हरियाणा के पानीपत का रोंगटे खड़ा कर देने वाला प्रकरण सामने आया है। जहां के एक फार्महाउस के मालिक ने अपने जर्मनी मूल के कुत्ते से अपने नौकर मनीराम को नोंच-नोंच कर मरवा डाला है। नौकर का दोष केवल यह था कि वह अपने मालिक की नौकरी छोडऩे का मन बना रहा था, जबकि मालिक नही चाहता था कि मनीराम नौकरी छोडक़र जाए। वह मनीराम को अपना बंधुआ मजदूर बनाये रखना चाहता था। कुछ समय पहले जब मनीराम ने नौकरी छोडऩे की बात कही थी तो उसके मालिक नरेश ने उसे नौकरी छोडऩे की दशा में अपने कुत्ते से नोंच-नोंच कर मरवा डालने की धमकी दी थी। विगत रविवार को नरेश ने अपनी धमकी को अक्षरश: लागू भी कर दिया और उसने अपने कुत्ते को इशारा देकर अपने नौकर मनीराम को मरवा डाला। देखते ही देखते कुत्ता मनीराम का 25 प्रतिशत भाग खा गया जिससे नौकर की दर्दनाक मृत्यु हो गयी।
अब प्रश्न है कि मनुष्य इतना गिर क्यों गया? इसकी मानवता दानवता में कैसे परिवर्तित हो गयी? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए ठंडे दिमाग से चिंतन करने की आवश्यकता है। मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने के लिए वैदिक संस्कृति ने सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी इन तीन प्रकार की प्रवृत्तियों में से सतोगुणी प्रकृति का बनाने का प्रयास किया। इस प्रकार की प्रकृति के मनुष्य बड़े ही विवेकशील और न्यायशील होते हैं। जबकि रजोगुणी प्रकृति के लोग सतोगुणी से बहुत कम विवेकशील और न्यायशील होते हैं, जबकि तमोगुणी प्रकृति के लोग पूर्णत: अज्ञान के अंधकार में भटकते रहते हैं। वे किसी के साथ निजी स्वार्थ में अंधे होकर न्याय नहीं कर पाते, इसलिए उनसे किसी प्रकार के विवेक प्रदर्शन की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती।
सतोगुणी मानव समाज की रचना के लिए मनुष्य का आहार -बिहार और आचार-विचार शुद्घ व पवित्र रखना अपेक्षित होता है। जो लोग राजसिक और तामसिक प्रकृति के होते हैं-उनका भोजन अर्थात आहार बिहार दूषित होता है। जो पदार्थ अभोज्य है यथा मांस, मदिरा आदि उन्हें ऐसे लोग प्रयोग करते हैं और वे अपने राजसिक व तामसिक संसार की रचना करते हैं। इनकी पाशविक प्रवृत्ति के कारण इनके संसार में भी जंगलराज बन जाता है। जहां बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है ऐसा ‘मत्स्य न्याय’ विकसित होता है। अपने आपको न्यायसंगत दिखाने के लिए ये लोग ‘मत्स्य न्याय’ को ही आधार बनाते हैं। फलस्वरूप इनके संसार में सर्वत्र अहंकार में वृद्घि होती रहती है और हम देखते हैं कि काम और क्रोध में तपता मानव अपने स्वार्थों के लिए लड़ता-झगड़ता है। वह अपना स्वार्थ देखता है और दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण करता है।
संसार के मांसाहारी लोगों ने संसार को राजसिक और तामसिक प्रकृति का बना डाला है। इसलिए सर्वत्र काम और क्रोध का वर्चस्व स्थापित हो गया है। मांसाहारियों ने पहले तो अन्य जीवधारियों की हिंसा को परमोधर्म माना, पर अब ऐसे मानव के संस्कारों में हिंसा आ गयी है। वह बड़ी निर्लज्जता से और अपना अधिकार मानते हुए ऐसे अपराध कर जाता है जिनकी उससे अपेक्षा नही की जा सकती है। ऐसी आपराधिक वृत्ति और प्रकृति से बचाने के लिए मनुष्य के लिए हमारे ऋषियों ने उसको सात्विक बनने की शिक्षा दी। उसे बताया