भारत में लोकतंत्र सर्वथा एक निरीह और असहाय प्राणी का नाम है

यूं कहने को तो भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है परंतु वास्तविकता यह है कि भारत में लोकतंत्र कहीं पर भी नहीं है । जी हां , जो राजनीतिक पार्टियां लोकतंत्र लोकतंत्र का शोर मचाती हैं यदि उनकी भी चीर फाड़ की जाए तो पता चलता है कि लोकतंत्र तो उनके यहां भी नहीं है । इस बात को प्रमाणित करने के लिए हमें एक ही उदाहरण देना पर्याप्त दिखाई देता है कि किसी भी राजनीतिक दल में जिला स्तर तक के अध्यक्ष का चुनाव ऊपर से थोपे हुए व्यक्ति के रूप में होता है । वहां पर जिला स्तर के कार्यकर्ताओं की सर्वानुमति से भारत की कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने जिलाध्यक्ष का चयन नहीं करती ।

इसी प्रकार प्रांतीय स्तर पर भाजपा , कांग्रेस , सपा , बसपा जैसी बड़ी राजनीतिक पार्टियां भी अपने प्रदेश अध्यक्षों को प्रदेश पर थोपती हैं और फिर सभी कार्यकर्ताओं को एक ” शाही आदेश ” के अंतर्गत अपने द्वारा थोपे गए अध्यक्ष के दिशा निर्देश में कार्य करने के लिए बाध्य करती हैं । इसी प्रकार राष्ट्रीय अध्यक्ष के पदों को भी अधिकांश पार्टी बिना किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के किसी भी व्यक्ति विशेष को देने में ही भलाई समझती हैं । वह व्यक्ति अपने ढंग से पार्टी को और देश को हांकते हुए प्रधानमंत्री बनने का सपना देखता है । मानो अलोकतांत्रिक ढंग से किसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को हथिया लेने के पश्चात देश के प्रधानमंत्री पद को हथिया लेना उसका मौलिक और विशेष अधिकार मान लिया जाता है।

जब पार्टियां किसी भी विषय को लेकर संसद में या प्रदेशों की विधानसभाओं में व्हिप जारी कर अपने सांसदों या विधायकों को उस मुद्दे के विरोध या पक्ष में जाने के लिए मजबूर करती हैं तो उसे भी लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता । लोकतंत्र खेमेबंदियों की ऊंची – ऊंची दीवारों के बीच कैद होकर नहीं चलता , बल्कि लोकतंत्र अंतरात्मा की आवाज पर राष्ट्रहित , समाज हित और मानवता से भी आगे बढ़कर प्राणी मात्र के हितचिंतन को लेकर चलता है । इन सब सकारात्मक ऊर्जाओं के समेकित स्वर को लोकतंत्र की आवाज कहा जाता है । जिसे दबाना अलोकतांत्रिक होता है ।पर भारत में ऐसा ही होता रहा है कि पार्टियां व्हिप जारी कर लोकतंत्र के समेकित स्वरों को बाधित , कुंठित और अवरुद्ध करने के लिए कार्य करती हैं।

अब जो राजनीतिक पार्टियां चौबीसों घंटे लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए काम कर रही हों उनसे देश में लोकतांत्रिक संस्थानों को लोकतांत्रिक ढंग से संचालित करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ? ये ही राजनीतिक पार्टियां हमें कभी राज भवनों में लोकतंत्र का गला घोटती दिखाई देती हैं तो कभी संसद या विधानसभाओं के पटल पर लोकतंत्र की हत्या करती हुई दिखाई देती हैं और कभी यह लोकतंत्र के राजपथ पर सार्वजनिक रूप से लोकतंत्र को फांसी चढ़ाती हुई दिखाई देती हैं । खून में सने इनके हाथ लोकतंत्र की गाड़ी को कैसे खींच रहे होंगे ? ऐसे में यह सहज ही कल्पना की जा सकती है।

अब महाराष्ट्र में ये ही राजनीतिक पार्टियां लोकतंत्र की कैसी कैसी परिभाषाएं गढ़ रही हैं और वहां पर अभी हाल ही में संपन्न हुए चुनावों के परिणामों का कैसा कैसा अर्थ निकाल रही हैं ? – यह सब देखकर भी स्पष्ट होता है कि इनके लिए सत्ता स्वार्थ ही लोकतंत्र का नाम है । जहां जैसे भी स्वार्थ पूरा होता हो , वही यह लोकतंत्र मान लेती हैं।

महाराष्ट्र में जनादेश मिला है कि भाजपा शिवसेना सरकार बनाएं । लेकिन शिवसेना ने देखा कि सीएम बना जा सकता है , बशर्ते कि थोड़ा खेल जमकर खेला जाए तो उसने रायता बिखेर दिया और इस खेल को ही उसने लोकतंत्र का नाम दे दिया । उधर कांग्रेस और एनसीपी दोनों मान चुकी थीं कि हमको विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला है लेकिन जब देखा कि मलाई मिल तो सकती है बशर्ते कि थोड़ा सिद्धांतों का गला घोटा जाए तो वह भी सिद्धांतों का गला घोंटने के लिए तैयार हो गई। इन दोनों ने अपने इसी खेल को लोकतंत्र का नाम दे दिया । भाजपा ने देखा कि रायता भी बिखर गया , सिद्धांतों का गला भी घोट दिया गया। इसके उपरांत भी सत्ता हाथ से जा रही है तो उसने भी अलोकतांत्रिक संवैधानिक खेल खेला और सरकार बनाने के लिए विधानसभा को निलंबित करवा दिया । उसने अपने इस खेल का नाम लोकतंत्र रख दिया । सचमुच भारत में लोकतंत्र एक निरीह प्राणी है , पूर्णतया असहाय , बेबस , लाचार ?

उधर हर पार्टी के भोम्पू ( राष्ट्रीय प्रवक्ता ) टेलीविजन चैनलों पर आ आकर अपने-अपने ‘ तानाशाह ‘ के अलोकतांत्रिक कार्यों की वकालत करते रहते हैं और उन्हें हर बार की भांति पूर्णतया लोकतांत्रिक सिद्ध करने का मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहे हैं । इन्हें सुन सुनकर लोगों के सिर में दर्द हो जाता है। राष्ट्रहित का चिंतन कोई भी नहीं देता । एक बंधुआ मजदूर की तरह एक पार्टी विशेष के लिए बोलते रहते हैं । समझदार लोग टीवी चैनल बंद कर देते हैं। जबकि लोकतंत्र कहता है कि किसी स्वस्थ चिंतन को लेकर बैठो और जो राष्ट्रहित व जनहित में उचित हो , उस निष्कर्ष पर पहुंच कर वार्ता का समापन करो।

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डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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