुभ कर्मों की प्रेरणा अवश्य करते हैं। हम जो कर्म करते हैं उसका फल हमें अवश्य ही भोगना पड़ता है। इससे हम व कोई अन्य जीव बच नहीं सकता। हम इस सिद्धान्त को समझेंगे तो हमें इससे इस जन्म व परजन्मों में भी लाभ होगा। इसी लिये हमने इस सिद्धान्त को इस लेख में प्रस्तुत किया है। सब मनुष्यों की अपनी आत्मा व जीवन की उन्नति के लिये वैदिक धर्म की शरण में आना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश सहित वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिये। इससे सर्वतोमहान् वैदिक धर्म के पालन का मार्ग भी प्रशस्त होगा। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
jojobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
onwin giriş
Kolaybet Giriş
casinolevant
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
grandpashabet giriş
jojobet giriş
bettilt giriş
sahabet
sahabet
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
bettilt giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti giriş