ऋषि दयानंद ना आए होते तो आर्य हिंदू जाति अत्यंत दुर्दशा को प्राप्त होती

ओ३म्

==========
मनुष्य की पहचान व उसका महत्व उसके ज्ञान, गुणों, आचरण एवं व्यवहार आदि से होता है। संसार में 7 अरब से अधिक लोग रहते हैं। सब एक समान नहीं है। सबकी आकृतियां व प्रकृतियां अलग हैं तथा सबके स्वभाव व ज्ञान का स्तर भी अलग है। बहुत से लोग अपने ज्ञान के अनुरूप सत्य का आचरण भी नहीं करते। स्वार्थ वा लोभ तथा अनेक कारणों से वह प्रभावित होते हैं और यदि वह उचित व अनुचित का ध्यान रखें भी तथापि वह दूसरों की प्रेरणा से सत्य व असत्य सभी प्रकार के आचरण करते हैं। हमारे देश में सृष्टि की आदि से ही ईश्वर प्रेरित वेदों के आधार पर वैदिक धर्म प्रचलित था। हमारी इस सृष्टि को बने हुए 1.96 अरब वर्ष से अधिक समय हो चुका है। इसमें यदि लगभग 5000 वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध की अवधि को निकाल दें तो शेष 1.96 से अधिक अवधि तक आर्यावर्त वा भारत सहित पूरे विश्व में वेदों पर आधारित वैदिक धर्म ही प्रवर्तित रहा है। सभी लोग इसी विचारधारा, मत व सिद्धान्तों का पालन व आचरण करते थे। इसका कारण यह था कि वेद की सभी मान्यतायें सत्य पर आधारित थी और इनके पालन से ही मनुष्य व उसकी आत्मा का कल्याण होता है।

सृष्टि के आरम्भ से ही हमारे देश में ऋषि परम्परा थी। ऋषि सद्ज्ञान से युक्त तथा ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए योगी आत्मायें हुआ करती थी। वह निभ्र्रान्त ज्ञान से युक्त होते थे। वह किसी भी व्यक्ति के प्रश्नों व आशंकाओं का समाधान अपने तर्क व युक्तियों से करने में समर्थ होते थे। उनके समय में धर्म में अकल का दखल जैसा विचार व सिद्धान्त काम नहीं करता था जैसा कि आजकल के कुछ व अनेक मतों में होता है। इसी कारण से वेद सर्वकालिक एवं सर्वमान्य धर्म ग्रन्थ रहे हैं, आज भी हैं तथा प्रलयावस्था तक रहेंगे। जिस प्रकार से आलस्य प्रमाद से हम लोग ज्ञान को विस्मृत कर अज्ञानी हो सकते हैं उसी प्रकार से महाभारत काल के बाद वेद ज्ञान से युक्त आर्यजाति अपने आलस्य प्रमाद से वेद ज्ञान से च्युत व विमुख हो गई। वेदों का स्थान देश देशान्तर में विषसम्पृक्त अन्न के समान मत-मतान्तरों के ग्रन्थों व उनकी अविद्यायुक्त शिक्षाओं ने ले लिया जिसके निराकरण के लिये ही ऋषि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) ने वेद-मत वा वैदिक धर्म की पुनस्र्थापना की थी। आज वेद ज्ञान प्रायः पूर्ण रूप में उपलब्ध है। हम ईश्वर को न केवल जान सकते हैं अपितु उसका साक्षात्कार भी कर सकते हैं। वेद के बाद प्रमुख स्थान पर आर्ष व्याकरण तथा उपनिषद व दर्शन ग्रन्थों का स्थान है। इसका अध्ययन कुछ ही समय में किया जा सकता है। हिन्दी व अंग्रेजी आदि भाषाओं में भी उपनिषद व दर्शनों सहित वेदों के भाष्य व टीकायें भी उपलब्ध हैं। वैदिक विद्वान मनुष्य की आत्मा व परमात्मा विषयक किसी भी शंका का समाधान करने के लिये तत्पर हैं। ऐसी स्थिति में संसार में मनुष्यों द्वारा वेदज्ञान की उपेक्षा करना उचित नहीं है। हम अनुमान करते हैं कि विज्ञान की वृद्धि के साथ ही लोग अविद्या, अज्ञान व मिथ्या परम्पराओं से युक्त मान्यताओं व मतों की उपेक्षा कर वेदों की ओर आकर्षित होंगे और अपने जीवन को वैदिक संस्कारों वा ज्ञान से सजाने व संवारने के तत्पर होंगे। हमें लगता है कि ऋषि दयानन्द इस प्रक्रिया को आरम्भ कर गये थे। इस प्रक्रिया की गति वर्तमान में कुछ कम है परन्तु ज्ञान व विज्ञान की वृद्धि के साथ इसमें भी वृद्धि होगी और यूरोप के पक्षपात रहित लोग वेदों का अध्ययन कर ईश्वर व आत्मा के ज्ञान व इनकी प्राप्ति के लिये वेदों को अपनायेंगे व उनकी शिक्षाओं के अनुसार आचरण करेंगे।

ऋषि दयानन्द के सामाजिक जीवन में प्रवेश से पूर्व देश नाना मत-मतान्तरों से ढका व पटा हुआ था। सभी मत अविद्या से युक्त विष सम्पृक्त अन्न के समान थे। ईश्वर तथा आत्मा का यथार्थ व पूर्ण सत्यस्वरूप किसी धर्माचार्य व मत-धर्मानुयायी को विदित नहीं था। सभी मध्यकाल के अज्ञानता के समय में स्थापित अपने-अपने मतों के अनुसार अपनी पुस्तकों का अध्ययन करते तथा उनके अनुसार क्रियायें व पूजा अर्चना आदि करते थे। सत्य के अनुसंधान का कहीं कोई प्रयास होता हुआ नहीं दीखता था। देश व विदेश में सर्वत्र अज्ञान व पाखण्ड विद्यमान थे। भारत में मूर्तिपूजा एवं फलित ज्योतिष ने अधिकांश देशवासियों को ईश्वर के सत्यस्वरूप के ज्ञान व सच्ची उपासना सहित पुरुषार्थ से विमुख किया हुआ था। जन्मना-जाति ने समाज को कमजोर व क्षय रोग के समान ग्रसित किया हुआ था और आज भी स्थिति चिन्ताजनक है। छुआछूत का व्यवहार भी हिन्दू समाज में होता था। बाल विवाह प्रचलित थे जिसमें बच्चों को, जिनका विवाह किया जाता था, विवाह का अर्थ भी पता नहीं होता था। विवाहित बाल कन्यायें विधवा हो जाने पर नरक से भी अधिक दुःखी जीवन व्यतीत करती थी। यत्र तत्र सती प्रथा भी विद्यमान थी। विधवा विवाह को पाप माना जाता था तथा कोई इसे करने की सोच भी नहीं सकता था।

स्त्रियों व शूद्रों की शिक्षा का प्रबन्ध नहीं था। वेदों का अध्ययन व श्रवण इन दोनों के लिये वर्जित थे। अंग्रेज देश को ईसाई बनाना चाहते थे। संस्कृत भाषा, जो ईश्वरीय भाषा व देव-विद्वानों की भाषा है, उसे नष्ट करने के षडयन्त्र जारी थे। ईसाई एवं मुसलमान लोभ, भय तथा छल से हिन्दुओं का मतान्तरण वा धर्मान्तरण करते थे। देश में जो ईसाई व मुस्लिम हैं वह सब विगत 1200 वर्षों में धर्मान्तरण की प्रक्रिया से ही बनाये गये हैं। सर्वश्रेष्ठ वेद की शिक्षाओं की ओर न हिन्दू और न किसी अन्य समुदाय का ध्यान जाता था। सामाजिक प्रथाओं, पर्वों, व्रत, उपवास, गंगा स्नान, भागवत-कथा व रामचरित मानस के पाठ आदि को मनुष्य जीवन का प्रमुख धर्म व कर्तव्य जाना व माना जाता था। कुछ वर्गों के प्रति पक्षपात व उनका शोषण भी किया जाता था। ऐसी विषम परिस्थितियों में अधिकांश जनता अभाव, रोगों, भूख, आवास की समुचित व्यवस्था से दूर अपना जीवन व्यतीत करने के लिए विवश थी। अंग्रेज देश का शोषण करते थे तथा देशभक्तों पर अत्याचार करते थे। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में ऋषि दयानन्द का गुजरात के मोरवी नगर तथा इसके टंकारा नामक कस्बे में एक ब्राह्मण कुल में जन्म होता है।

