वैदिक सम्पत्ति : गतांक से आगे… वेदों की शाखाएँ

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वेदों की शाखाएँ

शाकल और बाष्कल शाखाओं के संयुक्त रूप के अतिरिक्त अब ऋग्वेद की कोई दूसरी शाखा नहीं मिलती । कहते हैं कि कलकत्ते की एशियाटिक सोसायटी के पुस्तकालय में ऋग्वेद से सम्बन्ध रखनेवाली शांख्यायनी शाखा मिलती है , पर उसका स्वरूप अस्तव्यस्त है । अस्तव्यस्तता के अतिरिक्त वह शाकल के शिष्यों की प्रवचन की हुई है , इसलिए शाकल की अपेक्षा उसको ज्येष्ठत्व – अपौरुषेयत्व – प्राप्त नहीं सकता । ऋग्वेद से सम्बन्ध रखनेवाला शाखाभेद इतना ही है ।

यजुर्वेद की शाखाएँ किसी समय एक सौ तक पहुँची थीं , किन्तु इस समय केवल पाँच ही मिलती हैं । इन पाँच में तीन शाखाएँ कृष्णवेद से सम्बन्ध रखनेवाली हैं । कृष्णवेद का विस्तृत वर्णन हम तृतीय खण्ड में कर चुके हैं । हमने वहाँ अच्छी तरह दिखला दिया है कि कृष्णवेद रावणकाल से आरम्भ होकर द्रविड़काल तक बनता रहा है । उसमें असल यजुर्वेद का भाग तो थोड़ा है , पर रावणकृत प्राचीन वेदभाष्य का , ब्राह्मणग्रन्थों का और अन्यान्य स्थलों का हीबहुत बड़ा भाग मिश्रित है। इस कृष्ण यजुर्वेद से संबंध रखने वाली इन तीनों शाखाओं में एक तैत्तिरीयों की और दो चरकों को हैं । तैत्तिरीयों की तैत्तिरीय और चरकों की कठ और मैत्रायणी कहलाती हैं । हम लिख आये हैं कि चरकों का सम्बन्ध तैत्तिरीयों से ही है । तैत्तिरीय शाखावाले ही चरक नामी यज्ञ करानेवाले का वरण करते हैं , इसलिए ये तीनों शाखाएँ आर्यसम्प्रदाय में मान्य नहीं हो सकती और न अपौरुषेय मूल यजुर्वेद की शाखाएँ हो सकती हैं । हमने बतला दिया है कि अवैदिक शाखाओं में दो ऐब हैं । इन तीनों की रचनाओं में वही पूर्वोक्त दोनों ऐब पाये जाते हैं । शाखाओं का प्रधान ऐब मिश्रण है , अर्थात् बाह्य सामग्री को लेकर मूलसंहिताओं की वृद्धि है और दूसरा ऐब मूल संहिता के मन्त्रों को घटाकर छोटा कर डालना है और पाठभेद कर देना है । हम देखते हैं कि तैत्तिरीय शाखा में मिश्रण हुआ है – बाह्य सामग्री से उसकी वृद्धि की गई है और कठ तथा मैत्रायणी शाखाएँ घटाई गई हैं – उनसे अराल मन्त्र निकाल डाले गये हैं और कहीं कहीं पाठभेद किया गया है । जहाँ तैत्तिरीय की मन्त्रसंख्या बढ़ाकर 18,000 कर दी गई है , वहां कठ शाखा में घटाकर 264 और मैत्रायणी में घटाकर 654 ही मन्त्र रक्खे गये हैं । इतने पर भी पाठभेद इतना किया गया है कि उनको यजुर्वेद कहने में भी संकोच होता है । इस ह्रासविकास से भी उक्त शाखाएँ विश्वासयोग्य नहीं रहीं और न उनकी गणना मूल यजुर्वेद में हो सकती है ।

यजुर्वेद की पाँच शाखाओं में अब केवल दो ही शाखाएँ रह जाती हैं । ये दोनों शाखाएँ वाजसनेयी कहलाती हैं । इनके नाम माध्यन्दिनीय और काण्व है । माध्यन्दिनीय शाखा यही है , जिस पर उवट , महीघर और स्वामी दयानन्द ने भाष्य किया है । काण्वशाखा भी भाष्यसहित अलग मिलती है । जर्मनीवालों ने तो माध्यन्दिनीय के साथ काण्व शाखा के पाठभेद को भी अलग करके छाप दिया है । यद्यपि अन्तर बहुत कम है , तथापि अपौरुषेय वेद में एक मात्रा का भी अन्तर सहनेयोग्य नहीं हो सकता , इसलिए इस बात का निर्णय हो जाना अत्यन्त आवश्यक है कि इन दोनों में से ज्येष्ठत्व किसको है— कौन मूल और कौन परिवर्तित है । हमको अब तक जितने प्रमाण मिले हैं , उनके देखने से यही प्रतीत होता है कि माध्यन्दिनीय शाखा ही असल है , काण्व शाखा नहीं ।

हमने तृतीय खण्ड में उपनिषदों में मिश्रण सिद्ध करते हुए लिखा है कि काण्वशाखा में बृहदारण्यक का भाग मिश्रित है और यह मिश्रण द्रविड़देश में तैत्तिरीय शाखाओं के हाथ से हुआ है । काण्वऋषि का तैत्तिरीय शाखावालों से कुछ न कुछ सम्बन्ध अवश्य रहा है । उपनिषदों के संग्रह करनेवाले और उनमें आसुरी भावों के भरनेवाले द्रविड़ ही हैं । जब उन्होंने ईशोपनिषद् को काण्वशाखा और बृहदारण्यक उपनिषद् से ही सजाया है तब स्पष्ट है कि द्रविड़ों में काण्वसंहिता का ही मान रहा है , माध्यन्दिनीय का नहीं । स्वामी हरिप्रसाद वेदसर्वस्व पृष्ठ 145 में लिखते हैं कि ‘ शंकराचार्य के प्रधान शिष्य सुरेश्वराचार्य इस काण्वयजुःसंहिता के ही मुख्य अध्यापक थे ‘ । इसका कारण स्पष्ट है कि काण्वऋषि का सम्बन्ध द्रविड़ देश से रहा है । द्रविड़ ही देश से नहीं , किन्तु जिस प्रकार कृष्णयजुर्वेद के चरक लोग मद्रदेश से भी सम्बन्ध रखते थे , उसी तरह कण्वऋषि भी न केवल मद्रासप्रांत तक प्रत्युत मिश्रदेश तक धावा लगाते थे । घावा ही न लगाते थे , उन्होंने मिश्रदेश से दश हजार मिश्रियों को लाकर भारतीय आर्यों में मिश्रित भी कर दिया था , जिसका इतिहास पुराणों में लिखा हुआ मिलता है । इससे सिद्ध है कि आर्यों में मिश्रियों के मिलाने के कारण और द्रविड़ों के साथ सम्बन्ध रखने के कारण काण्वऋषि को अपने विचारों में कुछ फेरफार अवश्य ही करना पड़ा होगा ।
क्रमश:

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