बनाए रखें देवालयों की पवित्रता सांसारिक कर्मों का डेरा न बनाएँ

-डॉ.दीपक आचार्य
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मन्दिरों में जाने पर मन को असीम शांति प्राप्त होती है, चित्त संसार से हटकर कुछ क्षणों के लिए परमात्मा का चिंतन करने लगता है, मस्तिष्क की उद्विग्नताएं विराम लेती हैं और सांसारिक वृत्तियों के प्रति आयी शून्यता का भाव तन-मन को ठीक उसी तरह प्रफुल्लित कर देता है जैसा कि कम्प्युटर की ताजगी के लिए रिफ्रेश बटन दबाने पर नित नूतनता का प्रभाव दिखने लगता है।
दिन-रात संसार ही संसार का चिंतन करने वाले मन को जब तक इस प्रकार दिन में एकाध बार शून्यावस्था प्रदान नहीं की जाए तो इसका सीधा असर हमारे जीवन पर पड़ता है। मन्दिरों का महत्त्व इसलिये भी है कि ये आत्मचिन्तन और ईश्वरीय चिंतन के लिए अवसर प्रदान करते हैं।
यों कोई भी व्यक्ति शून्यावस्था पाने के लिए घर का भी इस्तेमाल कर सकता है और करते भी हैं। लेकिन मन्दिरों में चूंकि सदियों से वैदिक ऋचाओं, मंत्रों का पाठ होता रहा है, सदियों से इन परिसरों, गर्भगृहों, सभामण्डपों आदि में शांति और शून्यता के भाव रहे हैं इसलिए मन्दिरों में पहुंचकर असीम मन:शांति का अनुभव होता रहा है।
मन्दिरों में शांति की बातें कुछ वर्ष पहले तक तो ठीक थी लेकिन अब मन्दिर अशांत होते जा रहे हैं। इनमें तमाम प्रकार की सांसारिक गतिविधियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। अब मन्दिरों की स्थिति कोठार गृहों की तरह होती जा रही है।
उस जमाने में सिर्फ भगवान की प्रतिमाएं थीं जो अपने आपमें अद्भुत एवं आकर्षक शिल्प से भरी-पूरी होने से सुन्दरतम थी जिनमें उनके अस्त्र-शस्त्र, आभूषण तथा परिधान भी स्पष्ट दिखते थे। अब भक्तों ने इन पर भी वस्त्र पहनाने शुरू कर दिए, ज्यादा पैसों की आवक वाले मन्दिरों में सोने या चांदी के परिधान बनवा कर पहना दिए।
तब मन्दिरों में कुछ ऐसा था ही नहीं कि चोरी हो सके। अब सोने-चांदी की मूर्त्तियां हैं। पुजारियों का काम अब ध्यान लगाकर मूर्त्तियों की सेवा-पूजा तक ही सीमित नहीं रहा, अब वे चौकीदार भी हो गए हैं। उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता है कि श्रृंगार का सामान कोई चुरा नहीं ले जाए। ऐसे में न पुजारी ढंग से पूजा कर सकता है, न कोई श्रद्घालु मन्दिर में जाकर पूरे मन से भगवान का सान्निध्य प्राप्त कर सकता है। पुजारी और भक्त दोनों के प्रति परंपरागत आत्मीयता खत्म होती जा रही है और प्रोफेशनलिज्म का दौर आ चुका है।
मन्दिरों में गर्भगृहों तथा सभा मण्डप भी पूरी तरह खाली हुआ करते थे जिससे कि मन्दिरों में ताले लगाने तक की जरूरत नहीं हुआ करती थी। आज मन्दिरों में माईक सैट हैं, अनाप-शनाप सामान भरा पड़ा है, दरियों और बरतनों की भरमार है, कहीं लोहे की तिजोरियां रखी हैं और ऐसे में सभामण्डपों या गर्भ गृहों का पूरा वास्तु गड़बड़ाया हुआ है।
आजकल अधिकांश मन्दिर दैवीय ऊर्जा का वो अनुनाद पैदा नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि लोहे और दूसरी प्रकार की भौतिक सामग्री का भण्डार मन्दिरों में इतना हो गया है कि ये मन्दिर न होकर स्टोर रू स ही हों। वास्तु की दृष्टि में लोहे को शल्य माना गया है और यह दोष है लेकिन मन्दिरों में अब ज्यादातर काम लोहे का ही होने लगा है। जबकि मन्दिरों में मूर्त्तियों के सिवा कुछ भी सामग्री नहीं होनी चाहिए।