कि तू उन वनस्पतियों से प्राप्त अन्न औषधियों, शाक व पात का सेवन कर जो स्वयं हिंसा नही करती और जिनका जीवन परकल्याण के याज्ञिक कार्य के लिए समर्पित रहता है। यदि तू ऐसे भोज्य पदार्थों का सेवन करेगा तो तेरा मानव धर्म  सुरक्षित रहेगा और तू सदा विवेकशील व न्यायशील बना रहेगा। इससे तेरे ज्ञान की सुरक्षा और संवृद्घि दोनों होंगी और तू सदा उन्नति करता रहेगा। जिसके भोजन में हिंसा है, उसके मन में हिंसा है और जिसके मन में हिंसा है उसके भावों में हिंसा है और भावों की हिंसा हमारे विचारों को हिंसक बनाकर हमें ‘नरेश’ बना जाती है जो हमसे हमारे ही एक नौकर की हत्या करा जाती है।
मनुष्य की सुधार योजना को हमारे ऋषि मुनि इसी क्रम से आरंभ करते थे। उसे अहिंसक बुद्घिमान न्यायशील और विवेकशील बनाये रखने के लिए उसके आहार बिहार को उच्च शुद्घ एवं पवित्र बनाने पर बल देते थे।
आज के तथाकथित और मूर्ख प्रगतिशील लोगों ने भारत के ऋषियों की ‘मनुष्य निर्माण योजना’ के इस महत्वपूर्ण सूत्र की उपेक्षा की है। इन मूर्खों का तर्क होता है कि मुझे क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, इसे निश्चित करने वाले आप या समाज कौन होता है? मैं जो चाहूं सो खाऊं, यह मेरा निजी विषय है। इसमें किसी का हस्तक्षेप उचित नहीं। इनकी दृष्टि में जब ‘नरेश’ जैसे लोग कोई आपराधिक कृत्य करते हैं तो उस पर भी यह मूर्खतापूर्ण टिप्पणी करते हैं कि ‘सभ्य समाज’ में ऐसी घटनाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। अब इनसे कौन पूछे कि जिसे आप ‘सभ्य समाज’ कह रहे हैं वह दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण और दूसरों के जीवन को मसलकर बनने वाला समाज है और उसी ‘सभ्य समाज’ में यदि ऐसा हो रहा है तो यह हो ही जाना चाहिए। आपके समाज में ही तो घटनाएं होती हैं और वही होती रहेंगी।
जिसे ‘सभ्य समाज’ कहा जाता है वह तो ऋषियों का चिंतनशील समाज होता है, सात्विक समाज होता है। वह दूसरों के अधिकारों का और दूसरों के जीवन का सम्मान करता है, इसलिए वह ‘मनीराम’ को मारता या मरवाता नहीं है, अपितु उसको आश्रय और संरक्षण देता है। उस समाज के लिए ऐसी घटनाएं निश्चय ही मर्मान्तक होती हैं।
कठोर कानून इन घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने का उपाय नहीं है। इन्हें रोकने के लिए भारत की वैदिक संस्कृति के अनुसार मनुष्य निर्माण योजना को अपनाने की आवश्यकता है। इसके लिए प्रत्येक विद्यालय में नैतिक शिक्षा के माध्यम से मनुष्य को मनुष्य बनाने का अभियान चलाया जाए तभी हम मानवता की रक्षा कर पाएंगे और तभी किसी ‘मनीराम’ की रक्षा कर पाएंगे।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betsat giriş
betsat giriş
betgaranti giriş
betgaranti yeni giriş
betsat giriş
betsat giriş
superbetin giriş
betgaranti giriş
superbetin giriş
vdcasino giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
betsat giriş
betsat giriş
betpark giriş
betpark giriş
nesinecasino giriş
nesinecasino giriş
cratosroyalbet giriş
cratosroyalbet giriş
betgaranti giriş
jojobet giriş
betgaranti mobil giriş
klasbahis
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vdcasino giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş