प्रताप का स्मरण काफी नहीं
मातृभूमि के लिए प्रतापी बनें
डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

आज सभी स्थानों पर प्रातःस्मरणीय महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जा रही है। महाराणा प्रताप जैसा विराट व्यक्तित्व भारतीय इतिहास का वह सूरज है जो भले ही काल के बादलों की ओट में खो चला है मगर इसकी सुनहरी रश्मियाँ और तेज सूरज-चाँद और पृथ्वी के रहने तक कभी खत्म न होगा।एक व्यक्ति के रूप में व्यक्तित्व की समस्त ऊँचाइयों की उच्चतम सीमाओं को छू लेने वाले महाराणा प्रताप अपने आप में वह ओजस्वी शिखर पुरुष थे जिनका नाम ही हर किसी में ओज और तेज जगाने के लिए काफी है।महाराणा प्रताप का अनूठा कर्मयोग, अदम्य आत्मविश्वास, मातृभूमि के प्रति अगाध आस्था और समर्पण उनके शौर्य-पराक्रम को बहुगुणित करने में अहम थे ही, कुशल संगठक और जननायक के रूप में उन्होंने जिस विलक्षण बौद्धिक बल और हुनर से अपनी शक्ति बढ़ाई, संगठन बनाया और मुगलों के विरूद्ध रणनीति बनाई, उसी का परिणाम है कि आज हम महाराणा प्रताप को मातृभूमि की रक्षा का युगीन योद्धा और सच्चाप पुत्र मानकर उनका वंदन-अभिनंदन और पावन स्मरण कर रहे हैंaman aryaइतने वर्षों बाद भी महाराणा प्रताप के व्यक्तित्व और पराक्रमी कर्मयोग की गंध हर कहीं महसूस की जा सकती है। आज महाराणा प्रताप को सिर्फ याद करने तक ही हमें आपको सीमित नहीं रखना चाहिए बल्कि महाराणा प्रताप के व्यक्तित्व के सभी पक्षों पर गहरा चिंतन और मनन करते हुए अनुकरण की आवश्यकता है।महाराणा प्रताप ने जिन ऊँचाइयों को प्राप्त किया, मातृभूमि के लिए सर्वस्व बलिदान किया और आने वाली पीढ़ियों को वह दिशा दे गए जो हर सच्चे मातृभूमि रक्षक के लिए सर्वोच्च प्रेरणा जगाने वाली है।महाराणा प्रताप की जयंतियां हम बरसों से मना रहे हैं, गर्व से सर ऊँचा करते हुए जयघोष लगाते रहे हैं, भुजाएं फड़का रहे हैं और एक दो दिन खूब तामझाम और जयगान करते हुए अपने कामों को विराम दे देते हैं।साल भर में एक-दो बार महाराणा प्रताप को याद करना काफी नहीं है बल्कि पूरे वर्ष भर महाराणा प्रताप को याद रखते हुए अपने कर्मयोग की दशा और दिशा को उनके जज्बातों और लक्ष्यों की ओर मोड़ना जरूरी है।अपने कर्मयोग में स्वार्थों, मानवीय ऎषणाओं, पदों, कदों और मदों से दूर रह कर सिर्फ और सिर्फ मातृभूमि की रक्षा और सेवा के लक्ष्य को लेकर हम आगे बढ़ें, तभी हम गर्व के साथ यह कह सकते हैं कि हमने महाराणा प्रताप के जीवन से कुछ प्रेरणा ली है। ऎसा हम नहीं कर पाएं और सिर्फ नाम और तस्वीरों की भूख को सामने रखें, अपने स्वार्थों और प्रतिष्ठा की ही चिंता करें तो हमें महाराणा प्रताप का नाम लेने का कोई अधिकार नहीं है।महाराणा प्रताप को जाने-समझे बिना उनको याद कर लेने की औपचारिकताओं का निर्वाह नहीं होना चाहिए। जो लोग महाराणा प्रताप का स्मरण करते हैं, उनके नाम पर आयोजन करें, उन सभी का कत्र्तव्य है कि प्रताप को आत्मसात करें और ऎसा काम करें कि अगले आयोजन से पूर्व समाज और मातृभूमि को कुछ दे पाएं।हमें यहां यह भी ध्यान में रखना होगा कि महाराणा प्रताप किसी एक समाज या सम्प्रदाय के नहीं हैं बल्कि सर्व समाज और भारतमाता के सपूत हैं और इसलिए हम सभी का फर्ज है कि महाराणा प्रताप से संबंधित जो भी आयेाजन हों उनमें अपनी समर्पित और आत्मीय भागीदारी अदा करें। मातृभूमि की सेवा और रक्षा के अनुष्ठानों में हमारा यह योगदान भी अहम है।आज सबसे बड़ी जरूरत महाराणा प्रताप के व्यक्तित्व और जीवन के बारे में नई पीढ़ी को अवगत कराने की जरूरत है क्योंकि महापुरुषों और नई पीढ़ी में जो खाई बढ़ती जा रही है उसी का परिणाम है कि हम समस्याओं और विषमताओं के भंवर में फैसते जा रहे हैं। नई पीढ़ी को मार्गदर्शक और प्रेरक चाहिएं और यह प्रेरणा महाराणा प्रताप और उन जैसे महापुरुषों से ही प्राप्त हो सकती है।जयंतियां मनाने के साथ ही महाराणा प्रताप के जीवन, शौर्य पराक्रम और मातृभूमि की रक्षा एवं सेवा में उनके द्वारा की गई कठिनतम तपस्या, दृढ़ निश्चयों और त्याग के बारे में आज की पीढ़ी को अवगत कराने पर सर्वाधिक ध्यान दिए जाने की जरूरत है तभी हमारा जयंती मनाना सार्थक है। वरना हर साल हम यों ही औपचारिकताओं को पूरा करते रहेंगे और समाज को न दिशा मिल पाएगी, न दशा सुधर पाएगी।

इसके साथ ही महाराणा प्रताप से जुड़े संगठनों, जयंतियां मनाने वालों और महाराणा प्रताप के नाम पर आए दिन कुछ न कुछ आयोजन करने वालों को भी चाहिए कि वे अपने व्यक्तित्व में शुचिता और पारदर्शिता लाएं, सच्चे अर्थों में प्रताप की शिक्षाओं को जीवन में उतारें और ऎसे कर्म करें जिनसे भारतभूमि को गौरव प्राप्त हो सके।इसके लिए हमें अपने संगी-साथियों और मातृभूमि एवं संस्कारों की जड़े काटने वालों से भी सतर्क रहना होगा। महाराणा प्रताप जयन्ती से ही हम क्यों न करें अपने जीवन में शौर्य-पराक्रम लाने की शुरूआत?

लेकिन इसके पहले हमें अपने स्वार्थों और स्वार्थी लोगों की दासता के बंधन से मुक्त होना होगा, अपने छोटे-मोटे कामों के लिए किसी के भी अनुचर बन जाने और पीछे-पीछे चलने व जयगान करते रहने की आदतों को छोड़ना होगा,  तभी स्वतंत्र संप्रभुतायुक्त व्यक्तित्व के रूप में पहचान कायम कर पाएंगे।

प्रातःस्मरणीय महाराणा प्रताप जयंती की शुभकामनाएं ….

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