जब गांधी जी ने स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल रशीद को अपना भाई कहा था

स्वामी श्रद्धानंद

२३ दिसंबर १९२६, अपने छोटे से आवास पर एक आर्य (हिंदू) सन्यासी रोग शैय्या पर औषधि का सेवन करके शांत अवस्था में लेटे हुए थे। अचानक आवास की सीढ़ियों पर कुछ हलचल हुई और एक व्यक्ति प्रकट हुआ। यह कोई विशेष बात नहीं थी रोगी संयासी से बहुधा लोग मिलने आ ही जाते थे। सन्यासी से उस व्यक्ति ने कुछ वार्तालाप किया। सन्यासी के आदेश पर सेवक ने उसको जल पिलाया। सेवक के कमरे से बाहर जाते ही इस व्यक्ति ने सन्यासी पर प्राण घाती आक्रमण कर दिया। आहत सन्यासी आर्य जगत के शीर्ष स्तंभ तथा हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वामी श्रद्धानंद थे और आक्रमणकारी अब्दुल रशीद।

आधुनिक भारत के युग प्रवर्तक महर्षि देव दयानंद सरस्वती के अनन्य भक्त, भारत में गुरुकुलीय शिक्षा के पुनरुद्धारक, कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के पूर्व स्वागताध्यक्ष स्वामी श्रद्धानंद का जन्म २२ फरवरी १८५६ को तलवण, जालंधर जिले में एक पंजाबी राजपूत वंश में हुआ था। सन्यास लेने से पूर्व उनका नाम मुंशीराम था। उनके पिता नानक चंद पुलिस में थे और उस विभाग में उन्नति करते हुए अंग्रेज साहब बहादुर की कृपा से निरीक्षक के पद तक जा पहुंचे थे। इसी से स्पष्ट है कि उनके पिता कितने बड़े राज भक्त थे।मुंशीराम, अपने छह भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। व्यवसाय से वे एक वकील थे तथा कोई भी दुर्व्यसन ऐसा नहीं था जो उनके चरित्र का साथ नहीं निभा रहा हो। इनकी युवावस्था में ही ऋषि दयानंद ने समाज व राष्ट्र के जागरण हेतु अपना सब कुछ दांव पर लगा रखा था । वे जन जागरण अभियान के अंतर्गत प्रचार करते-करते बरेली में आ पहुंचे। सौभाग्य से मुंशी राम के पिता का कार्यक्षेत्र भी बरेली ही था तथा वे ऋषि दयानंद की सुरक्षा के हेतु उत्तरदायी थे। ऋषि दयानंद के ओजस्वी व्याख्यानों का नाद चतुर्दिक था ।निरीक्षक नानक चंद्र ऋषि के व्याख्यानों से प्रभावित हो रहे थे। वे अपने पुत्र के चारित्रिक अवगुणों से अत्यंत त्रस्त रहते थे। उन्होंने विचार किया कि यदि ऋषि के व्याख्यानों को सुनने के लिए वह मुंशी राम को प्रेरित कर सके तो संभवत: उसके जीवन में परिवर्तन आ जाए। अत: उन्होंने अपने पुत्र मुंशीराम को ऋषि के व्याख्यान श्रवण हेतु प्रेरित किया।

