सप्त ऋषि क्या होता है? सप्त ऋषि किसको कहते हैं?

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हमारे शरीर में सप्तर्षियों का स्थान कहाँ-कहाँ पर है?
आईये, इसका अध्ययन यजुर्वेद, अथर्ववेद सत्यार्थ प्रकाश वैदिक संपदा एवं संध्योपासन विधि आदि आर्ष साहित्य का संहत, समेकित एवं तुलनात्मक अध्ययन के अनुसार निम्न प्रकार करते हैं।

सप्त ऋषि प्रतिहिता:शरीरे सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादं‌ ।
सप्ताप: स्वपतो लोकमीयुस्तत्र
जागृतों अस्वपनजौ सत्रसदौ च देवौ।
यजुर्वेद 34 /55
पदार्थ-
जो पांचो विषयों अर्थात रूप,रस, गंध, शब्द, स्पर्श को प्राप्त करने वाले पांच ज्ञानेंद्रियों ,मन और बुद्धि यह सात ऋषि इस शरीर में प्रतीति के साथ स्थिर हुए हैं। वही सात जैसे प्रमाद अर्थात भूल न हो वैसे ठहरने के आधार शरीर की रक्षा करते हैं। वे ही सोते हुए जन के शरीर को व्याप्त होने वाला उक्त सात जीवात्मा को प्राप्त होते हैं। उस लोक प्राप्ति समय में जिनको स्वप्न कभी नहीं होता जीवात्माओं की रक्षा करने वाले और स्थिर उत्तम गुणों वाले प्राण और अपान जागते हैं।

भावार्थ –

इस शरीर में स्थिर व्यापक विषयों के जानने वाले अंतःकरण के सहित पांच ज्ञानेंद्रियां ही निरंतर शरीर की रक्षा करते और जब जीव सोता है तब उसी को आश्रय कर तमोगुण के बल से भीतर को स्थिर होते किंतु बाहृय विषय का बोध नहीं कराते और स्वप्न अवस्था में जीवात्मा की रक्षा में तत्पर तमोगुण से न दबे हुए प्राण और अपान जागते हैं। अन्यथा यदि प्राण -अपान भी सो जाएं तो मरण का ही संभव करना चाहिए।

विवेचन—-

इस दिव्य देह के अंदर सात ऋषि बैठे हैं। रूप ,रस ,गंध, शब्द, स्पर्श, बुद्धि और मन। सप्त प्राण रूप से इस देह में विराजमान है। उन दिव्य प्राण रूप ऋषियों का इस देह पर साम्राज्य रहना चाहिए ।इस देह रूपी यज्ञशाला में यज्ञ रचा जाता है ।उन्हीं से यह ब्रह्मपुरी, अयोध्या, देवनगरी ,स्वर्गपुरी, ज्योति से दीप्तिमान कहला सकेगी ।यदि उन सप्त ऋषियों के स्थान पर यहां सप्त असुर प्राण बैठ जावें तो इस देह का दिव्यत्व नष्ट हो जाएगा ।प्रत्येक देह में सात ऋषियों के द्वारा ही साधना करनी चाहिए ।असुरों द्वारा नहीं।उन सात ऋषियों को ही इस देह में प्रतिष्ठित करना चाहिए ।तभी इस जीवन का यज्ञ रूप प्रकट होगा और सृष्टि यज्ञ के साथ इसका ज्ञानमय समन्वय भी हो सकेगा।
हमारे में नेत्र रूप को देखकर आकर्षित नहीं हमारे स्तोत्र गंदी बातों को ना सुने अच्छी बातों को श्रवण करें ,हमारी दिव्या अच्छे-अच्छे रसों को ग्रहण तो करे, परंतु इन विषयों में आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अत: सिद्ध हुआ कि यह मानव देह एक साधना स्थली है। क्योंकि यह जीवन एक सत्यप्राप्ति की साधना के लिए है ।इसके द्वारा समुचित साधन से लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए ।इस उत्तम देह को प्राप्त कर मनुष्य इस देह में ही जब रम जाता है और ‘पश्येम शरद:शतं’ के अनुसार अपने सब प्रयत्नों को स्थूल देह तथा भौतिक साधनों तक ही सीमित कर देता है तो वह लक्ष्य को भूल जाता है ।
हमारे मन में अच्छे संकल्प उठें, हमारी बुद्धि अच्छा निर्णय ले।
इस पांच भौतिक स्थूल देह की दर्शन एवं जीवनीय शक्ति के आश्रय रूप जो सूक्ष्म एवं कारण शरीर है अथवा अन्नमय कोष के अतिरिक्त जो हमारे प्राणमय,मनोमय , विज्ञानमय एवं आनंदमय कोष हैं उनकी जो चैतन्य दिव्य दर्शन शक्ति ,श्रवण शक्ति तथा जीवनशक्तियां हैं उनको जागृत करने के लिए यह पांच भौतिक शरीर प्राप्त हुआ है।
परंतु फिर भी ब्रह्मांड का ज्ञान सीमित क्षेत्र में है और परमात्मा का ज्ञान असीमित है। जीव इसीलिए ज्ञानवान एवं आनंदमय स्थिति को प्राप्त करने के लिए प्रयास करता रहता है।
मानव देह की अनेक विशेषताएं हैं। देहधारी प्राणियों की जो विविध योनियों हैं उनमें मानव देह की रचना अहंकार के उद्भूत हो जाने के कारण तथा वर्णात्मक शब्द की ,अर्थ ज्ञान की सामर्थ्य होने के कारण ही इतनी अद्भुत और रहस्यपूर्ण हैं कि इसके द्वारा सृष्टि का स्थूल, सूक्ष्म एवं सूक्ष्मतर ज्ञान हो सकता है। यदि मानव देह में इस प्रकार की सामर्थ्य नहीं होती तो मनुष्य केवल पशु समान ही रहता।
इसीलिए वैदिक विद्वानों का कहना है कि मानव देह की स्थिति बहुत ही रहस्यपूर्ण है।और जो इस देह की रचना है वह बहुत अद्भुत है। क्योंकि इसके द्वारा बाह्य रूप से विराट सृष्टि का दर्शन किया जा सकता है। वहीं इसके अंदर भी सृष्टि के विराट एवं दिव्य रूप का दर्शन किया जा सकता है।
(अथर्ववेद 5/23 /1 तथा
यजुर्वेद अध्याय 34 मंत्र 4 एक साथ अध्ययन करने के बाद उपरोक्त स्थिति स्पष्ट हो जाती है,)
अथर्ववेद 10/2/31 में इस शरीर को आठ चक्र, नौ द्वार वाली देवताओं की अयोध्या -पुरी बताया है।
अथर्ववेद में ही अध्याय 10 / 2 /29 इस देह को ब्रह्मपुरी बताया है।
इस ब्रह्मांड में सर्वत्र यज्ञों का क्रम निरंतर चलता रहता है। इस विशाल भूमि में, इस अंतरिक्ष में और द्युलोक में सर्वत्र अणु से लेकर उत्तरोत्तर निर्मित पिंडों में यज्ञ चल रहे हैं। और वे सब एक विशाल यज्ञ को संपन्न कर रहे हैं।
जब विश्व की रचना में सर्वत्र यज्ञ ही यज्ञ है तो सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य का शरीर भी अश्वमेध यज्ञ है, अर्थात मनुष्य का शरीर ही यज्ञ के लिए है। इसीलिए ऋषियों को घोषित करना पड़ा ‘पुरुषो वाव यज्ञ: ‘, अर्थात पुरुष निश्चय से यज्ञ है, यज्ञ से परिपूर्ण है ।इसका अणु- अणु यज्ञ मय है ।इसकी क्रियाएं सब यज्ञमय है।
इसलिए मानव देह का वैशिष्ट्य बहुत ही अनुपम हैं। परमात्मा ने मानव पिंड की रचना अत्यंत अद्भुत ढंग से की है। उस बनाने वाले ने अत्यंत सुंदरता ,कुशलता से इसकी रचना करके हमें दिया। परंतु वह भी इसमें गुप्त रुप से ऐसा बैठ गया है वह स्वामी बन कर नहीं अपितु साक्षी रुप से हममें इसका स्वामी बन कर बैठा है ।बाहर देखो तो सारा अद्भुत संसार और भीतर देखो तो समस्त सारों का सार वह बैठा है। जब चाहो ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय के माध्यम से संसार में विचरण करो और जब चाहें भीतर उस ईश्वर से गले मिल लो ।उसकी गोद में एक नीड होकर बैठ जाओ ,और आनंद के अथाह समुद्र में निमग्न हो जाओ।
इससे यह प्रमाणित होता है कि मानव देह ही ऐसी अद्भुत रचना है जो संसार के भी संपर्क में है और प्रभु के भी संपर्क में है। इसे दोनों ओर का दर्शन होता है ।और दोनों ओर का आनंद लेता हुआ मानव भवसागर को पार कर लेता है। इस देह में परम पुरुष भी दृष्टव्य, श्रोत्रव्य, निदिध्यासितव्य रूप में सदा निवास कर रहा है। इस प्रकार यह पुरुष ही परमपुरुष के अत्यंत निकट है, जो दूसरी योनियों को प्राप्त नहीं है।
इसलिए मनुष्य को आत्मज्ञान की आवश्यकता है। अपने आप को अपने जीवन के रहस्यों को, अपने अंदर निहित शक्तियों को समझ लेने की आवश्यकता है। अपने इन सात ऋषियों को समझ लेने की आवश्यकता है। जो हमारे शरीर में विद्यमान है।
कैसे विद्यमान है?अब यह प्रश्न उठता है।
इस पर विचार करते हैं।
इस संबंध में जो महर्षि दयानंद कृत मंत्र हैं, अथेश्वरप्रार्थनापूर्वक मार्जनमंत्रा विधि में दिए हुए हैं। परंतु उनका अर्थ हम अपने शरीर के साथ कभी गंभीरता पूर्वक जोड़ नहीं पाते ।इनको‌ वास्तविक अर्थों में पकड़ना चाहिए। वैदिक साधन पद्धति पुस्तक भी पढ़ें। उसमें भी एक चार्ट दिया गया है, उसका भी अध्यन कर सकते हैं । उसमें भी यह तथ्य सुस्पष्ष्ट हो जाएगा।
साधना की दृष्टि से तीन प्रकार का विभाजन किया जा सकता है। पहला विभाजन तीन का ,दूसरा पांच का और तीसरा सात का।
पहला विभाजन—
भूलोक, अंतरिक्ष लोक,एवं द्युलोक।
हमारे शरीर में नाभि से लेकर कंठ तक अंतरिक्ष‌ लोक है।
कंठ से लेकर सिर तक द्युलोक है।
लेकिन हमारे पैर भूलोक हैं।

इनको स्पष्ट करने के लिए तीन महाव्यावहृत्तियां हैं। ओम भू,ओम भुव: ओम स्व:।
ओम शब्द में भी तीन वर्ण हैं
अ, उ ,म ।
गायत्री मंत्र के तीन चरण है।
इन सब का आपसी अंतर्संबंध है जिसको हम समझ नहीं पाते।
इसकी लिए शरीर को समझना चाहिए ।उसके आरोह अर्थात शरीर दिशा एवं अवरोह अर्थात आत्मा -परमात्मा के विवेचन के क्रम को जानना चाहिए।
भू कहते हैं स्थूल के लिए और हमारा शरीर भी स्थूल है ।पांचों भूतों में से केवल पृथ्वी ही स्थूल है। बाकी चार महाभूत स्थूल नहीं है।
प्राणायाम के पांच मंत्र में जो अंतिम मंत्र ‘ओम सत्यम’ है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है।
इसमें से पहले अक्षर ‘स ‘का तात्पर्य जीवात्मा से है, दूसरे अक्षर ‘त’से प्रकृति है, तीसरा अक्षर ‘यं ‘ परमात्मा अर्थात नियंता ब्रह्म है।
इससे आत्मा परमात्मा का विवेचन मनुष्य कर सकता है।
दूसरा विभाजन 5 का है।
पहले अन्नमय, दूसरा प्राण मय कोष, तीसरा मनों मयकोश , चौथा विज्ञान मय कोष ,पांचवा आनंद मय कोष।
विशेष प्रगति के लिए पृथक- पृथक पांचो कोसों पर विचार करना होता है।

तीसरा विभाजन 7 का।

ओम का ध्यान कैसे करें?ध्यान धारणा और समाधि के माध्यम से ओम को कैसे भजें?
इसके लिए महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में निम्न प्रकार उल्लेख किया है जो सारे प्राणायाम का, एवं योग का चार-पांच पंक्तियों में सारांश दिया है।
“जब उपासना करना चाहें ,तब एकांत शुद्ध देश में जाकर आसन लगा प्राणायाम कर बाहृय विषयों (रुप,रस, गंध, शब्द , स्पर्श पांचों ) से इंद्रियों को रोक, मन को रोक नाभिप्रदेश में वा हृदय ,कंठ, नेत्र, शिखा अथवा पीठ के मध्य हाड़ में किसी स्थान पर स्थिर कर अपने आत्मा और परमात्मा का विवेचन करके परमात्मा में मग्न हो जाने से संयमी होवे।”
इसमें यम , नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान,धारणा ,समाधि की स्थिति एक साथ बता दी है। ऐसी सूक्ष्म लेकिन स्पष्ट व्याख्या अंयत्र किसी ऋषि अथवा महर्षि के चिंतन में देखने को नहीं मिलेगी।
इंद्रियों को रोकने का मतलब प्रत्याहार है। नाभि प्रदेश के हृदय, कंठ, नेत्र, शिखा अथवा पीठ के मध्य हाड़ में किसी एक स्थान पर अपने को स्थिर कर( यहां तक ध्यान एवं धारणा है ) तथा अपने आत्मा और परमात्मा का विवेचन करना समाधि है।
इससे स्पष्ट हुआ कि हमारा हृदय, कंठ ,नेत्र और चोटी अथवा पीठ में किसी भी स्थान पर अपना ध्यान ईश्वर में लगाया जा सकता है और ये सभी नाभि प्रदेश अर्थात अंतरिक्ष से एवं द्युलोक से संबंधित है।

प्राणायाम की क्रिया ओम भू:, ओम भुव:, ओम स्व:,ओम मह: ओम जन : ओं तप: ओम सत्यम इन सात ईश्वर के गुणों को भी धारण करना और स्मरण करना चाहिए। अर्थात यह सात भी सप्त ऋषि हैं।
सात ही प्राणायाम की क्रिया है।

1ओम भू: पुनातु शिरसी ,2ओम भूव: पुनातु नेत्रयो,3ओम स्व:पुनातु कंठे, 4ओम मह:पुनातु हृदये ,5 ओम तप::पुनातु पादयो ,6 ओम जन:पुनातु नाभ्याम 7 ओम सत्यम पुनातु पुनः शिरसी ,
ओम खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र।
इस प्रकार हमारे शरीर में सप्त ऋषियों का समूह बैठा है जिसको समझ कर तथा प्रयोग में लाकर मनुष्य जीवन सफल बनाया जा सकता है।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट ,अध्यक्ष उगता भारत समाचार पत्र
चल -भाष 9811 8383 17

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