शहीदे आजम भगतसिंह को फांसी दिए जाने पर अहिंसा केमहान पुजारी गांधी ने कहा था, ‘‘हमें ब्रिटेन के विनाश के बदलेअपनी आजादी नहीं चाहिए ।’’ और आगेकहा, ‘‘भगतसिंह की पूजा से देश को बहुत हानि हुई औरहो रही है । वहीं इसका परिणामगुंडागर्दी का पतन है । फांसी शीघ्र देदी जाए ताकि 30 मार्च से […]
Category: इतिहास के पन्नों से
गणेश चतुर्थी का महत्व
( 29 आगस्त2014 गणेश उत्सव ) हिन्दुओं का एक उत्सव है। वैसेतो यह पूरे भारत में मनाया जाता है, किन्तु महाराष्ट्रका गणेशोत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र में भी पुणेका गणेशोत्सव जगत्प्रसिद्ध है। यह उत्सव, हिन्दू पंचांग केअनुसार भाद्रपद मास की चतुर्थी से चतुर्दशी (चार तारीख सेचौदह तारीख तक) तक दस दिनों तक चलता […]
गोडसे ने गांधी को क्यों मारा-1
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पिछले पृष्ठों पर हमने शाहिद रहीम साहब का उद्घरण प्रस्तुत किया था, जिसमें उन्होंने भारत के आर्यावत्र्तीय स्वरूप का उल्लेख किया है। अपने अतीत के गौरवमयी पृष्ठों के आख्यान के लिए उनका वह उद्घरण बड़ा ही अर्थपूर्ण और तर्कपूर्ण है। उनके इस तथ्य की पुष्टिके लिए मनुस्मृति (1.2.22.29) का यह श्लोक भी ध्यातव्य है- आ […]
दिल्ली ने भारत के उत्थान-पतन के कई पृष्ठों को खुलते और बंद होते देखा है। कई राजवंशों ने यहां लंबे समय तक शासन किया, पर समय वह भी आया कि जब उनका इतिहास सिमट गया और उनके सिमटते इतिहास केे काल में ही किसी दूसरे राजवंश ने दिल्ली की धरती पर आकर अपने वैभवपूर्ण उत्थान […]
ऐसे थे नेताजी
एक बार नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हिटलर से मिलने गये।हिटलर किसी से खुद नही मिलता था बल्कि अपने डुप्लिकेट्स को भेजता था। पहला डुप्लिकेट आया और हाथ बढाकर बोला-हैलो आई एम हिटलर!नेता जी:मै सुभाष हुँ,भारत से।हिटलर को भेजो! इसी प्रकार दूसरा आया पर नेताजी ने पहचान लिया।तब हिटलर खुद आया।तब नेता जी ने हाथ बढाया,बोले […]
क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त जी
(१८नवंबर १९०८ – १९ जुलाई १९६५)भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे,क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त को देश ने सबसे पहले 8 अप्रैल,1929 को जाना, जब वे भगत सिंह के साथ केंद्रीय विधान सभा में बम विस्फोट के बाद गिरफ्तार किए गए। उन्होनें आगरा में स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने में उल्लेखनीय कार्य […]
ऐसे होते हैं देश-भक्त
एक बार भगतसिंह जी ने बातचीत करते हुए चन्द्रशेखर आजाद जी से कहा, ‘पंडित जी, हम क्रान्तिकारियों के जीवन-मरण का कोई ठिकाना नहीं, अत: आप अपने घर का पता दे दें ताकि यदि आपको कुछ हो जाए तो आपके परिवार की कुछ सहायता की जा सके।’ आजाद जी सकते में आ गए और कहने लगे, […]
बात सन 986-987 की है। भारत पर उस समय आक्रमण करने की एक श्रंखला को महमूद गजनवी अभी आरंभ कर नही पाया था। तब प्रतीहार वंश भारत में पतनोन्मुख हो चला था, यद्यपि यह वंश भारत के लिए बहुत ही गौरव प्रदान कराने वाला रहा था। ऐसा गौरव जिसे देखकर इतिहासकारों की मान्यता बनी कि […]
जब विदेशियों ने भारत के इतिहास लेखन के लिए लेखनी उठाई तो उन्होंने भारतीय समाज की तत्कालीन कई दुर्बलताओं को दुर्बलता के रूप में स्थापित ना करके उन्हें भारतीय संस्कृति का अविभाज्य अंग मानकर स्थापित किया। जैसे भारत में मूर्तिपूजा ने भारत के लोगों को भाग्यवादी बनाने में सहयोग दिया, यद्यपि मूलरूप में भारत भाग्यवादी […]