विशेष – मनुष्य को जीवनभर कौन नचाता है ? काम नचाता मनुज को, मारग पकड़े प्रेय। कामना से बढ़ै कामना, मारग भूलै श्रेय॥2629॥ तत्त्वार्थ:- काम अर्थात् इच्छा, स्पृहा ये आकाश की तरह अनन्त है जो जीवनभर पूर्ण नहीं होती हैं। कैसी विडम्बना हैइच्छाओं से भी इच्छाएँ बढ़ती चली जाती हैं । इनकी पूर्ति के लिए […]
काम नचाता मनुज को, मारग पकड़े प्रेय।