वैदिक सम्पत्ति : चतुर्थ खण्ड: – वेदमन्त्रों के उपदेश

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गतांक से आगे…

नमूने के तौर पर हम यहां वेदों के कुछ सरलार्थं मन्त्रों को उद्धृत करके दिखलाते हैं कि वेद प्रत्येक आवश्यक विषय की शिक्षा किस प्रकार देते हैं। यहां हम एक एक विषय के दो – दो चार – चार मन्त्र ही देंगे। यह वेदविषयों की एक सूची मात्र ही है। इन विषयों से संबंध रखने वाले वेदों में अनेकों मन्त्र हैं, पर सबके लिखने की आवश्यकता नहीं हैं। हमने इस मंत्रसूची और विषयप्रतिपादन में अपने ढंग का क्रम दिया है। इस क्रम से वेदों के ज्ञान की स्पष्टता होती है । सबसे पहिले हमने मनुष्यों की इच्छाओं के मन्त्र लिखे हैं। मनुष्य की समस्त इच्छाओं का समावेश बड़े- बड़े सात स्तम्भों में हो जाता है। ये इच्छाएँ गृहस्थाश्रम से ही पूरी हो सकती हैं, इसलिए हमने इच्छाओं के बाद गृहस्थाश्रम के मन्त्र रक्खे हैं । गृहस्थ का निर्वाह बिना उत्तम सामाजिक व्यवहार के धारण किए हो ही नहीं सकता, क्योंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, इसलिए हमने तीसरा नम्बर सामाजिक व्यवहार के मंत्रों को दिया है। परन्तु वह आदमी अच्छे सामाजिक व्यवहार नहीं कर सकता, जो सदाचारी नहीं है, इसलिए हमने चौथा नम्बर सदाचार के मंत्रों को दिया है। सदाचार कभी सुदृढ़ नहीं हो सकता, जब तक मनुष्यों को गर्भ से लेकर यज्ञोपवीत अर्थात् आचार्यकुलवास तक के संस्कारों से सुसंस्कृत न किया जाय, इसलिए हमने संस्कारों के मंत्रों को पाँचवाँ स्थान दिया है। संस्कारों से सदाचार की पुष्टि होती है और समाज पवित्र भी होता है, पर बिना जीविका के उसका निर्वाह नहीं हो सकता, इसलिए हमने छडे नम्बर में जीविका के मंत्रों को रक्खा है। इसमें भौगोलिक ज्ञान और व्यवसाय से सम्बन्ध रखने वाली समस्त बातों के मंत्र आ गये हैं।

जीविका के आगे समाज की रक्षा का प्रश्न आता है। बीमारी से शरीररक्षा, कलह और पाप से समाजरक्षा और बाह्य शत्रुओं से राष्ट्ररक्षा करनी पड़ती है, इसलिए आयुर्वेद, यज्ञ और राज्यव्यवस्था के मंत्रों को एकत्रित करके जीविका के बाद सातवें नम्बर में रखा है। इसके आगे परलोकचिन्ता के मंत्र है। इनमें सबसे पहिली बात सृष्टि की उत्पत्ति की है। सृष्टि की उत्पत्ति के कारणों का समूह ही परलोक है, इसलिए हमने परलोक से सम्बन्ध रखनेवाले जीव, ब्रह्म, बन्ध, मोक्ष और पुनर्जन्म आदि विषयों के मंत्रों का समावेश आठवें नम्बर में किया है। इस तरह से सारांशरूप से हमने लोकपरलोक से सम्बन्ध रखनेवाले प्रायः सभी विषयों के मंत्रों को लिख दिया है। हमारा अनुमान है कि जितने विषयों के मंत्र हमने दिये हैं, उतने विषयों में प्रवेश हो जाने पर मनुष्य की बुद्धि इस योग्य हो जाती है कि वह अपना भला- बुरा,हानि -लाभ – सोच ले और अपनी उन्नति कर ले।

मनुष्य की इच्छाएँ

सबसे पहिले मनुष्य की इच्छाओं को लीजिये । मनुष्य की इच्छाएँ सात भागों में विभाजित हैं। (१) बहुत दिन जीने की इच्छा । (२) स्त्री, पुत्र, रति, शोभा, शृङ्गार की इच्छा। (३) खाने पीने, पहिनने ओढ़ने, मकान, गृहस्थी, द्वारा बगीचे और खेत तथा पशुओं की इच्छा। (४) यश और मान यादि की इच्छा । (५) विद्या, ज्ञान, विज्ञान

वैदिक सम्पति

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हुए मौर मालूमात की इच्छा । (६) अपने साथ कोई धन्याय न करे, अर्थात् न्याय की इच्छा और (७) बार बार जन्म- मरण के दुःख से छूटकर मोक्षप्राप्ति की इच्छा मनुष्यमात्र को रहती है। वेदों ने गायत्री सन्त्र के द्वारा इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति के लिए नित्य परमेश्वर से प्रार्थना करने का उपदेश किया है। गायत्री का माहात्म्य वर्णन करते अथर्ववेद 16/71/1 में कहा गया है कि-

स्तुता मया वरदा वेदमाता प्र चोदयन्तां पावमानी द्विजानाम् ।

आयुः प्राणं प्रजां पशु कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चर्स मह्यं दत्तवा व्रजत ब्रह्मलोकम् ।।

अर्थात् प्रचोदयात् पदान्तवाली और द्विजों को पवित्र करनेवाली वेदमाता गायत्री की मैं इसलिए स्तुति करता हूँ। कि वह मुझको आयु, बल, प्रजा, पशु, कीर्ति, घन धौर वैदिकज्ञान देकर ब्रह्मलोक अर्थात् मोक्षपद को पहुँचावे । उस आदेश से ज्ञात हुआ कि मनुष्यमात्र की ये इच्छाएँ स्वाभाविक हैं। फ्रीनॉलॉजीवाले भी बतलाते हैं कि मस्तिष्क में ज्ञान, मान, अर्थ, काम, आयु, विज्ञान और न्यायधर्म के ही प्रधान सात स्थान हैं। अन्य स्थान तो इन्हीं के अन्तर्गत इन्हीं की शाखाएँ हैं। इससे ज्ञात होता है कि ये इच्छाएँ नैसर्गिक हैं। इन सबमें दीर्घ जीवन की इच्छा सर्वप्रथम है, इसलिए सबसे पहिले हम दीर्घजीवन के ही मन्त्रों का नमूना दिखलाते हैं।
क्रमशः

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