दिव्य- रथ है तन तेरा, धैर्य-शौर्य चक्र।

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यह शरीर माटी का पुतला नही अपितु दिव्य-लोक का साधन है। इसमें छिपी प्रभु- प्रदत्त शक्तियों को पहचानो: –

दिव्य- रथ है तन तेरा,
धैर्य-शौर्य चक्र।
आत्मज्ञान प्रदीप्त कर,
काहे चले तू वक्र॥2732॥

भावार्थ : – प्रायः देखा गया है, कि इस संसार में कतिपय लोग इस मानव शरीर को ‘माटी का पुतला’ कहते है। ऐसा सुनकर उन लोगों की अल्पज्ञता पर हँसी भी आत तरस भी आता है । अरे भोले भाइयो ! जिसे तुम माटी का पुतला कहते हो, उसे वेद ने ‘दिव्य-लोक का साधन’ कहा है। आवश्यकता है, तो इस बात की है कि हम मानव- शरीर का महत्त्व जाने,यह परम पिता परमात्मा की अनुपम और सर्वोत्तम कृति है। मन, बुद्धि चित्त, अहंकार जिन्हें अन्तः करण चतुश्ट्य भी कहते हैं। बेशक ये अमूर्त और अदृश्य हैं किन्तु इनकी शक्तियाँ अपरिमित हैं। सर्व प्रथम मन को हो लीजिए। मन यदि अभीष्ट लक्ष्म से जुड़ जाय अथवा परम पिता परमात्मा से जुड, जाये तो यह मनुष्य को अप वर्ग का भागी बना सकता है और यदि यह दुष्कर्मों में आसक्त हो जाय तो नर्क के गर्क में गिरा सकता है। जन्म-जन्मान्तरों को बिगाड़ सकता है।

बुद्धि अमूर्त है किन्तु धर्म और अधर्म का अथवा सही और गलत का निर्णय बुध्दि ही करती है। वैश्विक सभ्यता और संस्कृति का विकास और विनाश बुध्दि ही तो करती है।
संकल्प और विकल्प मन में उठते है जबकि स्मृति और संस्कार चित्त में रहते हैं। यहाँ तक कि परमा पिता परमात्मा का साक्षात्कार आत्मा को चित्त में होता है। धर्म परमात्मा का स्वरूप है जिसकी अनुभूति चित्त में ही होती है।
अहंकार जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करता है, वह हमारे स्वाभिमान की रक्षा करता है, जैसे सेनापति अपने सैनिकों का मनोबल कभी गिरने नहीं देता है और राष्ट्र रक्षा में सदैव तत्पर रहता है, सजग रहता है। ध्यान रहे, उपरोक्त चारों तत्वों के समुच्चय में मनुष्य की मूल प्रवृत्ति निहित जो स्वभाव का निर्माण करती है। यह शरीर दिव्य-लोक का साधन है, भवसागर से पार उतरने का साधन है,प्रभु मिलन का साधन है,जैसे नदिया को पार करने का नाव है। यह शररी दिव्य-रथ है, जिसमें ‘शरीर का राजा आत्मा बैठा हुआ है। धैर्य और शौर्य इस रथ के पहिये हैं। जीवन में कहाँ कब धीरता,गंम्भीरता और वीरता, साहस पराक्रम इत्यादि का सम्यका अनुपात कितना रखना है कब विवेक का ब्रेक लगाना ? यह तभी सम्भव है, जब मनुष्य आत्मजागरण करे, आत्मचिंतन करे, आत्मज्ञान के दिव्य प्रकाश में मानव जीवन को गतिमान करे । सारांश यह है कि हे मनुष्य! इस दिव्य-रथ के गति, दिशा और दशा को सही रख, भटक मत। तेरा आत्मकल्याण इसी निहित है।
क्रमशः

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