बरसहि सुमन सुअंजलि साजी, गहगहि गगन दुंदुभी बाजी

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हरिप्रसाद दुबे – विभूति फीचर्स
परम पुनीता सरयू नदी के तट पर अवस्थित अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि है। यह पुण्य भू्मि अयोध्या सप्तमोक्षदायिनी पुरियों में अग्रगण्य है। प्राचीन साहित्य में इस पावन नगरी के उल्लेख विपुल रूपों में हैं। आदिकवि वाल्मीकि कृत रामायण एवं संस्कृत कवि कालिदास के रघुवंश में इस पुरी की ख्याति वर्णित है। अर्थर्ववेद के दसम मंंडल में सर्वप्रथम उल्लेखित अयोध्या नवद्वारों एवं अष्टचक्रों से विभूषित कही गयी है।
अष्टïचक्रा नवद्वारा देवानां पुरयोद्धा।
तस्यां हिरण्यमय: कोश: स्वर्गों ज्योतिषावृता॥
वाल्मीकि रामायण में अयोध्या की महिमा का गान इस प्रकार किया गया है। समस्त लोकों में सुविख्यात थी वह नगरी-
कोसलो नाम मुदित: स्फीतो जनपदों महान।
निवष्ट: सरयू तीरे प्रभुत धन धान्यवान।
अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोक विश्रुता।
मनुना मानवेन्द्रेण या पूरी निर्मिता स्वयं॥
इस नगरी के पथ – पथ पर सुमन बिखरे पड़े रहते थे-
राजमार्गेण महता सुविभक्तेन शोभिता।
मुक्त पुष्पावकीर्णेन जलसिक्तेन नित्यश:।
वेदों में अयोध्या को देवताओं की पुरी माना गया है- अयोध्या पुरी मस्तकम। देववाणी के लौकिक एवं वैदिक साहित्य में इसकी महनीयता वर्णित है। रूद्धयामल तंत्र में त्रैलोक्य के पुनीत तीर्थ के रूप में इसका वर्णन आया है।
नृ लोके देव लोके च तीर्थ त्रैलोक्य विश्रुतम्।
अयोध्या नाम विख्यातं सर्वदेवनमस्कृतम्।
पुराणों में इस पावन पुरी को महापुरी नाम दिया गया है। स्कन्धपुराण में आया है-
अहो रस्यमहो तीर्थमहो माहात्म्य मुत्तमम्।
अयोध्या सदृशी कापि दृश्यते नापरा पुरी या न स्पृशति वसुधां विष्णु चक्र स्थितानिशम्।
अहो विष्णु रहो तीर्थमयोध्याही महापुरी॥
आनन्द रामायण में अयोध्या अन्य छह नगरियों से श्रेष्ठ वर्णित मिलती है।
पुरीषु श्रेष्ठाडयोध्येयं त्वचा वाच्याऽद्य राघव।
नदीषु सरयू: श्रेष्ठा वरै: कायोऽद्य मद्गिरा॥
काशी से अयोध्या पुरी को सौ गुना श्रेष्ठ कहा गया है-
तव वाक्याद गौरवेण तव् काश्या: शताधिका भविष्यति पुरी चेतमयोध्या मम वल्लभा॥
पुण्य नगरी अयोध्या की कीर्ति इससे स्पष्ट हो जाती है कि अयोध्या नगरी से सुदूर रहने पर भी सिंहल द्वीपीय कवि कुमारदास की पवित्र भावना अयोध्या से सम्पृक्त थी। महाकाव्य का श्रीगणेश महाकवि ने अयोध्या के अनुपम वर्णन से किया है। महाकवि अयोध्यापुरी को पूर्वकाल में स्वर्ग स्थित नगरी मानते हुए प्रथम सर्ग में कहते है-
आसीद वन्यामति भोग भाराद्।
दिवोऽर्तीर्णा नगरीव दिव्यां॥
विश्व विख्यात पुण्यनगरी अयोध्या का निदर्शन कवि, दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र के जन्म ( जानकी हरण, 4-6 ) के द्वारा प्रस्तुत करता है। राम की शैशवावस्था की बाल सुलभ लीलाओं का अत्यन्त मार्मिक वर्णन गोस्वामी तुलसीदास यदि करते हैं तो कुमारदास भी पीछे नहीं हैं।
न स राम इह क्चयात इत्यनुयुक्तों वनिताभिरग्रत: ।
निज हस्तपुटा वृताननो विदधेऽलीक निलीनमर्भक:॥
