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भारत दैट इज जातिस्तान …

लेखक – आर्य सागर

भारत सरकार के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कल आजादी से पूर्व 1872 से लेकर देश की 16वीं व आजादी के बाद आठवीं जनगणना के साथ-साथ जातिगत गणना का भी निर्णय लिया वह भी तब जब भारतीय समाज को एकजुट होने की आवश्यकता थी, देश की सीमाओं पर तनाव है । यह जनगणना 2021 में होनी थी 10 वर्ष की नियमित अवधि के उपरांत लेकिन वैश्विक कोरोना महामारी के कारण यह 4 वर्ष की देरी में हो रही है ऐसे में डेढ़ दशक के जनसंख्याकीय सामाजिक आर्थिक आंकड़े इस जनसंख्या में हमें मिलेंगे। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन महारजिस्ट्रार व जनगणना आयुक्त का कार्यालय जनगणना अधिनियम 1948 के तहत जनगणना की पूरी प्रक्रिया को संचालित करता है।

आधुनिक गणतंत्रतात्मक देशों में ही नहीं प्राचीन राजतंत्रों में भी जनगणना कराई जाती थी । यूनान, रोम, मिस्र, मौर्यकालीन भारत में जनगणना के ऐतिहासिक साक्ष्य मिलते हैं । जनगणना का सीधा सा मतलब है जन की गणना लेकिन भारत में ब्रिटिश रूल जब आया तो अंग्रेजों ने अपनी विभाजनकारी नीति के तहत भारत में जातियों की गणना 1931 में सबसे पहले कराई। शेड्यूल कास्ट ,डिप्रेस्ड क्लास जैसे शब्द पहली बार अस्तित्व में आए। देश के पहले गृहमंत्री लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1951 में जातीय जनगणना पर रोक लगाई अंग्रेजों के फैलाये विषैले बीजों की अंकुरण क्षमता को नष्ट करने के लिए। सरदार पटेल जी एक क्रांतिकारी दूरदर्शी राजनेता थे उनकी मान्यता थी जातीय जनगणना से भारतीय समाज विभाजित होता है जातीय संघर्ष तनाव उत्पन्न होता है ।यह राष्ट्र की एकता संप्रभुता के लिए खतरा है। वहीं सरदार पटेल जी ने देश के वंचित दलित अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए आरक्षण की पुरजोर वकालत की। सरदार पटेल जातीय जनगणना के प्रबल विरोधी थे । यही कारण है आजादी के उपरांत से वर्ष 2011 तक प्रत्येक वर्ष जनगणना में अनुसूचित जाति व जनजाति की गणना कराई जाती है उसके आंकड़े सार्वजनिक किए जाते हैं लेकिन इस बार मोदी सरकार ने जो जातीय अस्मिता पर आधारित क्षेत्रीय दल राजद व समाजवादी जैसे दलों के सामने घुटने टेके उनकी देश को बांटने वाली मांग को स्वीकार करते हुए पहली बार पूर्ण जातिगत जनगणना की जनगणना के साथ स्वीकृति दी है ।जिसके तहत अनुचित जाति जनजाति के साथ-साथ देश के पिछड़े वर्ग, अति पिछड़े वर्ग व सामान्य वर्ग की भी की गणना की जाएगी। उससे पूर्व वर्ष 2011 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी पूर्ण जातिगत जनगणना करा चुकी है लेकिन सरकार ने उसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किये न । कांग्रेस का तर्क था की जातियों की गणना में तकनीकी खामियां हैं आंकड़े उतने विश्वसनीय नहीं है संसद में तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने 16 कारण बताएं जिनके तहत जाति की जनगणना करना व्यावहारिक नहीं है ।वहीं कांग्रेस व उसके मुखिया आज जातिगत जनगणना पर श्रेय लूट रहे हैं।

