उपवास का सही अर्थ क्या है?

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॥ओ३म्॥
उपवास क्यों करना चाहिये?उपवास कैसे करना चाहीये और उपवास करने से क्या लाभ होता है?
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1.सभी रोग का मूल कारण है हमारे आंतो(पेट) में और शरीर की करोड़ो कोसिकाओ में जमा (दूषित वात,पित और कफ) दूषित मल (याने की टॉक्सिंस)।

  1. हम सभी को एक अनुभव है। जब हम 500/1000 किलोमीटर की यात्रा करने हमारे चार पहिए के वाहन से बाहर घूमने निकलते है तब हम अपने वाहन को बीच बीच में रोक कर आराम देते है। गाड़ी गर्म हो जाने से उसके मशीन पर पानी छिड़कते है, ठीक उसी तरह हम हमारे यह शरीर रूपी मशीनके मूल भाग पेट को कभी आराम देने के बजाय पेट में हर थोड़े घंटे में कुछ न कुछ भोजन डालते रहते है। इसी की वजह से हमारे पेट में थोड़ा थोड़ा ना पचा हुआ भोजन मल के रूप में आंतो में और करोड़ो केशवाहिनियो में जमा होता रहता है।यह मल पेट में पड़ा पड़ा सड़ता रहता है और सभी रोगों का मूल उत्पादक बन जाता है। उस मल में कीड़े पनपते है और हमारा शरीर रोगों का घर बन जाता है।

  2. यह शरीर एक चार मंजिला बिल्डिंग है। जैसे सभी बिल्डिंग का थोड़े थोड़े समय में हम रिपेरिंग कराते है ठीक उसी तरह यह चार मंजिला बिल्डिंग जैसे यह शरीर की भी थोड़े थोड़े समय में हमें सफाई करते रहना चाहिए,जो हम नहीं करते है। यह शरीर रूपी बिल्डिंगका समय समयमें प्लास्टर, रंगरूगान और मरम्मत सही तरीके से और सही समय पर हम नहीं करते है। दिवाली के दिन हम हमारे घर के सभी कोने के सभी सामान को बाहर निकालकर अच्छी तरहां से पानी, पावडर से साफ करते है, ठीक उसी तरहां हमारे ऋषिमुनियो ने हर महीने पेट को खलीं करके सभी मल को बाहर निकालकर साफ करने के लिए उपवास का आयोजन किया है। लेकिन हमने उपवास को भी भोग का साधन बना दिया है। उपवास के दिन भी हम फराली पीज़ा, फराली ढोसा, फराली खिचड़ी, फराली थे, फराली पेटिश खाते रहते है।मूल शब्द फलाहार (फल का आहार) को हमने फराल कर दिया और उपवास के दिन फल का आहार करने के बजाय भरपूर विविध व्यंजन पेट में डाल कर उपवास की महिमा का मजाक उड़ाते है।

  3. उपवास यानी शहरी रूपी मशीन को थोड़े थोड़े घंटे (6,8,10,12,24 घंटे) के लिए अकेला छोड़ देना,उसमे कुछ भी नही डालना,पेंट को लोक डाउन कर देना।

  4. हम सब अच्छी तरहां से जानते हैं की रात्रि को सोते वक्त हमारे मोबाइल के सभी बिनुपयोगी मेसेज को डिलीट कर देना चाहिये और थोड़े थोड़े समय में मोबाइल को फॉर्मेट भी कर देना चाहीये। लेकिन यह शरीर रूपी महाकाय मोबाइल को हम कभी फॉर्मेट नहीं करते हैं, यानी उपावासी नहीं रखते है। उपवास यानी शरीर रूपी मोबाइल को कंपलिटली खाली कर देना।यदि हम हर महीने में एक दिन अपने शरीर में पानी, भोजन कुछ भी ना डाले और एनिमा लेकर पेट में जमा सभी गन्दा मल बाहर निकालते रहे तो यह शरीर 100 साल तक बीना कोइ दवा लिए स्वस्थ रह सकता है।