एक देवता के संपर्क में आकर जीवन में अवनति से उन्नति व कल्याण का मार्ग कैसे विकसित होता है एवं वह मार्ग किस तरह से मुंशीराम को अमर हुतात्मा सन्यासी श्रद्धानंद बना देता है, यह तथ्य पाठक गण स्वामी श्रद्धानंद की जीवनी कल्याण मार्ग का पथिक पढ़कर ज्ञात कर सकते हैं। अपनी जीवन गाथा को महर्षि दयानंद के चरणों में समर्पित करते हुए स्वामी श्रद्धानंद ने जो निवेदन किया वह इस प्रकार है कि – ऋषि वर! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे हुए ४१वर्ष हो चुके हैं परंतु तुम्हारी दिव्य मूर्ति मेरे हृदय पटल पर ज्यों की त्यों अंकित है। मेरे निर्बल हृदय के अतिरिक्त कौन मरण धर्मा मनुष्य जान सकता है कि कितनी बार गिरते-गिरते तुम्हारे स्मरण मात्र ने मेरी आत्मिक रक्षा की है। तुमने कितनी गिरती हुई आत्माओं की काया पलट दी, इसकी गणना कौन मनुष्य कर सकता है? परमात्मा के बिना, जिसकी गोद में तुम आज विचर रहे हो, कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को दग्ध कर दिया परंतु अपने विषय में कह सकता हूं कि तुम्हारे सहवास ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठाकर सच्चे लाभ करने के योग्य बनाया । मैं क्या था इसे मैंने इस कहानी में छुपाया नहीं। मैं क्या बन गया और अब क्या हूं, वह सब तुम्हारी कृपा का ही परिणाम है इसलिए इससे बढ़कर मेरे पास तुम्हारी जन्म शताब्दि पर कोई भेंट नहीं हो सकती कि तुम्हारा दिया आत्मिक जीवन तुम्हें ही अर्पण करूं। तुम वाणी द्वारा प्रचार करने वाले तत्व वेत्ता ही न थे परंतु जिन सच्चाईयों का तुम संसार में प्रचार करना चाहते थे उनको क्रिया में लाकर सिद्ध कर देना भी तुम्हारा ही काम था। भगवान कृष्ण की तरह तुम्हारे लिए भी तीनों लोकों में कोई कर्तव्य शेष नहीं रह गया था परंतु तुमने मानव संसार को सीधा मार्ग दिखलाने के लिए कर्म की उपेक्षा नहीं की। भगवन मैं तुम्हारा ऋणी हूं, उस ऋण से मुक्त होना चाहता हूं इसलिए जिस परमपिता की असीम गोद में तुम परमानंद का अनुभव कर रहे हो उसी से प्रार्थना करता हूं कि मुझे तुम्हारा सच्चा शिष्य बनने की शक्ति प्रदान करें।…

दुर्व्यसन एवं नास्तिकतावाद से बाहर निकल कर कोई व्यक्ति इतना पूज्य यदि हो सकता है तो यह एक चमत्कार ही है। स्वामी श्रद्धानंद के जीवन में ऋषि दयानंद का आना ही वह चमत्कार है और इसी के प्रभाव से ही मुंशीराम, स्वामी श्रद्धानंद बनकर करोड़ों नागरिकों के लिए पूज्य बन गए। स्वामी श्रद्धानंद का मार्ग अपने गुरु ऋषि दयानंद की गुरूकलीय शिक्षा पद्धति की ओर प्रशस्त हो गया। वे विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए कृत संकल्प हो गए। राजनैतिक क्षेत्र में उनकी रूचि भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक ही सीमित रही इसीलिए कांग्रेस के अखिल भारतीय नेता होने के पश्चात भी उन्होंने कांग्रेस का कोई पद स्वीकार नहीं किया और इसीलिए मुसलमानों में भी उन्हें एक मान्यता प्राप्त हुई, उसी के कारण दिल्लीकी जामा मस्जिद में उन्हें व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया गया और भारतीय इतिहास का वह पल आज भी अक्षुण्ण है कि किसी सन्यासी ने जामा मस्जिद की प्राचीर से वेद मंत्र के माध्यम से अपना व्याख्यान प्रारंभ किया। इसी प्रकार स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज को स्वर्ण मंदिर के अकाल तख्त से भी व्याख्यान करने का अवसर प्राप्त हुआ था। चाहे जामा मस्जिद की प्राचीर हो अथवा स्वर्ण मंदिर का अकाल तख्त से व्याख्यान करना, महर्षि देव दयानंद के पटु शिष्य स्वामी श्रद्धानंद, तब से वर्तमान तक एकमात्र व्यक्तित्व हैं ।गांधीजी जीवन भर स्वयं को सभी का नेता सिद्ध करने के लिए बिरला मंदिर में कुरान की आयतें पढ़ते रहे ,लेकिन उपरोक्त सम्मान तो वे कभी भी प्राप्त नहीं कर सके थे।वे जामा मस्जिद अथवा अकाल तख्त से कभी भी अपना व्याख्यान नहीं दे सके।

