मानवीय क्रिया-कलाप और पर्यावरण प्रदूषण

26/11/2019

डॉ. राकेश राणा

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अब तक की सबसे तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार से कहा कि गैस चेम्बर बनी दिल्ली में लोग घुट-घुटकर क्यों जिएं, आप प्रदूषण नहीं रोक सकते तो विस्फोटक से उन्हें उड़ा क्यों नहीं देते? अदालत का गुस्सा वाजिब है। कोर्ट-कचहरी, बयानों-विज्ञापनों और दावे-प्रतिदावे में देश की सभी एजेंसियां प्रदूषण रोकने में खुद को सक्रिय बताती हैं। फिर भी प्रदूषण कम होने की बजाय न सिर्फ बढ़ता जाता है बल्कि दिन-ब-दिन जानलेवा होता जा रहा है। आइए, जानते हैं कि प्रदूषण क्यों बढ़ता है और इसके कारक कौन-कौन-से हैं।

मानवीय क्रिया-कलाप और पर्यावरण प्रदूषण दोनों के बीच सीधा संबंध है। यदि हमारी जीवन शैली स्वकेन्द्रित है तो हमारा हर क्रिया-कलाप प्रदूषण पैदा करेगा। हम प्राप्तकर्ता की भूमिका में सबसे लेते जाएंगे। धीरे-धीरे सबको खाली करते जाएंगे। पृथ्वी से, आकाश से, हवा-पानी से सबसे केवल लेते रहेंगे और किसी को कुछ भी वापस न लौटाएंगे तो यह प्रकृति का चक्र टूट जाएगा। जो आपसी विनिमय से संचालित होता है। यही मानव और प्रकृति का रिश्ता है। जो सह-अस्तित्व और सहकार से चलता है। एक हाथ लेना, तो दूसरे हाथ देना। इस वर्तुल को तोड़ना उस जीवन संधि का उल्लंघन है जो समाज के अस्तित्व में आने के समय हुई थी। फिर यह तो नैतिक दृष्टि से भी सही नहीं है कि सिर्फ लिये जा रहे हैं प्रत्युत्तर में कुछ भी देना नहीं है। इसीलिए प्रकृति के सारे स्रोत सूखते जा रहे हैं। धरती विषाक्त होती जा रही है। नदियां प्रदूषित हो गई हैं, तालाब सूख रहे हैं। हम पृथ्वी से अपना रिश्ता इस तरह से बिगाड़ रहे हैं कि भविष्य में जैसे हमें इससे कोई काम ही न पड़े।

हमने जंगल काट डाले, जमीन खोद डाली, मिटटी को मार डाला। उसमें जीवन छोड़ा ही नहीं। कीटनाशक इतने डाले कि वे अब खुद मनुष्य को मारने पर उतारु हैं। हम शायद भूल गए कि जंगल काटने से सिर्फ जंगल ही नहीं कटते, वर्षा भी आनी बंद हो जाती है। पेड़ बादलों को बुलाते हैं। पीढ़ियों के तजुर्बे को तहस-नहस कर विशेषज्ञों के अनुसंधान यह बताने आये कि जंगल कम होने से वर्षा कम हो रही है, इसलिए पौधारोपण करो। पहले विकास के नाम पर पेड़ कटवा दिए, अब कहते हैं पौधारोपण करो। इसी तरह पहले डीडीटी खूब छिड़का और मच्छर मारे। हमारे मच्छर मार समाज ने यह नहीं सोचा कि मच्छर मारने से सिर्फ मच्छर ही नहीं मरते, प्रकृति की पूरी क्रमबद्धता टूटती है। जीवन श्रृंखला बाधित होती है। मच्छर किसी संबंध-श्रृंखला का ही हिस्सा थे। वे अपना काम कर रहे थे। प्रकृति में एक पूरी खाद्य-श्रृंखला अपने ढंग से काम करती है जो स्व नियंत्रण बनाए रखती है। हमने उसे समझे बिना संरक्षण की बजाय सफाये पर ज्यादा ध्यान दिया। बचाव की बजाय उपचार पर उतर आए। परिणाम … हम जिस डाल पर बैठे थे, उसे ही काट डाला।

सतत विकास के लिए संसाधनों की दक्षता में वृद्धि करनी होती है। यथाः पानी और ऊर्जा तथा अन्य संसाधनों के उपयोग में लाने के बावजूद उनमें कमी न हो और न ही उत्पादन में कमी आए। इस दृष्टि से तो हम निरन्तर घाटे में ही जा रहे हैं। आज का मानव पूरी तरह विरोधाभासों से भरी जिंदगी जी रहा है। अलग-अलग चलने की चेष्टा ही उसके दुख की वजह है। जिसे वह प्रदूषण कहकर पल्ला झाड़ना चाहता है। आदमी कुछ अलग नहीं है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, चांद-तारे सब उस समग्रता का हिस्सा हैं जिससे एक-दूसरे का सह-अस्तित्व बचा है। व्यक्ति का अहंकार बुद्धि है। जिसके चलते आदमी स्वयं को इस व्यापकता का अंग नहीं मानता। इसी का परिणाम है वह धीरे-धीरे अपंग होता जा रहा है।

