देश का वास्तविक गद्दार कौन ? – गांधी नेहरू या सावरकर, भाग 3

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गांधीजी आजीवन अहिंसा की बात करते रहे। कांग्रेस ने भी इसे अपनाने की घोषणाएं की और स्वतंत्रता के पश्चात यह भी प्रचारित किया कि देश को आजादी केवल गांधीजी की अहिंसा के कारण ही मिली है। इस पर 1961 ई. में वीर सावरकर जी ने एक लेख लिखा-‘क्या स्वराज्य का श्रेय केवल कांग्रेस को ही है’? उसमें वह लिखते हैं :- ‘‘अपनी पाठ्य पुस्तकों द्वारा सरकार विद्यार्थियों को सिखाती है कि गांधीजी की कांग्रेस ने भारत का शासन अंग्रेजों के हाथों से नि:शस्त्र क्रांति द्वारा लिया। किंतु असल में हुआ यह कि हमारी क्रांतिकारियों की प्रेरणा से हमारी शक्तिशाली सेना ने जब तलवार म्यान से निकालकर भारत की स्वतंत्रता के उद्देश्य से अंग्रेजों पर वार करना आरंभ किया और साथ ही अपने दूसरे साथियों को भी इसके लिए उकसाने लगे तो अंग्रेज घबरा गये और उन्होंने स्वतंत्रता दान करने की बात आरंभ कर दी। यह ऐतिहासिक तथ्य स्वयं ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने भरी पार्लियामेंट में स्वीकार किया है।

इधर 1954 ई. में अगस्त माह में एक प्रसिद्घ जापानी ग्रंथ कार श्री जे.जी. आहसावा ने ‘दि टू ग्रेट इंडियंस इन जापान’ नामक पुस्तक प्रकाशित की है। जिसमें उन्होंने रास बिहारी बोस का चरित्र चित्रण करते हुए उनके जापान में दिये गये अभूतपूर्व क्रांतिकारी कार्यों का वर्णन किया है।

दूसरे महायुद्घ के अवसर पर जब जापानी सेना ने सिंगापुर पर चढ़ाई की और अंग्रेज एवं अंग्रेजों की भारतीय सेना से उनका युद्घ छिड़ गया तब सेनापति रास बिहारी बोस की आजाद हिंद सेना अंग्रेजी सेना से लड़ी थी। स्वतंत्रता के लिए लड़े पचास हजार सैनिकों में से करीब 25 हजार खेत रहे।

उक्त प्रसंग में उक्त पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि कैसे सिंगापुर में जापान के खिलाफ लडऩे वाली ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाही और अफसर रास बिहारी बोस के स्फूर्तिजन्य वक्तव्य के पश्चात आईएनए में हजारों की संख्या में सम्मिलित हो गये थे। हम दि इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया एक्ट पास करते समय तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर क्लीमेंट एटली ने जो कुछ कहा था उस पर गंभीरता से विचार करें।

जब ब्रिटिश संसद में यह बिल प्रस्तुत हुआ तब हिंदुस्तान पर अपने साम्राज्य को हटाने की बात से दुखी होकर साम्राज्यवादी सर विसेंट चर्चिल ने पूछा-‘‘क्या यह ऐक्ट पास कर लेने की अपेक्षा दूसरा कोई मार्ग नही जिसमें भारतवर्ष को स्वतंत्र न करके अपने अधीन ही रखा जा सके।’’ इसका उत्तर प्रधानमंत्री ने दो तीन वाक्यों में इस प्रकार दिया-‘‘भारतवर्ष को स्वतंत्रता देने का कारण है कि वहां की सेना अब अंग्रेजों के प्रति केवल रोटी के लिए वफादार नही रही और ब्रिटेन के पास अब उतनी शक्ति भी नही रही कि हिंदुस्तानी सेना को दबाये रखा जा सके।’’

न तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने ही और न ही किसी संसद सदस्य ने यह कहा कि अहिंसा के तत्वों से हमारा हृदय परिवर्तन हो गया है।

किसी भी व्यक्ति ने या संसद ने भारत स्वतंत्रता अधिनियम को पारित कराते समय साम्राज्यवाद एक अन्याय है और औपनिवेशिक व्यवस्था को विश्व से समाप्त किया ही जाना चाहिए, ऐसा कोई शब्द नही बोला। इसका अभिप्राय था कि उस दिन भी वे लोग साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक व्यवस्था के समर्थक थे पर किसी विवशता के कारण उन्हें भारत को स्वतंत्र करना पड़ रहा था। वह ना तो गांधीजी और ना ही किसी अहिंसात्मक गांधीवाद से तनिक भी विचलित थे और ना ही उसके कारण भारत को स्वतंत्र कराना चाहते थे। 1857 से लेकर 1947 तक के 90 वर्षों में वह भारत के क्रांतिकारी आंदोलन की लपटों को बुझाते-2 दुखी हो चुके थे।….और अब जब इन लपटों को और भी बलवती करने के लिए भारतीय सेना भी अपने देशवासियों के साथ आ खड़ी हुई तो उनके लिए देश को स्वतंत्र करना ही एकमात्र उपाय रह गया था।

सावरकर जी ने गांधीजी की अहिंसा पर करारा प्रहार करते हुए कहा था कि-‘‘सज्जनों के साथ सज्जनता से व्यवहार करना पुण्यकारक है। लेकिन जो अपने देश पर आक्रमण करने के लिए आता है उसको शस्त्र से कड़ा उत्तर देने में हिंदू संस्कृति पाप नही बताती, पुण्य बताती है। गांधीजी कहते हैं-हम किसी से द्वेष नही करेंगे तो हिंसा करने की आवश्यकता ही नही रहेगी।’’ इस प्रकार के विचार भीरूता व भ्रम के ही परिचायक हैं। तुम लोग द्वेष करना छोड़ दोगे लेकिन दूसरे द्वेष नही करेंगे, इसकी हामी कौन दे सकता है? द्वेष यह क्रिया केवल प्रतिक्रिया नही है। राष्ट्र की सुरक्षा व अखण्डता बनाये रखना हमारा कत्र्तव्य है। उस कत्र्तव्य की पूर्ति के लिए जो हिंसा अनिवार्य होगी वह भी पुण्यकारक ही मानी जाएगी। अत्यधिक अहिंसा के व्यवहार से हिंसा प्रबलतर बन जाएगी। अत्यधिक अहिंसातत्व का प्रचार करने वाले व्यक्ति को मैं या तो मूर्ख समझता हूं या दुष्ट। अत्यधिक अहिंसा के विचार केवल दुर्बल व कायरों के मुख से शोभा देते हैं। हमारे प्रेरणास्रोत प्रभु श्रीराम और श्रीकृष्ण हैं। वे हमसे कहते हैं कि शस्त्र लेकर दुष्टों का मूलनाश करो। आततायियों को बिना विचारे मार डालो, यह हमारे वेदों की आज्ञा है। यह हमारा धर्म है। हमारे पूर्वज सभी देवी देवता, अवतार राजा महाराज सशस्त्र थे बड़े-बड़े भयंकर शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित थे।’’

गांधीजी ब्रिटिश सत्ताधीशों की चापलूसी कर रहे थे और मुस्लिम लीगी देशद्रोहियों का तुष्टिकरण करते जा रहे थे। जबकि सावरकर उनकी इस नीति को कायरता बता रहे थे। वह आततायियों के विरूद्घ कठोरता प्रदर्शन के समर्थक थे।

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