ओ३म् “ऋषिभक्त हुतात्मा ठाकुर रोशन सिंह का देश की आजादी में योगदान”

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देश की आजादी के लिये अपने जीवन का बलिदान देने वाले ठाकुर रोशन सिंह जी का जन्म बसन्त पंचमी सन् 1891 को ग्राम नवादा जिला शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश के एक राजपूत जागीरदार परिवार में हुआ था। सन् 1901 में उन्होंने ग्राम में ही कक्षा चार पास कर ली थी। रोशन सिंह जी का 13 वर्ष की आयु में प्रथम विवाह हुआ था। 21 वर्ष की आयु में इनका दूसरा विवाह हुआ। आप आर्यसमाज के सम्पर्क में आकर ऋषि दयानन्द एवं वैदिक धर्म के सच्चे अनुयायी बने। आप मृतक श्राद्ध, बाल-विवाह तथा बहु-विवाह ही नहीं अपितु धूम्रपान के भी घोर विरोधी हो गये थे। आर्यसमाज के जो विद्वान व प्रचारक शाहजहांपुर के ग्राम नवादा में प्रचार हेतु जाते थे, उनके निवास व भोजन की व्यवस्था ठाकुर रोशन सिंह जी के परिवार में ही होती थी। आपके प्रयत्नों से ग्राम में श्रावणी पर्व के अवसर पर सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार होने लगा था।

एक दिन आर्यसमाज के विख्यात संन्यासी एवं हुतात्मा पं. रामप्रसाद बिस्मिल जी के प्रेरक गुरु स्वामी सोमदेव शास्त्री जी का नवादा ग्राम, शाहजहांपुर के आर्यसमाज में राष्ट्रभक्ति पर उपदेश हुआ। इस व्याख्यान में स्वामी सोमदेव जी ने अमृतसर के जलियांवालाबाग के सामूहिक हत्या काण्ड (13 अप्रैल, 1919) का उल्लेख किया था। उन्होंने बताया था कि इस सामूहिक हत्याकाण्ड में शान्तिपूर्ण सार्वजनिक सभा कर रहे निहत्थे लोगों पर अंग्रेजों द्वारा क्रूरतापूर्वक गोलियां चलाई गईं थी जिससे सैकड़ों स्त्री पुरुषों व बच्चे वीरगति को प्राप्त हुए थे। स्वामी सोमदेव जी का व्याख्यान अत्यन्त प्रभावशाली था। इस उपदेश को सुनकर श्रोताओं के दिल दहल गये थे। इसी उपदेश की प्रेरणा से ठाकुर रोशन सिंह जी ने भरी सभा में अंग्रेजी सत्ता से टक्कर लेने का संकल्प लिया था।

सन् 1921 में बरेली गोलीकाण्ड में ठाकुर रोशन सिंह जी को उत्तरदायी मानकर बन्दी बनाया गया था और उन्हें दो वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड दिया गया था। सन् 1923 में वह जेल से मुक्त हुए। इसके बाद आप आर्यसमाज, शाहजहांपुर में आर्यकुमार सभा के संस्थापक एवं क्रान्तिकारी पं. रामप्रसाद बिस्मिल जी व अन्य क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आये।

दिनांक 9 अगस्त, 1925 को काकोरी के निकट क्रान्तिकारियों द्वारा रेलगाड़ी से सरकारी खजाने को लूटने में आप भी सहयोगी बने थे। आपको इस घटना के लिये बन्दी बनाया गया था। कारागार में आप नियमित रूप से प्राणायाम, व्यायाम, सन्ध्या तथा हवन करते थे। सत्यार्थप्रकाश का नियमित स्वाध्याय भी आपकी दिनचर्या में सम्मिलित था। आपने कारागार में रहते हुए पं. रामप्रसाद बिस्मिल जी से बंगला भाषा भी सीखी थी।

दिनांक 19 दिसम्बर, सन् 1927 को इलाहाबाद की मलाका जेल में ठाकुर रोशन सिंह जी को फांसी पर चढ़ाया गया था। फांसी से एक सप्ताह पूर्व अपने एक मित्र को लिखे पत्र में आपने अन्तिम पंक्तियों में लिखा था ‘हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो मनुष्य धर्मयुद्धों में प्राण देता है उसकी वही गति होती है जो वनों में रहकर तपस्या करने वालों की होती है। उन्हीं के शब्द हैं ‘जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है ‘रोशन’, मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं।’

हमने इस लेख की सामग्री आर्यसमाज के विद्वान संन्यासी स्वामी गुरुकुलानन्द सरस्वती कच्चाहारी जी की पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी साम्राज्य और स्वतन्त्रता संग्राम’ पुस्तक से ली है। हम इस सामग्री को पढ़कर लाभान्वित हुए हैं। हमारे मन में विचार आया कि हम अपने सभी मित्रों से यह सामग्री साझा करें। आशा है पाठकों को इस जानकारी से ज्ञानवर्धन होगा। हम स्वामी गुरुकुलानन्द सरस्वती कच्चाहारी जी का धन्यवाद करते हैं।

हमारे देहरादून में एक मित्र थे प्रा. अनूप सिंह जी। आप का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावशली था। वह आर्यसमाज के विद्वान एवं प्रभावशाली वक्ता थे। देश के लिये बलिदान देने वाले युवकों पर वह प्रभावशाली भाषण दिया करते थे। हम उनके व्यक्तित्व एवं वाणी के प्रभाव से भी आर्यसमाज में सक्रिय हुए थे। 21 जून, 2001 को वह दिल्ली के जीबी पन्त अस्पताल में दिवंगत हुए। वह अपने प्रवचनों में क्रान्तिकारियों के जीवनों के उदाहरण दिया करते थे। वह कहते थे कि देश को आजादी अहिंसा से नहीं अपितु खून देकर मिली है। हमें उनकी यह बात सर्वथा सत्य लगती है। देश पर हमारे युवक क्रान्तिकारियों का सर्वाधिक ऋण है। देश को आजादी दिलाने वाले देशभक्तों में वीर विनायक सावरकर जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एवं देश के हुतात्मा के अमर पद को प्राप्त हुए क्रान्तिकारियों सहित आजादी के लिए कालापानी एवं अन्य कारावासों में सजा काटने वाले देशभक्तों को स्मरण रखना व उनसे प्रेरणा लेना तथा देश के हितों के विरुद्ध कोई अनुचित कार्य न करना सभी देशवासियों का कर्तव्य है। हमें लगता है कि हमने अपने देशभक्त हुतात्माओं एवं क्रान्तिकारियों व उनके बलिदानों को भुला दिया है। हम धीरे-धीरे विदेशी जीवन शैली में जीवन जीनें के आदि होते जा रहे हैं और वैदिक धर्म एवं संस्कृति की अच्छी बातों को छोड़कर वेदेतर जीवन मूल्यों को अपना रहे हैं। हमारे इस व्यवहार से हमारी धर्म एवं संस्कृति के लिये बड़ा खतरा है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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