ऋषि दयानन्द का बचपन का नाम मूलशंकर था। 14 वर्ष की आयु में शिवरात्रि के दिन उन्हें मूर्तिपूजा के प्रति अविश्वास व अनास्था हो गयी थी। बहिन व चाचा की मृत्यु ने इनकी आत्मा में वैराग्य के भावों का उदय किया। माता-पिता ने इनकी इच्छानुसार काशी आदि जाकर अध्ययन करने की सुविधा प्रदान नहीं की। विवाह के बन्धन में बांधने की तैयारी की गई। इस बन्धन में न फंसने की इच्छा से मूलशंकर जो आगे चलकर ऋषि दयानन्द बने, अपनी आयु के 22वें वर्ष में ईश्वर की खोज में घर से निकल भागे और उन्होंने लगभग 17 वर्षों तक देश के अनेक भागों में धार्मिक विद्वानों तथा योगियों आदि की संगति की तथा लगभग 3 वर्ष मथुरा स्वामी विरजानन्द सरस्वती से अध्ययन कर वेदों की व्याकरण अष्टाध्यायी-महाभाष्य पद्धति तथा निरुक्त पद्धति के विद्वान बने। गुरु की प्रेरणा से आपने देश की सभी धार्मिक समस्याओं अर्थात् अविद्या, अन्धविश्वास, मिथ्या परम्पराओं तथा सामाजिक बुराईयों को दूर करने सहित समाज सुधार का कार्य किया। देश को स्वतन्त्र करने के लिये भी गुप्त रीति से काम किया। इसके अच्छे परिणाम देखने को मिले। कलकत्ता, मुम्बई, बिहार प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक भागों में वेद धर्म प्रचारक एवं अविद्या निवारक संस्था आर्यसमाज की स्थापना हुई और इनके माध्यम से वेद प्रचार, अज्ञान-अन्धविश्वास वा अविद्या निवारण का कार्य आरम्भ हो गया। शिक्षा जगत को भी ऋषि दयानन्द की महत्वपूर्व देन है। ऋषि दयानन्द वेदाध्ययन की गुरुकुल प्रणाली के प्रणेता थे। उन्हीं के अनुयायियों ने लाहौर में दयानन्द ऐंग्लो वैदिक स्कूल व कालेज स्थापित कर उसे देश भर में फैलाया और देश से अज्ञान को दूर किया। इसका सुपरिणाम हमारे सामने हैं। देश भर में शिक्षा व ज्ञान की उन्नति हुई, देश स्वतन्त्र हुआ तथा सामाजिक कुरीतियां दूर होने सहित अन्धविश्वासों में भी कमी आयी। सभी मतों की पुस्तकों व उनकी व्याख्याओं पर भी ऋषि दयानन्द के उपदेशों व तर्क एवं युक्तियों का प्रभाव पड़ा और उन्होंने अपनी अविद्यायुक्त बातों को भी तर्कसंगत सिद्ध करने का प्रयत्न किया।

ऋषि दयानन्द यदि न आते तो वेद, वैदिक धर्म तथा संस्कृति पूर्णतया लुप्त हो सकते थे। आर्यसमाज की अनुपस्थिति में विद्या का प्रचार व प्रसार नहीं होता जो ऋषि दयानन्द व उनके अनुयायी विद्वानों ने अपने मौखिक प्रचार, ग्रन्थों के लेखन व प्रकाशन सहित शास्त्रार्थ एवं शंका-समाधान आदि के द्वारा किया। वैदिक धर्म के विरोधी मत हिन्दुओं का धर्मान्तरण कर उन्हें अपने मत में बलात सम्मिलित करते रहते। अन्धविश्वासों व असंगठन सहित सामाजिक कुरीतियों के कारण ऐसा होना असम्भव नहीं था। यह निश्चय है कि आज देश जहां पर पहुंचा है और वैदिक तथा सनातनी पौराणिक लोगों की जो स्थिति व दशा है, वह वर्तमान जैसी न होकर अत्यन्त बुरी व बदतर होती। आज हिन्दुओं की जो जनसंख्या है इससे भी कहीं कम होती। देश आजाद होता या न होता, इस पर भी शंका उत्पन्न होती है। देश को आर्यसमाज द्वारा दिये गये नेता व आन्दोलनकारी न मिलते। इससे स्वतन्त्रता आन्दोलन में निश्चय ही शिथिलता होती और उसका प्रभाव देश की आजादी की प्राप्ति पर होता। एक साधारण परिवार में जन्म लेकर आज हम आर्यसमाज के कारण वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, रामायण, महाभारत आदि का ज्ञान रखते हैं। हमने ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, वेदभाष्य सहित उनके अनेक जीवन चरित्रों एवं आर्य विद्वानों की सैकड़ों पुस्तकों को पढ़ा है। ऋषि दयानन्द के न आने पर न वह पुस्तकें होती, न वेद और उपनिषद व दर्शन आदि ग्रन्थों पर भाष्य व टीकायें होती, तो उनका अध्ययन भी निश्चय ही असम्भव था। यह सब ऋषि दयानन्द की कृपा से सम्भव हुआ। हम आज जो भी हैं उसमें हम वेद व वैदिक साहित्य से भी परिचित हैं। इन्हीं से हमारा व्यक्तित्व बना है। हम व प्रायः सभी ऋषिभक्त ईश्वर व आत्मा के सत्यस्वरूप को जानते हैं। सन्ध्या, यज्ञ एवं उपासना आदि भी करते हैं। समाज हित व देश हित के कार्यों में भी भाग लेते व इन कार्यों को करने वालों का सहयोग व सपोर्ट करते हैं तथा देश विरोधी तत्वों के प्रति उपेक्षा एवं विरोधी भाव रखते हैं। हम ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज सहित आर्य विद्वानों के ग्रन्थों से विशेष अनुग्रहित एवं लाभान्वित हैं। उनका आभार मानते हैं। हम अपने जीवन की परिस्थितियों से सन्तुष्ट हैं। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betnano
betyap giriş
hititbet giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betnano
betnano
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
jojobet
jojobet
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet resmi giriş
betpark giriş
betkom giriş
betkom resmi giriş
jojobet
jojobet
betkom giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş