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बिखरे मोती

कार्यक्षेत्र के शिखर पर , जब पहुँचे इन्सान।

जब इन्सान अपनी कला की बुलन्दी पर होता है: –

कार्यक्षेत्र के शिखर पर ,
जब पहुँचे इन्सान।
दुनियां चक्कर काटती,
बने खास पहचान॥2607॥

पक्षी मंडराने लगें,
ज्यो फल पकता जाय।
गुणी-ज्ञानी इन्सान की,
दुनिया कीर्ति गाये॥2608॥

विदाई के संदर्भ में विशेष शेर :-

ऐ सितारो !
तुम्हारे मुनव्वर से ,
ये सभा रोशन हो गई।
तुम फिर भी आना,
तुम पर मेरी रूह,
फिदा हो गई॥
ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर,
कभी फिर भी मिलेंगे।
अब तो तहेदिल से,
तुम्हें अलविदा कहेंगे॥2609॥
“ओ३म् शान्ति”

विशेष :-प्रभु से क्यामांगे ? : –

पालक प्रेरक रक्षक तू ही,
सबका सृजनहारा।
हृदय में बहती रहे,
प्रभु-प्रेम की धार॥2610॥

विशेष:-प्रभु-भक्ति में मन कैसे कैसे लगे ? इस नियम को याद रखिये :-

महिमा से प्रीति बढ़े,
प्रीति से आशक्ति ।
आशक्ति हो ईश में,
सहज बढ़े प्रभु-भक्ति॥2611॥

भावार्थ :- यक्ष प्रश्न यह है , कि प्रभु की भक्ति में मन कैसे लगेंगे? इसके लिए नितान्त आवश्यक है कि पहले उस परम पि‌ता परमात्मा की महिमा को जानो, अर्थात्- उस के गुणों को जानो उसके स्वरूप को जानो, यदि उसकी अनन्त के कृपाओं को पहचानो स्वयं को पह‌चानो। यदि उसकी महिमा पर आप गम्भीर चिन्तन करेंगे, तो आपको अहसास होगा कि वह कितना उदार है ,कृपालु है जिसने हमें मानव जन्म दे दिया और जन्म लेने से पहले हमारे लिए अन्न, औषधि , सारे पंचभूत तथा सभी प्रकार के भोगों का प्रबन्ध कर दिया। ऐसा भाव मन में आते ही हृदय में प्रीति का अजस्र फूट पड़े‌गा यही प्रीति तुम्हारी नति को अर्थात रुझान को बदलेगी मन के प्रवाह को संसार से हटाकर प्रभु – प्रेम में प्रवाहित करेगी। अब तक जो आपकी आशक्ति संसार के भोगों,वस्तु , व्यक्ति पदार्थ परिस्थिति में थी वह अनायास
प्रभु भक्ति में परिणित हो जायेगी। अतः इस सूत्र को सर्वदा याद रखो , पहले प्रभु की महिमा जानो, महिमा से प्रीति, प्रीति से आशक्ति , आशक्ति से प्रभु-भक्ति प्रगाढ़ होती है । यही सूत्र आपके मन को प्रभु-भक्ति में लगायेगा।

सत्ता, सम्पत्ति और शौहरत कब घातक होती है?

धन, यश – सत्ता का नशा ,
बुद्धि करे खराब ।
एक ज़रा सी चूक से,
जावै जन की आब॥2612॥

नोट :- नशा से अभिप्राय यहाँ अहंकार से है।

संतान कैसी हो ?

मात-पिता की पूँजी है ,
गुणी – ज्ञानी संतान ।
शीलवान प्रज्ञावान हो,
जग देता सम्मान॥2613॥

ज़िन्दगी तपस्वी की तरह जीओ :-

एक तपस्वी की तरह ,
जीवन जी निष्काम ।
निर्विचार निर्द्विन्द्व हो,
मिले प्रभु का धाम॥2614॥
क्रमशः

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