gurunanak

(गुरु नानक प्रकाशोत्सव पर विशेष रूप से प्रकाशित)

#डॉविवेकआर्य

गुरु नानक ने बाबर नामक राक्षस को भारत की प्रजा पर अकथनीय अत्याचार करते अपनी आँखों से देखा था। गुरु नानक ने इस अत्याचार से व्यथित होकर अपने मन की इच्छाओं को अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया था। यह रचनायें उस काल में देश तथा समाज की तत्कालीन समस्याओं के प्रति उनकी जागररुकता को प्रकट करती है। ‘उस समय में देश के शासक भोग- लिप्सा तथा मातृभूमि के प्रति अकर्मण्यता का भाव से पीड़ित थे। विदेशियों और विधर्मियों का प्रतिरोध करने के बजाय वे अपनी स्वार्थ पूर्ति और रंगरेलियों में लगे रहते थे। यह देखकर गुरू नानक ने उनको बड़े रोषपूर्वक फटकारा।

गुरु नानक लिखते है-

राजा सिंह मुकद्दम कुत्ते- जाइ जगाई बैठे सुत्ते ।।
चाकर नहंदा पाईन्ह घाउ- रत पितु कुतिहां चटि जाहु।
जिथै जींआ होसी सार- नकी बड़ी लाइन बार॥
अर्थात्- ‘‘वर्तमान समय के राजा शेर- चीतों की तरह हिंसक हैं और उनके अधिकारी कुत्तों की तरह लालची हैं और निर्दोष जनता को अकारण ही पीड़ित करते रहते हैं। राजकर्मचारी अपने नाखूनों से जनता को घायल करते रहते हैं और उसका खून कुत्तों की तरह ही चाट जाते हैं। परलोक में जब इनकी जाँच की जायेगी तो इनकी नाक काटी जायेगी।’’

बाबर के सैनिकों ने चारों तरफ तबाही पैदा कर दी और लोगों के धन, मान तथा इज्जत को मिट्टी में मिला दिया। उस भयंकर काल में भारतीय नारियों की दुर्दशा का चित्रण करते हुए उन्होंने लिखा है-

जिन सिरि सोहनि पाटियाँ माँगी पाई संधूर ।।
से सिर काती मुनीअन्हि गल बिच आवे धूड़ि। ।।
महला अंदरि होदीआ हुणि वहणिन मिलन्ह हटूरि॥१
जदहु सीआ बिआहीआ लाड़े सोहनि पासि।
हीडोली चढ़ि आईआ दंद खंड दीदे रासि।
उपपहु पाणी बीरिऐ झले झपकनि पासि।।२
इक लखु लहन्हि बहिठीआ लखु लहन्हि खड़ी आ।
गरी छुहारे खाँदीआ माणन्हि से जडीआ ।।
तिन्ह गलि सिलका पाईया तुरीन्ह मोत सरी आ॥३
धनु जोवन दुइ वैरी होए जिन्ही रखे रंगु लाइ ।।
दुता नो फुरमाइया लै चले पति गवाई। ।।
अर्थात्- ‘‘जिन स्त्रियों के सिर में सुंदर पट्टियाँ शोभित होती थीं, जिनकी माँग में सिंदूर भरा हुआ था, अत्याचारियों ने उनके केश काट डाले और उन्हें भूमि पर इस तरह घसीटा कि गले तक धूल भर गई। जो महलों में निवास करती थीं, उनको अब बाहर बैठने को भी जगह नहीं मिलती। विवाहित स्त्रियाँ जो अपने पतियों के पास सुशोभित थीं, जो पालकियों में बैठकर आई थीं, जिन पर जल न्यौछावर करते थे, जड़ाबदार पंखों से हवा करते थे, जिन पर लाखों रूपये लुटाये जाते थे, जो मेवा मिठाई खाती थीं, सेजों पर सुख भोगती थीं, अब अत्याचारी उनको गले में रस्सी डालकर खींच रहे हैं और उनके गले की मोतियों की मालाएँ टूट गई हैं अभी तक धन और यौवन ने उन्हें अपने रंग में रंग रखा था, अब वह दोनों उनके बैरी हो गये। सिपाहियों को आज्ञा मिली और वे उनकी इज्जत को लूटकर चले गए।’’ अपने देश के संपन्न वर्ग की उस कठिन समय में कैसी दुर्गति हुई, उसकी एक झलक इस कविता में मिलती है।

जब मनुष्य इस प्रकार विवश हो जाता है और अत्याचार का कुछ प्रतिकार नहीं कर सकता तो वह भगवान् को उलाहना देने लगता है कि तुम कैसे न्यायकारी और करुणासिंधु हो जो संसार में ऐसा अंधेरखाता मचवा रहे हो। इस भाव से प्रेरित होकर नानक जी ने आदिग्रंथ में लिखा-