प्राचीनकाल से ही अयोध्या की ख्याति भगवान श्री राम की जन्मस्थली के कारण रही है। अयोध्यापुरी अनुपम पुरी है। वर्ष भर यहां पर्वों, धार्मिक उत्सवों का क्रम बना रहता है। परिक्रमा, कार्तिक पूर्णिमा, सावन झूला, राम विवाह एवं राम नवमी पर्व यहां के विशिष्ट पर्व हैं। इनमें रामनवमी की अपनी पृथक अनुपम पहचान है। श्री राम जन्म दिन होने के कारण संतों, भक्तों, के लिये दिन आदृत होता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के ठीक दोपहर की बेला में भगवान श्री राम का जन्म हुआ था। गोस्वामी तुलसी दास इसी की पुष्टि करते हैं:
नौमी तिथि मधुमास पुनीता
सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।
मध्य दिवस अति सीत न घामा।
पावन काल लोक विश्रामा ।
श्रीराम जन्मोत्सव से सभी देवता प्रसन्न हो गये। वे सुमन वृष्टि भी करते देखे गये-
बरसहिं सुमन सुअंजलि साजी।
गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा।
बहु विधि लावहि निज निज सेवा॥
वन कुसुमित गिरिमन मनि आरा।
सुवहि सकल सरिता अमृतधारा॥
ब्रहा, विष्णु, महेश सभी देवगण गगन से अपनी सुन्दर अंजुलियों में सजाकर सुमन की वर्षा करके आनंद मनाने लगे। नगाड़ों की ध्वनि नभमंडल में होने लगी। नाग, मुनि भी देवताओं समेत राम की आराधना में सन्नद्ध हो गये।
मनु शतरूपा ने तपस्या करके राम को पुत्र रूप में प्राप्त करने का वरदान प्राप्त किया था। मनु शतरूपा को ही दशरथ और कौशल्या माने जाने की मान्यता है। श्री राम के जन्मोत्सव पर स्त्रियां बधावा लेकर आती हैं। वे मंगल सूचक गीत गाती हैं। बालक राम को देखने के लिये सारी अयोध्या उमड़ पड़ती है। पुत्र उत्पन्न होने पर दशरथ इतने प्रसन्न होते हैं कि विप्रो को धन, वसन, मणि प्रदान करके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। अयोध्या पताकाओं एïवं तोरणों से मंडित हो जाती है। प्रत्येक द्वार पर कनक कलश सजाये गये हैं। राम जन्म से नर नारी प्रफुल्लित हैं। सब अपने अपने भाग्य सराह रहे हैं-
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा।
चले भवन वरनत निज भागा॥
गोस्वामी तुलसीदास श्रीराम से भी अयोध्या की भूरि-भूरि प्रशंसा कराते हैं-
जद्यपि सब बैकुण्ठ बखाना।
वेद पुरान विदित जग जाना॥
अवधपुरी सम प्रिय नहीं सोऊ।
यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥
जन्मभूमि ममपुरी सुहावनि।
उत्तर दिसि वह सरयू पावनि॥
राम के जन्मोत्सव में रामनवमी पर नर-नारी, ऋषि-मुनि एवं संतों के अतिरिक्त सारे के सारे तीर्थ अयोध्या आ जाते हैं
जेहिं दिन राम जनम श्रुति गावहिं।
तीरथ सकल तहां चलि आवहिं।
आचार्य केशवदास रामचन्द्रिका में अयोध्या एवं सरयू की कीर्ति का बखान करते हैं-
सरयू सरिता तट नगर बसै अवधनाम यश नाम धर।
ऊंचे अवास। बहु ध्वज प्रकाश।
सोभा विलास। सोभे आकास।
विश्व की संस्कृति जहां समाप्त होती है वहीं से अयोध्या की संस्कृति आरंभ होती है। प्राचीन साहित्य में पावनपुरी अयोध्या का भव्य स्वरूप वर्णित है। स्कंद पुराण में उल्लेखित मत्स्य आकार की अयोध्या का विस्तार तमसा नदी के एक योजन उत्तर और सरयू नदी से एक योजन दक्षिण, पश्चिम और पूर्व में भी एक योजन है। विष्णु धर्मोत्तर में अयोध्या के बारे में लिखा गया है- अयोध्या नामक नगरी परिखा से आवृत सरयू तट पर विद्यमान है। विद्वानों, कलाकारों, अश्वों, भवनों, महापथों से यह समलंकृत है।
राजशेखर, मुरारि, भट्टिï जैसे रचनाकारों ने भी संस्कृत ललित साहित्य में अयोध्या का वर्णन किया है पवित्र तीर्थस्थली के रूप में वेदव्यास ने भी महाभारत में अयोध्या को माना है। व्यास मिश्र के रामाभ्युदय, मुरारि के अनर्घराघव, राजशेखर के बाल रामायण तथा क्षेमेन्द्र की रामायण मंजरी में अयोध्या की चर्चा की गयी है। वशिष्ठ संहिता में अयोध्या को सच्चिदानंदरूपा नाम प्रदान किया गया है।
गुप्तकालीन साहित्य में इसे विशाखा, जैनग्रन्थों में विनीता, बौद्धग्रन्थों में साकेत नाम मिलता है। शिवसंहिता में अयोध्या के विषय में कहा गया है
भोगस्थानं परायोध्या लीलार- थांनत्वियं भुव:।
भोग लीलापती रामो निरंकुश: विभूतक:।
जैन धर्म ग्रन्थ आदिपुराण के अनुसार ज्ञात होता है-
साकेत रूढिय़प्स्या श्लाहयैव सुनिकतनै: स्वनिकेत इवाहातुंसाकेत: केत वाहुभि:।
प्रसिद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग एवं फाह्यान के यात्रा वर्णन में इसका संदर्भ आया है। रामकथा सर्वप्रथम चीन में पहुंची, कम्बोडिया के वायोन
मंदिर पर रामकथा के अंकन हैं। रामकथा उत्तर में तिब्बत से मंगोलिया और साइबेरिया तक है। रूस और इण्डोनेशिया में भी रामकथा और अयोध्या का सम्मान है।
अयोध्या को देवपुरी मानते हुए कवि केशवदास की भावना है।
जग यशवंत, राजा दशरथ की पुरी।
चन्द्र सहित सब काल, भालथली जनु ईश की॥
पंडित अति सिगरी पुरी, मनहु गिरा मति गूढ़।
मनो शची विधि रची विविध विधि वरणत पंडित॥
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त रामकाव्य की व्यापकता पर कहते हैं-
राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।
कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है।
राष्ट्रकवि ने अयोध्या के गौरव की प्रशंसा की है।
देख लो
साकेत नगरी है यही,
स्वर्ग से मिलने
गगन को जा रही है॥
आदि कवि वाल्मीकि ने भी रामायण में राम से अयोध्या के विषय में आत्मीय भाव व्यक्त कराये है
यद्यपि स्वर्णमयी लंका
न मे रोचते लक्ष्मण
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
अयोध्या की श्रेष्ठता के विषय में आनंद रामायण ( 9- 30 ) में श्री राम स्वयं कहते हैं
या देवेशु प्रथस्त्वं महेशाश्च तथा मधु:।
मासेषु प्रथमश्चास्तु तथाऽयोय पुरीष्वपि।
स्कन्द पुराण में आया है
अयोध्या परमं स्थानमयोध्या परमं महत।
अयोध्याया: समाकचित पुरी नान्या प्रदृश्यते॥
रामकथा केवल भारत में ही नहीं अपितु विश्व के विभिन्न भागों में पहुंची है। चीन, वर्मा, कम्बोडिया, इण्डोनेशिया, थाईलैंड में रामायण का सांस्कृतिक महत्व है। भारतीय संस्कृति के प्रसार प्रचार में रामकथा का प्रमुख स्थान रहा है। अयोध्या के कण – कण में राम व्याप्त हैं। अयोध्या के मंदिरों में आध्यात्मिक एवं धार्मिक मानव – मूल्यों का निदर्शन सर्वत्र घंटे घडिय़ाल की ध्वनि, मंदिरों में विपन्न जनों को भोजन कराने एवं मनुजता का दिव्य वातावरण प्राप्त होता है। अस्तु अयोध्या भारतीय संस्कृति की गरिमामयी पहचान बनती जा रही है। (विभूति फीचर्स)

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