वैदिक संपत्ति – 268 चतुर्थ खण्ड वेदों की शिक्षा

ved-rishi

(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)

प्रस्तुति : देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन ‘उगता भारत’

काम की प्रधानता

गतांक से आगे..

आर्यसभ्यता के प्रधान चार स्तम्भों में काम का बहुत ही बड़ा महत्त्व है। जिस प्रकार मोक्ष का सहायक अर्थ है उसी तरह अर्थ का सहायक काम है। यदि काम अर्थ की सहायता न करे तो अभी हम जिस अर्थ की प्रधानता का वर्णन कर आये हैं और आर्य-भोजन, आर्य-वस्त्र- आर्य- गृह और आर्य-गृहस्थी का जो आदर्श दिखला आये हैं उसकी स्थिरता एक दिन भी नहीं रह सकती। अर्थात् यदि मनुष्य काम को मर्यादित न करे तो वह कभी अर्थ को मर्यादित कर ही नहीं सकता और न विना अर्थमर्यादा के कभी मोक्ष प्राप्त कर सकता है। इसीलिए आर्यों ने काम के विषय में बहुत ही गम्भीरता से विचार किया है। संसार में आज तक आर्यों के अतिरिक्त किसी भी सभ्यजाति ने इस अर्थ-शुद्धि के मूलाधार काम पर इतना विचार नहीं किया । सबने अर्थ और काम को एक में मिला दिया है। परन्तु आर्यों ने जिस प्रकार शरीर और मन की पृथक्ता को समझ लिया है, उसी तरह शरीर से सम्बन्ध रखनेवाले अर्थ को और मन से सम्बन्ध रखनेवाले काम को भी एक दूसरे से पृथक् कर दिया है और जिस प्रकार शरीर से सम्बन्ध रखनेवाले भोजन, वस्त्र, गृह और गृहस्थी को अर्थ के अन्तर्गत कर दिया है, उसी तरह मन से सम्बन्ध रखनेवाले ठाट बाट, शोभा शृङ्गार और स्त्री पुत्रादि को काम के अन्तर्गत कर दिया है। क्योंकि ये सभी पदार्थ केवल मनःस्तुष्टि के ही लिए हैं। यदि अपना मन काबू में हो तो इनमें से एक भी पदार्थ की आवश्यकता नहीं है। किन्तु इन सबसे मन का एकदम हटा लेना बहुत ही कठिन है। ठाट बाट और शोभा शृङ्गार से चाहे मनुष्य अपना मन हटा भी ले, पर स्त्री से पुरुष को और पुरुष से स्त्री को मन हटाना बड़ा ही दुस्तर है। सच पूछो तो स्त्री पुरुष के स्वाभाविक बन्धन को ही काम कहा गया है, बनाव चुनाव और शोभा शृङ्गार तो उनके बन्धन के साधन मात्र हैं। यही कारण है कि मानस शास्त्र का प्रसिद्ध ज्ञाता शाङ्गधर काम का लक्षण करता हुआ लिखता है कि-

स्त्रीषु जातो मनुष्याणां स्त्रीणां च पुरुषेषु वा ।
परस्परकृतः स्नेहः काम इत्यभिधीयते ।।
(शाङ्ग घर ११६)

अर्थात् स्त्रियों में पुरुषों का और पुरुषों में स्त्रियों का जो परस्पर स्वाभाविक स्नेह है उसी को काम कहते हैं। स्त्री और पुरुष के इस पारस्परिक स्नेह और स्वाभाविक आकर्षण के दो कारण हैं। पहिला कारण तो यह है कि मनुष्य अनन्त जन्म जन्मान्तरों से अनेक योनियों में स्त्री और पुरुष शक्ति के सम्मेलन के ही द्वारा पैदा होता हुआ और उसी सम्मेलन के द्वारा अन्य जीवों को पैदा करता हुआ चला आ रहा है; दूसरा कारण यह है कि वीर्य में पड़े हुए जीवों के भोग जीवों को बाहर निकलने और नवीन शरीर घारण करने की प्रेरणा करते हैं। इन्हीं दोनों कारणों से स्त्री पुरुषों में एक विलक्षण आकर्षण उत्पन्न होता है और मनुष्य रति करने के लिए विवश होता है। यह प्राणी-मात्र का अनादि अभ्यास है। किन्तु मनुष्य के लिए यह अभ्यास अच्छा भी है और बुरा भी। इस अभ्यास में जहाँ तक आर्यसभ्यता का सम्बन्ध है वहाँ तक तो अच्छा है, पर जहाँ से इसमें अनार्यता का संचार होता है वहाँ से इसका रूप भयङ्कर हो जाता है। मन पर काबू रखकर और आवश्यक सन्तान को उत्पन्न करके उस सन्तान को मोक्षमार्गी बनाना आर्यसभ्यता है और शोभा शृङ्गार, ठाट बाट के द्वारा कामुकता को बढ़ाकर और अपरिमित सन्तान को उत्पन्न करके संसार में अर्थ संकट उत्पन्न कर देना अनार्यसभ्यता है। आर्यसभ्यता मोक्षाभिमुखी है, इसलिए उसका अर्थ (भोजन, वस्त्र, गृह, और गृहस्थी) सादा है- उसमें शोभा शृङ्गार और ठाट-बाट के लिए गुंजायश नहीं है। किन्तु अनार्यसभ्यता शोभा श्रृङ्गार और ठाट बाट से सम्बन्ध रखती है अतः वह एक तो संसार में अर्थ संकट उत्पन्न कर देती है, दूसरे शोभा शृङ्गार से कामुकता बढ़ा देती है और अमर्यादित सन्तान उत्पन्न करके अर्थ संकट को और भी अधिक भयंकर रूप दे देती है जिससे दुष्काल, महामारी और युद्धों का प्रचंड तूफान उमड़ पड़ता है और सारा संसार अशान्त हो जाता है। इसलिए आर्यों ने अपने अर्थ में शोमा शृङ्गार और ठाट बाट के लिए बिलकुल ही स्थान नहीं दिया, प्रत्युत इसकी गणना काम में की है।
क्रमशः

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