  5. उपवास करना और उपवास हो जाना दोनों अलग बात है। जब आपका ह्रदय,मन प्रेमसे, मस्ती से, आनंद से,गीत से आपुरित होता है, भरा होता है तब भोजन की याद नहीं आती है। तब वह सच्चा उपवास है।लेकिन यदि आप का मन,हृदय प्रेम,आनंद से भरा नहीं होता है तब आपको उपवास करना पड़ता है। भोजन ना करना उपवास करना नही है।भोजन की याद ना आए वही सच्चा उपवास है। जब जीवन प्रेम से रिक्त,खाली होता है तब भोजन की प्यास, लालसा बढ़ जाती है। जीवन में प्रेम का ना होना ही सभी रोग का मूल है। जब कोई व्यक्ति खुद की पहेचान करने लगता है, में कौन हु?परमात्मा कौन है? इसकी जांच,पड़ताल में लग जाता है तब उसे भोजन की याद नहीं आती है और वही सच्चा उपवास है।
  6. उपवास कैसे और कितने समय का होना चाहिए?हमारा यह शरीर 5 तत्वों से बना है। पृथ्वी तत्व (विविध प्रकार के अनाज के दाने, विविध कलर,आकार के फल, फूल, हरे पत्ते (जिसमें दल होता है)। जल तत्व याने की पानी, अग्नि याने की जिसमे तेजपन, तीखापन होता है जैसे मिर्च, मसाले, हरी मिर्च,अदरक, धूप में शरीर को घूमना। वायु तत्व याने की श्वास में हवा लेते है वो (जीसमे भरपूर मात्रा में प्राण तत्व भी होता है)। आकाश तत्व जिसे स्पेस कहा जाता है, जिसमें कुछ भी नही होता है, जिसे शून्य भी कह सकते है। हमारे शरीर के लिए उपयोगी 5 तत्व में से हम 4 तत्वों (पृथ्वी, पानी, वायु, अग्नि तत्व) का तो हम भरपूर मात्रा में उपयोग करते है, बेलगाम उपयोग करते है लेकिन 5 वा आकाश तत्व का उपयोग हम 10% ही नहीं करते है।आप पूछेंगे की आकाश तत्व का उपयोग हम कैसे करे?आकाश तत्व खाली तत्व है,रिक्त, मौन, शून्य। उसका उपयोग करने के लिए हमे हमारे शरीर में कुछ भी नही डालना है। ना पानी, ना भोजन, कुछ भी भीतर नहीं डालना (सिर्फ हवा, प्राण से जीना उपवास है) उपवास है, आकाश तत्व का उपयोग है। जितने ज्यादा स्केवर फूट खाली जगह का फ्लैट या मकान उतनी ज्यादा उसकी प्राइस होती है ठीक उसी तरह जितना आपका पेट खाली रख सकते हो उतना आरोग्य,स्वस्थता आपको मिलेगा और जीवन मस्ती,आनंद से पसार होगा।
  7. कुदरत ने श्रृष्टि को तरोताजा रखनेंके लिए मृत्यु का इंतजाम किया है। और उसके लिए सभी पशु, पक्षी, जलचर, नभचर, जमी पर रहने, पनपने वाले जीवो के लिए भोग विलास की व्यस्था की है।और यह भोग विलास के साधनों से ही सभी जीवों की वृद्धि भी होती है और मृत्यु भी होती है। एक ऋषि ने कहा है भोग पूरे नहीं होते है भोगने वाला ही मृत्यु का भोग बन जाता है। आप उपवास करो या ना करो मृत्यु निश्चित है।50,60,70,80,100 साल में हमारा शरीर रूपी यंत्र “राम बोलो भाई राम”होने ही वाला है लेकिन उसके पहले आप कितने आनंद और स्वस्थता से जीते हो उसका महत्व बहुत ज्यादा है। उपवास वो क्रिया है जिस क्रिया से इंसान जितने भी साल जिए बहुत प्यार और मस्ती से जी सकता है।
    जीवन बहुमूल्य है स्वस्थ रहे मस्त रहे
    शास्त्री विनोद आर्य 🙏

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