आधुनिक विज्ञान का रवैया जीतने वाला है। वह सोचता है कि धरती और आकाश सब पर बस फतह हासिल करनी है। विज्ञान के साथ दिक्कत यही है कि वह कुदरत का करिश्मा तोड़कर ही अपनी स्थापना के सामाजिक समर्थन का विस्तार करना चाहता है। इससे आगे बढ़कर प्रकृति से सहयोगी रवैया उसने रखा ही नहीं। विज्ञान की निगाह में विकास और प्रगति के प्रति ठीक वैसी ही उपेक्षा दिखती है जैसी हमारे समाज में बेटी के प्रति उपेक्षा और बेटे के प्रति मोह की अतिव्याग्रता। विकास और प्रगति समाज से उपजी अवधारणाएं हैं, विज्ञान से विकसित अवधारणाएं नहीं। जैसा समाज होगा वह वैसी ही संस्कृति विकसित करेगा और जैसी संस्कृति विकसित करेगा वैसा ही ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और सम्पूर्ण सभ्यता का दर्शन विकसित करेगा। अगर वह जंगल-प्रकृति के इतर समाज के बीच दुनिया के किसी भी हिस्से में उपजा है, तो वह पूरे उस सांस्कृतिक वातावरण के दर्शन का वरण कर ही अवतरित हुआ है। उसको मानवीय अनुभवों के बाद ही समझा जा सकता है। संस्कृति और कुछ नहीं है। दुनिया अपनी-अपनी सभ्यता के निर्माण में विकास और प्रगति के द्वंद्व के ऊहापोह में भौतिक-अभौतिक सभी सृजनाओं को प्रकृति पर विजय पाने के प्रयत्न में जो कुछ करती गई, मनुष्य अपने भय का दमन करने तथा सुविधाओं के मोह-दर्शन को बनाने की जुगत में जो भी गढ़ता-रचता-अपनाता गया, सब समाज के सांस्कृतिक खाते की जमा पूंजी का हिस्सा होता गया। इसलिए विकसित संस्कृतियों में विजेता-विज्ञान-मूल्य ही पनप पाएं। परिणाम प्रगति दिनों-दिन दुबली होती चली गई और विकास का मॉडल मजबूत होता गया। यह आधुनिक विश्व समाज से उपजी संस्कृति से सबको सरलता से समझ आ ही रहा होगा। विकास के जिस मॉडल में दुनिया जीने की अभ्यस्त हो चुकी है उसके केन्द्र में विज्ञान बैठा है। यह मॉडल पूरी परिधि का निर्माण भी उस विज्ञान समर्थित परिवेश को पोषित करने वाली प्रोद्योगिकीय संस्कृति से करने में फिलहाल तो जीत ही चुका है।

मनुष्य को जियो और जीने दो की प्रकृति प्रदत्त अवधारणा को अंगीकार करना ही होगा। जिसके दो मजबूत आधार स्तम्भ हैं सहकार और सह-अस्तित्व। इस जिद को जितना जल्दी हो छोड़ दो कि हम अलग-अलग हैं। हम सब प्रकृति ने जोड़कर बनाए हैं। सब कुछ जुड़ा है। यही भारतीय चिंतन पद्धति में योग कहलाता है। सबके साथ तादम्य स्थापित करना, एकमेव हो जाना ही योग है। इसी से आप प्रकृति के भी करीब आते हैं और अपनी संस्कृति के भी। सब कुछ सदैव सम्पृक्त है, संयुक्त है। इस संयुक्तता में लीन हो जाना ही योग है। इस समन्वय का टूट जाना ही विकृतियों का प्रकटीकरण है, प्रदूषण है। पर्यावरण का अर्थ संपूर्ण का विचार करना है। भारतीय मनीषा हमेशा ’पूर्ण’ में विचरण करती है। पूर्णता का अहसास ही पर्यावरण है। बस इतना समझ लीजिए यही समाधान भी है।

(लेखक समाजशास्त्री हैं।)

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
holiganbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
perabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet güncel giriş
onwin güncel giriş
betpark
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş
betpark
sahabet güncel giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
Katla Giriş
Katlabet Giriş
nitrobahis
katlabet
kolaybet giriş
kolaybet giriş
hellocasino giriş
hellocasino giriş
betgaranti
Kolaybet Giriş
kolaybet giriş
Candycasino Giriş
Candy Casino
Candycasino giriş