आजकल तो मन्दिरों तक में नलों, किसम-किसम की लाइटों की घुसपैठ हो गई है। कई मन्दिरों में दिन-रात भजन, मंत्र, चौपाइयां आदि की कैसेट्स चलने लगी हैं। ऐसे में मन्दिरों की शुचिता समाप्त हो गई है और इनमें रहने वाला दैवत्व भी करीब-करीब पलायन कर चुका है।
मन्दिरों में बेकार की सामग्री का जमावड़ा होने की वजह से आजकल मन्दिरों का प्रभाव खत्म होता जा रहा है। कुछ लोगों और समाजों ने तो मन्दिरों को कमाई का साधन ही बना डाला है। मन्दिरों के आगे-पीछे, दांये-बांये जहां जगह मिली, वहां दुकानें बना रखी हैं। कई प्रकार के दूसरे व्यवसायिक और आवासीय निर्माण कर रखे हैं।
धर्म के नाम पर धंधों की बहार आयी हुई है। मन्दिर के गर्भगृह में देव प्रतिमा की प्रतिष्ठा के उपरान्त मौलिक परिसर में किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य धर्मस मत नहीं है। इन मूर्ख धर्मावल बियों को कौन समझाये कि वे जिस देवता की पूजा कर रहे हैं वह कभी अकेले नहीं रहते हैं। बल्कि हर देवता अपने पूरे परिवार और संबंधित उप देवताओं, गणों के साथ विराजमान होता है। मु य मन्दिर में प्रधान देवता प्रतिष्ठित होता है तब परिक्रमास्थल तथा आस-पास के स्थलों पर अन्य उप देवता, गणादि विराजमान रहते हैं।
इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए किसी भी देवता के यंत्र को देख लिया जाना चाहिए। लेकिन आजकल मन्दिरों में न परिक्रमा स्थल बचे हैं, न आस-पास खुली जगह। ऐसे में भौतिक संसाधनों और व्यावसयिक गतिविधियों वाले किसी भी मन्दिर में देवी या देवता होने या दैवत्व होने का भ्रम हमें छोड़ देना चाहिए। हमने अपने लाभ के लिए मन्दिरों में खाली जगह तक नहीं रहने दी है। हमारा मकसद अब भगवान की बजाय भगवान के नाम पर कमायी ही रह गया है। मन्दिरों को धंधे के रूप में चलाने में हम माहिर हो गए हैं।
चाहे कितने ही बड़े, भव्य और प्रतिष्ठित मन्दिर क्यों न हों, इनमें यदि मन्दिर से संबंधित धर्मशास्त्रीय बातों का पालन नहीं किया जा रहा है तो यह अच्छी तरह मान लेना चाहिए कि जो मूर्त्तियाँ गर्भगृह में हैं उनमें दैवत्व नहीं है बल्कि मात्र दर्शनीय ही हैं।
समाज के जानकार लोग, आचार्य, पंडित और बाबाओं को इस बारे में लोक जागरण करना चाहिए लेकिन इनके भी अपने स्वार्थ हैं। भगवान की मूर्त्तियों से ज्यादा इनकी अपेक्षाएं धर्म के धंधेबाज पूरी करते हैं, इसलिए इन लोगों में इतना नैतिक साहस रहा ही नहीं है कि सच कह सकें। इन्हें भी अपने धंधों की बरकत के बारे में सोचने से फुर्सत नहीं रही।
कई लोग मन्दिरों में भी चुप नहीं बैठते, और न ही भगवान का चिंतन या पूजा-पाठ करते हैं। ऐसे लोग मन्दिरों में अंट-शंट बकवास, फालतू की चर्चाएं तथा बहसबाजी करते रहते हैं, वे बातें करते हैं जिनका भगवान या धर्म अथवा आत्मचिंतन से कोई मतलब नहीं है।
इस मामले में पुजारी भी दोष से बच नहीं सकते जिनके लिए भगवान के मन्दिर सिर्फ धन कमाने और टाईमपास के डेरे हैं। सभी को सोचना होगा कि मन्दिरों की शुचिता किस तरह कायम रखी जा सके ताकि हमारे मन्दिर न धंधे के डेरे बने रहें, न अनर्गल चर्चाओं के केन्द्र और न ही अशांत।

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