खुरासान खसमान कीआ हिंदुस्तानु डराइआ।
आपै दोसु न देई करता जमु का मुगल चढ़ाइआ।
एती मार पई कर लणे तैं की दरदु न आइआ।
करता तू समना का सोई।
जो सकता सकते कउ मारे ता मनि रोसु न होई।
सकता सीहू मारे पै वर्ग खसमै सा पुरसाई। ।।

      अर्थात्- ‘‘हे भगवान् ! बाबर ने खुरासान को बर्बाद किया ,, पर तुमने उसकी रक्षा न की और अब हिंदुस्तान को भी उसके आक्रमण से भयभीत कर दिया है। तुम स्वयं ही ऐसी घटनाएँ कराते हो, परंतु तुमको कोई दोष न दे इसलिए तुमने मुगलों को यमदूत बनाकर यहाँ भेज दिया। सर्वत्र इतनी अधिक मार- काट हो रही है कि लोग त्राहि- त्राहि पुकार रहे हैं। पर तुम्हारे मन में इन निरीह लोगों के प्रति तनिक भी दर्द पैदा नहीं होता। हे भगवान् ! तुम तो सभी प्राणियों के समान रूप से पालनकर्ता कहलाते हो, फिर यदि एक शक्तिशाली दूसरे शक्तिशाली सिंह, निरपराध पशुओं के झुंड पर आक्रमण करे तो उनके स्वामी को कुछ तो पुरूषार्थ दिखाना चाहिए।’’ 

इस तरह परमात्मा को जोरदार उलाहना देकर नानक जी ने इस देश के प्रमुख शासकों तथा बड़े लोगों को भी फटकारा है कि तुमने अपने कर्तव्य को बिसरा दिया और भोग- विलास में डूब गए, उसी का नतीजा इस तरह भोग रहे हो-

रतन बिगाड़ बिगोए कुतीं मुइआ सार न काई।
आगो देजे चेतीए तो काइतु मिलै सजाइ।
शाहां सुरति गबाईआ रगि तमासै चाइ।
बाबर वाणी फिरि गई कुइरा न रोटी खाई।
इकता बखत खुआई अहि इकंहा पूजा खाई।
चउके विणु हिंदवाणीआ किउ टिके कढहि नाइ ।।
राम न कबहू चेतिओ हुणि कहणि न मिलै खदाई।

       अर्थात्- ‘‘इन नीच कुत्तों (विलासी शासकों) ने रतन के समान इस देश को बिगाड़कर रख दिया। इनके मरने के बाद कोई इनकी बात भी नहीं पूछेगा। अगर ये पहले से ही सावधान हो जाते तो हमको ऐसी सजा क्यों मिलती? पर यहाँ के शासक तो सदा रंग तमाशों में ही डूबे रहे, उन्हें अपने कर्तव्य का ध्यान ही न था। नतीजा यह हुआ कि इस समय चारों ओर बाबर की दुहाई फिर गई है, किसी को रोटी तक खाने को नहीं मिलती। मुसलमानों (पठानों) की नमाज का समय जाता रहा और हिंदुओं की पूजा छूट गई। अब चौके के बिना हिंदू स्त्रियाँ किस प्रकार अपनी पवित्रता की रक्षा करेंगी? जिन्हें कभी राम शब्द भी याद नही आया था, अब वे आक्रमणकारियों के भय से खुदा को याद करना चाहते हैं, परंतु जालिम लोग उनको खुदा भी नहीं कहने देते।’’ 

खेद का विषय है कि इस प्रकार की जिल्लत उठाकर और अमानुषी दंड सहन करके भी हिंदुओं की आँखें नहीं खुलीं। उसके पश्चात् भी मानसिंह, जयसिंह, यशवंतसिंह आदि प्रमुख राजपूत नरेश मुगल बादशाहों के अनुचर बनकर अपने ही भाइयों को पराधीन बनाने का पाप- कर्म करते रहे। उसके बाद जब अंग्रेज आए तब भी हिंदुओं ने ही उनके सहायक बनकर शासन- कार्य में हर तरह से सहयोग दिया और आज के दिन भी इस जाति की पारस्परिक फूट, मत- विरोध, कर्तव्यहीनता स्पष्ट दिखाई पड़ रही है।

यह अकर्मयता, विलासिता, चिरनिंद्रा, जातिवाद का रोग आज भी वैसा का वैसा अपितु पहले से भी भयंकर बना हुआ है। पाकिस्तान, बांग्लादेश में हिंदुओं की हालात का तो विचार कब होता। अपने ही देश में कश्मीर,असम, बंगाल, केरल, कैराना उत्तर प्रदेश में हिन्दू चंद वर्षों में अल्पसंख्यक हो गए मगर तब इनकी आंख नहीं खुली। जागो अब तो जागो। नानक के सन्देश को समझो। और अपनी जाति, अपने वेद, अपने राम और कृष्ण की रक्षा करो।

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