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क्या भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बन जाएगा

आज भारत के संदर्भ में यह सपना देखा जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा किए गए विभिन्न सुधार कार्यक्रमों के बल पर वर्ष 2047 तक भारत एक विकसित राष्ट्र बन जाएगा। परंतु, सकल घरेलू उत्पाद में औसतन लगभग 7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर के साथ क्या भारत वास्तव में वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बन पाएगा अथवा भारत को अभी भी कई प्रकार के सुधार कार्यक्रमों को लागू करने की आवश्यकता है। किसी भी देश को अपनी आर्थिक विकास दर को तेज करने के लिए कई प्रकार के सुधार कार्यक्रम लागू करने होते हैं। भारत ने वर्ष 1947 में राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात, एक लम्बे अंतराल के पश्चात देश में आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को वर्ष 1991 में प्रारम्भ किया। जबकि इस समय तक अमेरिका एवं कई यूरोपीय देश विकसित राष्ट्र बन चुके थे एवं चीन ने तो आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को वर्ष 1980 में ही लागू कर दिया था तथा अपनी वार्षिक आर्थिक विकास दर को दहाई के आंकड़े के भी पार ले गया था। भारत इस मामले में बहुत पिछड़ चुका था।

श्री राजीव गांधी सरकार ने वर्ष 1985-86 में भारतीय संसद में एक सुधारवादी बजट पेश जरूर किया था परंतु वे इन कार्यक्रमों को बहुत आगे नहीं बढ़ा पाए। परंतु, वर्ष 1991 में श्री नरसिम्हा राव सरकार ने देश में लाइसेन्स राज को समाप्त कर सुधारवादी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया था। इसके पूर्व निजी क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था में उचित स्थान प्राप्त नहीं था और केवल पब्लिक सेक्टर के दम पर ही भारत विकास की राह पर आगे बढ़ रहा था। तात्कालीन केंद्र सरकार द्वारा समाजवादी नीतियों को अपनाए जाने के चलते भारत में सुधारवादी कार्यक्रमों को लागू करने में बहुत अधिक देर कर दी गई थी। वर्ष 1947 में भारत के राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात बड़े उद्योगों पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग पर उचित ध्यान नहीं दिया गया। पेट्रोलियम रिफाइनरी, मशीनरी एवं तकनीकी उद्योगों पर भी विशेष ध्यान नहीं दिया गया जबकि आज यह समस्त उद्योग देश में अत्यधिक सफल होकर देश के आर्थिक विकास को गति देने में सहायक हो रहे हैं।

वर्तमान में केंद्र सरकार 2047 में भारत को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में लाने के लिए अथक प्रयास कर रही है। हाल ही के वर्षों में लागू किए गए सुधार कार्यक्रमों में शामिल हैं – वस्तु एवं सेवा कर बिल, ऋणशोधनाक्षमता बिल, दिवालियापन बिल, आदि। श्रम कोड को भारतीय संसद ने पास कर दिया है परंतु देश में लागू किया जाना शेष है, कुछ राज्यों जैसे महाराष्ट्र में जमीन अधिग्रहण बिल पर कार्य चालू है। ईज आफ डूइंग बिजनेस के क्षेत्र में काफी अच्छा काम हुआ है और आज विभिन्न प्राजेक्ट्स को समय पर स्वीकृती मिल जाती है। भारत में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित अवस्था में आ चुका है। भारत को विश्व की सबसे कमजोर 5 अर्थव्यवस्थाओं की सूची में से निकालकर विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की श्रेणी में ले आया गया है। फिर भी, भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए केवल 7 प्रतिशत की वार्षिक विकास दर काफी नहीं है।

वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर 8.2 प्रतिशत की रही है और प्रति व्यक्ति आय लगभग 2,300 अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष है। किसी भी देश को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में तभी शामिल किया जाता है जब उस देश के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय 13,000 अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष के आस पास हो। इस दृष्टि से भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए भारतीय नागरिकों की औसत आय लगभग 8 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़नी चाहिए। इस प्रकार, भारत का सकल घरेलू उत्पाद भी यदि 8 प्रतिशत के आसपास प्रतिवर्ष बढ़ता है तो वर्ष 2047 तक भारत एक विकसित राष्ट्र निश्चित ही बन सकता है। परंतु इसके लिए भारत में आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को और अधिक गति देनी होगी।

आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में सुधार कार्यक्रम लम्बे समय तक चलने वाली सतत प्रक्रिया है। कई बार तो सुधार कार्यक्रम सम्बंधी कानून बनाने के बाद उन्हें लागू करने में भी लम्बा समय लग जाता है। जैसे भारत में 4 श्रम कोड वर्ष 2019-2020 के बीच में संसद द्वारा पास किए गए थे परंतु इन कोड को अभी भी लागू नहीं किया जा सका है। हालांकि वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में कई सुधार कार्यक्रम लागू किए गए हैं परंतु अभी भी कई क्षेत्रों में काम किया जाना शेष है। जैसे, भारत में पूंजी आज भी बहुत अधिक ब्याज दर पर उपलब्ध हो पाती है, हालांकि ऋण प्रदान करने सम्बंधी नियमों को शिथिल बनाया गया है, परंतु पूंजी की लागत बहुत अधिक है। भारत में युवा जनसंख्या अच्छी तादाद में है, आज भारत के नागरिकों की औसत आयु केवल 29 वर्ष है जो विश्व की 10 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम है। यह भारत के लिए यह लाभदायक स्थिति है परंतु भारत आज भी इस स्थिति का लाभ नहीं उठा पा रहा है। इस प्रकार के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर भारत में अभी भी बहुत काम किए जाने की आवश्यकता है।

भारत को अभी भी आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव की बहुत अधिक आवश्यकता है। हमारे देश की मजबूती किन क्षेत्रों में हैं इन क्षेत्रों को चिन्हित कर हमें उन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। जैसे उत्पादकता के मामले में अन्य देशों, विशेष रूप से पश्चिमी देशों, की तुलना में हम अभी भी बहुत पिछड़े हुए हैं। उत्पादकता कम होने के चलते भारत में निर्मित उत्पादों की लागत अधिक रहती है। देश में करों की दर (प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष) अन्य देशों की तुलना में बहुत अधिक है, इसे कम करने के सम्बंध में गम्भीरता से विचार करने की आज महती आवश्यकता है। साथ ही, बैकों द्वारा प्रदान किए जा रहे ऋण पर ब्याज की दर भी बहुत अधिक है, इससे भी उत्पादन लागत में वृद्धि होती है और भारत में निर्मित उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक लागत के चलते टिक नहीं पाते हैं। अतः अब समय आ गया है कि ब्याज दरों को कम करने के बारे में भी गम्भीरता से विचार हो।

देश में हर समय कहीं न कहीं चुनाव हो रहे होते हैं और कई बार तो देश के बहुत बड़े भू भाग पर चुनाव आचार संहिता के लागू होने के चलते केंद्र एवं राज्य सरकारों को अपने पूंजीगत खर्चे रोकने होते हैं, इससे देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः देश में वन नेशन वन इलेक्शन को भी लागू करने की महती आवश्यकता है। साथ ही, आजकल कुछ राज्य सरकारों के बीच नागरिकों को मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराने की जैसे होड़ ही लग गई है। मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराने से इन प्रदेशों के बजट पर अत्यधिक दबाव उत्पन्न होता है। अतः इस प्रकार के खर्चों पर रोक लगाए जाने की भी आज आवश्यकता है।

भारत की आर्थिक विकास दर को 10 प्रतिशत से भी ऊपर ले जाया जा सकता है यदि हिंदू सनातन संस्कृति की अर्थव्यवस्था को भारत में बढ़ावा दिया जाय। इसके लिए देश के ब्यूरोक्रेसी के सोच में परिवर्तन लाना भी आवश्यक है। भारत में भव्य मंदिरों का निर्माण कर एवं इन स्थानों पर अधिकतम सुविधाएं उपलब्ध कराते हुए धार्मिक पर्यटन को जबरदस्त बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे होटल उद्योग, परिवहन उद्योग, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को बहुत लाभ होगा एवं रोजगार के करोड़ों नए अवसर भी निर्मित होंगे। देश में शादियों के मौसम में लाखों करोड़ रुपए का खर्च होता है तथा विभिन्न त्यौहारों पर भी भारतीय नागरिकों के खर्च में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है। इस सबका प्रभाव अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक रहता है, अतः शादियों के मौसम एवं विभिन्न त्यौहारों पर नागरिकों को सरकार द्वारा विशेष सुविधाएं प्रदान करने से विभिन्न उत्पादों की खपत में वृद्धि की जा सकती है। और, अंततः यह देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि करने में सहायक होगा। अतः हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों को देश में लागू करने के संदर्भ में अब देश के ब्यूरोक्रेसी को गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है। आज अतीत के बोझ को छोड़कर भविष्य की तरफ देखने की भी आवश्यकता है और देश के आर्थिक विकास के लिए नित नए क्षेत्रों की तलाश भी जारी रखनी होगी।

हाल ही के समय में देश में बचत एवं निवेश दर में कमी देखी जा रही है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भी कमी दृष्टिगोचर हुई है और विदेशी व्यापार घाटा भी लगातार बढ़ रहा है क्योंकि देश में स्वर्ण एवं कच्चे तेल का आयात अत्यधिक मात्रा में हो रहा है और विभिन्न उत्पादों का निर्यात उस गति से नहीं बढ़ पा रहा है। स्वर्ण के आयात को तो नियंत्रित करना आवश्यक है क्योंकि यह किसी भी प्रकार की उत्पादकता अथवा लाभ अर्जन में भागीदारी नहीं करता है बल्कि यह निवेश निष्क्रिय निवेश की श्रेणी में गिना जाता है। स्वर्ण में निवेश की जा रही विदेशी मुद्रा को यदि विनिर्माण इकाईयों की स्थापना पर खर्च किया जाय तो यह देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि करने में सहायक होगा।

किसी भी विनिर्माण इकाई की स्थापना के लिए विशेष रूप से 6 घटकों की आवश्यकता होती है यथा – भूमि, पूंजी, श्रम, नई तकनीकी, संगठन एवं साहस। भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार नौकरी को निकृष्ट कार्य की श्रेणी में गिना जाता रहा है एवं अपना उद्यम चलाना उच्च कार्य माना जाता है। अतः संगठन क्षमता एवं साहस भारत के मूल नागरिकों के डीएनए में है। नई तकनीकी को विकसित करने में भारत के युवा इंजीनीयरों ने पूरे विश्व को राह दिखाई है। अतः भारत में केवल भूमि, पूंजी एवं श्रम की लागत को कम करने में यदि सफलता हासिल की जा सके तो भारत की आर्थिक विकास दर को 10 प्रतिशत से भी ऊपर ले जाया जा सकता है। भूमि, पूंजी एवं श्रम जहां भी आसानी से एवं उचित दामों पर उपलब्ध होंगे वहां उद्योग धंधे आसानी से फलेंगे एवं फूलेंगे।

– प्रहलाद सबनानी

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