भारत में जातिगत जनगणना का रास्ता तो वर्ष 2024 में उसी दिन तय हो गया था जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी सैद्धांतिक स्वीकृति इस पर दी थी। संघ प्रत्यक्ष व परोक्ष तौर पर सत्ता की मलाई चाटना चाहता है ऐसे में संघ कोई जोखिम उठाना नहीं चाहता 2024 के नतीजे चौंकाने वाले रहे कांग्रेस का प्रचारित भाजपा द्वारा संविधान नष्ट करने का दुष्प्रचार कुछ हद तक सफल रहा ऐसे में संघ व उसका अघोषित राजनीतिक संगठन भाजपा कोई जोखिम उठाना नहीं चाहती । भारत अभी तक सांप्रदायिक मुस्लिम तुष्टिकरण का शिकार रहा है वहीं अब यह जातीय तुष्टीकरण का भी शिकार होगा । कोई पार्टी कोई राजनेता चाहे कितना ही लोकप्रिय हो वह शाश्वत नहीं होता शाश्वत सत्ता केवल राष्ट्र की होती है बुरे शासक हो या अच्छे शासक या सरकारे दोनों की ही नीतियो निर्णयों का भोगी अच्छाई या बुराई के रूप में राष्ट्र बनता है।

देश में अनुसूचित जनजाति, जाति व पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था है आरक्षण की सीमा 50 फीसदी को पार कर रही है कुछ राज्यों में जबकि सुप्रीम कोर्ट कह चुका है 50 फ़ीसदी से यदि आरक्षण दिया जाता है तो यह संविधान की समता, अवसर की समानता के मूलभूत सिद्धांत की विरोधी भावना है।

भारतीय लोकतंत्र की यह खूबसूरती कहे या कमजोरी कहें भारत की प्रजा जो मांगती है वह उसे इस देश की संसद व कार्यपालिका व्यवस्थापिका नहीं देती । भारत की प्रजा की ओर से संगठित व असंगठित तौर पर न्यायपालिका में कॉलेजियम, प्रशासनिक भ्रष्टाचार ,पर्यावरण प्रदूषण ,मिलावट खोरी जैसे विषयों पर बेहतर विधानों उपचारों की मांग समय-समय पर उठती रही है लेकिन इस दिशा में सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया और जिसकी मांग भारत की प्रजा नहीं करती उन मांगों को कार्यपालिका वोट बैंक की राजनीति के चलते यूं ही पूरी कर देती है।

जाति व जाति के आधार पर उत्पीड़न भारत में रहा है आज भी है कम या ज्यादा यह विवाद का विषय हो सकता है। ठीक आरक्षण जैसी व्यवस्था से इसका उपचार भी किया गया है कुछ हद तक।जाति सूचक उपाधियां ,राजे राजवाड़े का देश में आजादी के बाद अंत किया गया तो वहीं जाति के नाम से चल रही शैक्षणिक संस्थाओं का भी नाम बदल गया लेकिन फिर भी जाति जैसी व्यवस्था को कोई नष्ट नहीं कर पाया इसका कारण राजनीतिक दल भी रहे हैं समय-समय पर इन्होंने जाति जैसी विकृत व्यवस्था को खाद पानी दिया है। जाति रोग है रोग की गणना नहीं की जाती ,रोग का उपचार किया जाता है। जाति भारतीय समाज का मूल स्वभाव नहीं है यह एक नैमित्क सामाजिक रोग है जो भारतीय समाज को मध्यकाल में लगा प्रत्येक नैमित्क रोग का उपचार संभव है।

जनगणना केंद्र की सूची का विषय है लेकिन जाति आधारित दलों ने अपने-अपने राज्यों में तो वहीं राष्ट्रीय दलों ने भी स्वतंत्र रूप से जातियों की गणना कराई जिन्हें उन्होंने सर्वे नाम दिया कर्नाटक, तेलंगाना ,बिहार में जातीय सर्वे हुए हालांकि उन सर्वो की विश्वसनीयता पारदर्शिता पर प्रश्न चिन्ह लगते रहे हैं। यह सब कुछ मोदी सरकार पर दबाव बनाने के लिए किया गया और मोदी सरकार इस चक्रव्यूह में फंस गई। उन जातीय सर्वो में सबसे बड़ी चुनौती वहां यह आई परंपरागत तौर पर जो स्वर्ण जातियां थी उन्होंने अपने आप को ओबीसी व एससी एसटी में दर्ज कराया तो वहीं कुछ ऐसी नई जातियां भी दर्ज की गई जिन्होंने ओबीसी के स्थान पर अपनी उपजाति को दर्ज कराया कुछ ऐसी जातियां तेलंगाना में अस्तित्व में आई जिनके सदस्यों संख्या केवल 10 से भी कम थी।

जाति आधारित जनगणना के पक्ष में सर्वाधिक तर्क यह दिया जाता है कि इसके कारण पिछड़ों व अति पिछड़ों को सामाजिक राजनीतिक आर्थिक न्याय नहीं मिला 90 वर्ष के पुराने आंकड़ों के आधार पर ओबीसी आरक्षण तय किया गया है। यह जग जाहिर है पिछड़ी ,अति पिछड़ी जातियों की सामाजिक आर्थिक स्थिति अनुसूचित जाति व जनजाति की अपेक्षा बेहतर रही है। यह भी एक कटु सत्य है जहां दलितों पर अत्याचार हुआ या होता है अधिकांशतः उसका माध्यम भी यह पिछड़ी जातियां ही बनी है।

पिछड़ेपन में शैक्षिक तौर पर पिछड़ेपन का एक मानदंड निर्धारित किया गया था लेकिन आज शिक्षा पीछे छूट गई है यदि आप पीएचडी स्कॉलर हैं तो आप तब भी पिछड़े ही कहलाएंगे और आपके बच्चे भी पिछड़े ही कहलाएंगे। ओबीसी की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दलों ने अनेक दशकों से यह दुष्प्रचार फैलाया की ओबीसी को सामाजिक आर्थिक राजनीतिक न्याय नहीं मिल पा रहा है अपितु कल जब सरकार ने यह निर्णय लिया है कि पिछड़ों व अति पिछड़ों की भी गणना की जाएगी तो नए जहरीले स्लोगन इन क्षेत्रीय दलों व इनके समर्थकों के द्वारा जारी किए जा रहे हैं जिसमें एक चिरपरिचित वही राग है जो किसी भी लोक कल्याणकारी समतावादी प्रजातांत्रिक राष्ट्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी ,अखिलेश यादव , तेजस्वी यादव जैसे विभाजनकारी सोच रखने वाले राजनेता अब यह कहने लगे हैं कि देश के संसाधनों को जातियों के आधार पर बांटा जाए देश के 60 से 70 फीसदी संसाधनों पर देश के पिछड़ा वर्ग आदिवासियों का अधिकार है। ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन हिमालय पर्वत हिंद महासागर ,गंगा यमुना जैसी नदियों को भी बांट दिया जाएगा देश के खनिज संसाधनों को भी जाति के आधार पर बांटने की बात की जा सकती है क्योंकि भारत को जातिस्तान बनाने की दिशा में अब केंद्र सरकार चल पड़ी है।

मूल प्रश्न यही है आप पिछड़ा व अति पिछड़ा किस आधार पर तय करेंगे। आजादी के बाद से लेकर आज पर्यंत पिछड़ों व अति पिछड़े की सामाजिक स्थिति तय करने के लिए कोई भी समाज वैज्ञानिक मानदंड नहीं बना है। देश के कुछ राज्यों में जो जातियां अनुसूचित जाति के तौर पर दर्ज है तो अन्य प्रदेशों में वह पिछड़ा वर्ग में आती है तो वहीं जो जातियां कुछ राज्यों में पिछड़ा वर्ग में दर्ज है केंद्र की सूची में तो अन्य राज्यों में वह सामान्य वर्ग में आती है, राज्य की सूची में। जातिगत जनगणना इतनी आसान नहीं है। अंग्रेजों ने विभाजनकारी सोच के तहत अपना मतलब साधने के लिए अपारदर्शिता एवं अविशेज्ञता से हासिल आंकड़ों को पारदर्शी बताकर प्रचारित किया वही कार्य जातिगत सर्वे के आधार पर बिहार तेलंगना कर्नाटक सरकार ने किया। गृहमंत्री चिदंबरम में भी ऐसी ही आशंका देश की संसद में व्यक्त की थी फिर मोदी सरकार के आंकड़ों को कैसे विश्वसनीय माना जाएगा।

