devendra singh arya
(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की पुस्तक वैदिक सम्पत्ति नामक से अपने सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)

गतांक से आगे ….
ऐसे आहार को आयों की परिभाषा में सात्त्विक आहार कहते हैं। सात्त्विक आहार का स्वरूप और प्रभाव वर्णन करते हुए भगवद्गीता में कृष्ण भगवान् कहते हैं कि-

आयुः सत्वबला रोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्त्याः स्निग्धाः स्थिरा हुद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ।।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।

अर्थात् आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख और सौन्दर्य के बढ़ानेवाले रसीले, चिकने, पुष्ट और रुचिकर आहार ही सात्त्विक पुरुषों को प्रिय हैं। इसलिए मोक्षार्थियों को सदैव एकान्त-सेवी, हल्की खूराक के खानेवाले और शरीर, बाणी और मन को वश में करनेवाले होना चाहिए। इस सात्त्विक और हलकी खुराक का खुलासा करते हुए वेद भगवान् कहते है कि-

ऊर्ज वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परित्तम् ।
स्वधा स्थ तर्पयत में पितुन। (वा० यजु० २३४)

अर्थात् घी दूष, अन्नरस (मिश्री), पके हुए परिस्रति (टपके हुए) फल और जल आदि बलकारक पदार्थों को खा पीकर हे स्वास्थ पितरो ! आप तृप्त हों। इस मन्त्र में उस आहार का स्वरूप स्पष्ट कर दिया गया है जिसको गीता ने सात्त्विक आहार कहा है और जिसको पितृपूजन के बाद आर्यों को नित्य खाना चाहिये। गीता ने सात्त्विक आहार का लक्षण रसीला, चिकना, पुष्ट और रुचिकर किया है और वेदमन्त्र ने उसी को घी, दूध, मिश्री, जल और फल बतलाया है। दोनों का एक ही तात्पर्य है। घी, दूध, मिश्री, जल और फल ही रसीले, चिकने, पुष्ट और रुचिकर होते हैं। इसलिए घी, दूध, मिश्री, जल और फल ही आर्यों का आहार है। यही आहार उपर्युक्त चारों परीक्षाओं से परीक्षित भी है। इन्हीं पदार्थों के खाने पीने से आयु, बल, मेघा और सत्त्व की वृद्धि होती है, इन्हीं पदार्थों के खाने से न किसी को कष्ट होता है और न किसी प्राणी की आयु और भोगों में बाधा पड़ती है। ये ही पदार्थ विना किसी प्रकार का कष्ट उठाए केवल फलों की वाटिका लगाने और गौवों की सेवा करने से ही प्राप्त हो जाते हैं और हलकी खुराक होने से यही पदार्थ ब्रह्मचर्य और योगाभ्यास में भी सहायक होते हैं और मोक्षसाधन के योग्य बनाते हैं। इसी लिए आर्यशास्त्रों में इष्टापूर्त के द्वारा बाग बगीचों से फलों की और गोरक्षा के द्वारा भी दूध की प्राप्ति करना उत्तम कहा गया है। जो लोग कहते हैं कि फलों के खाने से और गौ का दूध पीने से भी हिंसा होती है, वे न फल उत्पन्न करने की विद्या जानते हैं, न फलों का खाना जानते हैं और न गोवों के दूध का ही कुछ हाल जानते हैं। इसलिए हम यहाँ थोड़ा सा इन दोनों विषयों में भी प्रकाश डालने का यत्न करते हैं।

मनुष्य आहार के चार प्रकार हैं, जिनकी प्राप्ति वृक्षों और पशुओं से होती है। इनमें दो प्रकार का आहार वृक्षों से और दो प्रकार का पषुओं से प्राप्त होता है। दूध और मांस पशुओं से तथा फल और अनाज वृक्षों से प्राप्ते होते हैं। इनमें फल दूध और घृतादि सात्त्विक, अनाज और शाकादि राजस और मांस मद्यादि तामस अन्न है। सात्विक अन्नौ में फलों और दूध घृतादिकों की गणना है। फलों और घृत-दुग्धादिकों को विधिवत् ग्रहण करने से हिंसा बिलकुल ही नहीं होती। पृथिवी को उर्वरा बनाकर और बीज को कलम आदि से सुसंस्कृत करके सिचाई और निराई गोडाई के द्वारा जो फल उत्पन्न किये जाते हैं, वे कुदरती वन्य फलों से बड़े होते हैं और उनमें बीज कम होते हैं। इसलिए स्वभाव से पके हुए और आप ही चाप टपके हुए फलों को बीज निकाल कर खाने से कुछ भी हिंसा नहीं होती। क्योंकि बीज निकालकर खाने से वृक्षों को उत्पन्न करनेवाले बीज का नाश नहीं होता। इसी तरह पारस्कर की शिक्षा के अनुसार वृषोत्सर्ग के द्वारा उत्तम क्षेत्र के सांड को स्वतन्त्रतापूर्वक चराकर और उससे अमुक क्षेत्र की गौ से सन्तति उत्पन्न कराके और इस सन्तति की भी सन्तान को उसी क्रम से गोवर्धन (Cow- breeding) के सिद्धान्तानुसार तैयार करने से पाँचवीं पीढ़ी में दूध की मात्रा चौगुनी हो जाती है और एक एक गौ डेढ़ डेढ़ मन दूध देनेवाली हो जाती है। परन्तु गौवों को जङ्गलों में छोड़ देने से और मनमानी स्वाभाविक नसल उत्सन्न होने से कभी भी इतना अधिक दूध उत्पन्न नहीं होता। इसलिए बहुत सी गायों को इस प्रकार अमित दूध देनेवाली बनाकर, उनसे थोड़ा थोड़ा दूध ले लेने से हिंसा नहीं होती। क्योंकि जितना दूध बच्चों के लिए आवश्यक होता है, उतना तो उनको मिल ही जाता है।

मनुष्य तो फलों की भाँति अपनी कारीगरी से गौवों की सेवा करके दूध को स्वाभाविक परिणाम से अधिक बढ़ा लेता है, इसलिए जितना अधिक बढ़ा लेता है, उतना लेने में किसी की हानि नहीं होती अतएव हिंसा भी नहीं होती। अब रहे राजस और तामस अन्न। तामसान्नों के लिए मनुस्मृति में स्पष्ट ही लिखा है कि *यक्षरक्षः पिशाचान्न मद्य मांसं सुरत्सवम्* अर्थात् मांस और मद्य राक्षसों और पिशाचों के अन्न हैं, आर्यों के नहीं। इसीलिए मांस मद्य आदि हिंसारूप तामस आहारों को आर्य-सभ्यता में स्थान नहीं दिया गया । किन्तु राजसान्न अनाज और शाकान्त-जिनके खाने से कुछ हिंसा की संभावना है, उनको आपत्काल के समय ही सेवन करने की आज्ञा है। इसीलिए यज्ञशेषान्न खाने का विधान किया गया है। कुछ लोग कहते हैं कि आर्यों की सभ्यता में अन्न और कृषि के लिए भी स्थान है, क्योंकि अनेकों स्थानों में अन्न और कृषि की प्रशंसा की गई है। हम कहते हैं कि ठीक है आर्यों को सभ्यता में अन्न और कृषि का वर्णन आता है, पर उस वर्णन का अभिप्राय दूसरा है।

क्रमशः

प्रस्तुति -देवेंद्र सिंह आर्य
चैयरमेन- ‘उगता भारत’

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