जब गांधी जी और उनके अंध भक्तों ने मुसलमानों की अनुचित मांगों को स्वीकार करने के पश्चात भी उनका तुष्टिकरण करते हुए हिंदुओं की अनदेखी करना नहीं छोड़ा तो विरोध स्वरूप स्वामी श्रद्धानंद ने कांग्रेस को त्याग दिया लेकिन विदेशी सत्ता को उखाड़ने के अभियान में वह यथावत संघर्ष करते रहे। स्वामी श्रद्धानंद को यह आभास हो गया था कि हिंदू की दुर्बलता ही उसे असहाय बनाए हुए है। अपने ही करोड़ों बंधुओं के प्रति अस्पृश्यता का भाव एवं सामाजिक संगठन का अभाव हिंदुओं की मुख्य दुर्बलताएं हैं, अतः उन्होंने इन दुर्बलताओं के निवारणार्थ सामाजिक उत्थान कार्यक्रम को अपने आंदोलन का मुख्य अंग बना लिया। उन्होंने भारतीय हिंदू शुद्धि सभा और दलितोंद्धार सभा स्थापित कर हिंदुओं की अशुद्धि दूर करके उन्हें सुशिक्षित बनाते हुए ऊपर उठाने का अभियान प्रारंभ कर दिया। विदेशी शासन के अत्याचारों अथवा अपनों के द्वारा अपमान जनक व्यवहार के कारण जो हिंदू, ईसाई अथवा मुसलमान बन गए थे ऐसे बंधुओं को स्नेह व सम्मान से अपना कर पुनः उन्हें उनकी मूल धारा में सम्मिलित करना एक सशक्त चुनौती थी लेकिन स्वामी जी ने सफलतापूर्वक उस चुनौती से पार पाते हुए सामाजिक उत्थान व राष्ट्रोद्धार का कार्य किया जो उस समय तो महत्वपूर्ण था ही आज भी प्रासंगिक है।

राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति भी स्वामी जी का अनुराग अतुलनीय है। जालंधर में राष्ट्रीय कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष के रूप में उन्होंने हिंदी में भाषण देकर इतिहास के स्वर्णाक्षरों में अपना नाम अमर कर लिया क्योंकि उनसे पूर्व समस्त भाषण आंग्ल भाषा में ही हुआ करते थे, न जाने किसके लिए?क्योंकि भारत में तो आज भी लोग, स्वाधीन भारत की समस्त सरकारों के अथक प्रयास के पश्चात भी अंग्रेजी नहीं समझ पाते।

स्वामी जी के सुधार कार्य विशेष कर शुद्धि आंदोलन कुछ लोगों की आंखों में खटक रहे थे गांधी जी ने शुद्धि आंदोलन का स्पष्ट विरोध किया था, संभवतः स्वामी जी पर हुए इस प्राण घाती आक्रमण का अभियुक्त गांधी जी के विरोध एवं मदांधता से प्रेरित था तथा अब्दुल रशीद ने स्वामी श्रद्धानंद जी की हत्या कर दी। यहां दुखद पहलू यह है कि अहिंसा का ध्वज उठाने वाले गांधी जी ने इस हत्या की निंदा नहीं की वरन अब्दुल रशीद को अपना भाई कहा। इतना होता तब भी ठीक था जब न्यायालय ने उसे मृत्यु दंड सुना दिया तो कथित महात्मा ने उस मृत्युदंड की भी आलोचना की और यह प्रत्यक्ष कर दिया कि अहिंसा के तथाकथित पुजारी गांधी जी का मंत्र उनके स्वयं के लिए कितना छद्म था। वह हिंसा के पुजारी अब्दुल रशीद का समर्थन कर रहे थे। संभवतः एक हिंदू की हत्या उनके लिए अहिंसा थी और इसीलिए उन्होंने उस हत्या का समर्थन किया था। गांधी जी के भक्त भी संभवतः उनके इस उदाहरण से प्रेरित होकर इसी मार्ग पर चलते हैं, तभी तो गांधी जी की हत्या के पश्चात चित पवन ब्राह्मणों तथा इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात सिक्खों की सामूहिक रूप से हत्याएं की गई।अस्तु। २३ दिसंबर २०२४ को धर्म, जाति और राष्ट्र पर बलिदान होने वाले कल्याण मार्ग के पथ प्रदर्शक स्वामी श्रद्धानंद को कृतज्ञता पूर्ण श्रद्धांजलि व कोटिशः नमन अर्पित करते हुए निवेदन है कि हे महाबाहु आपने ऋषि दयानंद का ऋण अपने लहू से चुका कर वास्तविक शिष्य धर्म का निर्वहन किया है।

– बृजेन्द्र सिंह वत्स
(लेखक दैनिक आर्यावर्त केसरी के साहित्य संपादक हैं।)

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