उत्तर प्रदेश में नाई व कुंभकार समाज को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया है लेकिन सामाजिक तौर पर इन समाजो को भी अतीत में व आज भी सामाजिक भेदभाव का शिकार होना पड़ता हैं उसकी सामाजिक स्थिति भी जाटव समाज की तरह ही है। यह तो उदाहरण मात्र है।

सरकार को आवश्यकता थी साहसिक निर्णय लेते हुए पवित्र हृदय व भावना से अनुसूचित जनजाति जाति व पिछड़े वर्ग के मानदंडों को तय करती आजादी के उपरांत से लेकर आज पर्यंत जिस जिस व्यक्ति ने आरक्षण का लाभ लिया है उसकी सामाजिक आर्थिक स्थिति का आकलन होता। एक नेशनल डाटाबेस बनाया जाता।

आरक्षण का लाभ इसकी हकदार सभी जातियों व उसमें आने वाली उपजातियां को नहीं मिला है उदाहरण के लिए कहा जाता है दलितों के आरक्षण में जाटव व ओबीसी आरक्षण में यादव सर्वाधिक लाभार्थी रहे हैं ऐसा क्यों हुआ इस पर विस्तृत विवेचना केंद्र सरकार की ओर से की जानी अपेक्षित थी।

दोनों ही पार्टियों चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस सरदार पटेल व उनकी विचारधारा पर अपना एकाधिकार सिद्ध करती हैं लेकिन यहां इन दोनों ही राष्ट्रीय दलों ने सरदार पटेल की विचारधारा के साथ न्याय नहीं किया। जातिगत जनगणना के लिए कोई भी जन आंदोलन नहीं हुआ फिर भी वर्तमान मोदी सरकार ने इतनी सहजता से इस राष्ट्र समाज भारत विरोधी मांग को स्वीकार कर लिया जो जाति आधारित परिवारवादी पार्टीयो के मुखियाओ की ओर से उठाई गई थी।

जातिगत जनगणना के सामाजिक राष्ट्रीय एकता के दृष्टिकोण से बहुत ही नकारात्मक परिणाम आएंगे । बहुसंख्यक से अल्पसंख्यक बनते हिंदू ही इसका एक दिन शिकार बनेंगे। कल्पना कीजिए यदि देश में जिसे स्वर्ण वर्ग कहा जाता है उसकी आबादी 10 फीसदी से भी कम रहती है तो क्या सामाजिक राजनीतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत वह वर्ग देश में पिछड़ा वर्ग व अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग की तर्ज पर एक अदद स्वर्ण आयोग की मांग नहीं करेगा। पिछड़ों व सामान्य वर्ग के बीच इससे खाई और अधिक बढ़ेगी। जाति की जनगणना का निर्णय न केवल भाजपा अपितु इसके मातृ संगठन संघ का भी जातिविहिन समाज की स्थापना के क्षेत्र में उसकी प्रतिबद्धता व प्रयासों की असफलता भी है, यह नैतिक ह्रास भी है।

वही आर्य समाज आजादी से पूर्व आज भी जातिवाद व जातिगत जनगणना का प्रबल विरोध करता है, करता रहेगा। आर्य समाज के लिए सत्ता नहीं ,राष्ट्र देवता सर्वोपरि रहा है।

लेखक – आर्य सागर
तिलपता, ग्रेटर नोएडा।

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