परमपिता परमात्मा की अनंत कृपा के संदर्भ-

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बिखरे मोती

तू सौवे वह जागता,
चला रहा तेरे सांस ।
हृदय की धड़कन चला,
करता तेरा विकास॥1959॥

संत संनिधि के संदर्भ में-

आत्मवेत्ता संत मिले,
तो सद् गुण बढ़ जाय।
जैसे पारस लोहे को,
सोना दे बनाय॥1960॥

मूरख के स्वभाव के संदर्भ में –

मूरख निज मन की करे,
समझाना बेकार ।
ज्ञान की खिल्ली उड़ा,
करें अति अहंकार॥1961॥

महर्षि देव दयानन्द के दिव्य और विराट व्यक्तित्व के संदर्भ में –

दिव्य सम्पदा का धनी,
पा गया दिव्यानन्द I
ज्ञान तेज का सूर्य ,
अद्भुत था दयानन्द॥1962॥

जिजीविषा और जिज्ञासा के संदर्भ में –

जिजीविषा होवै प्रबल,
करे प्राण संचार ।
जिज्ञासा के कारणै,
होते आविष्कार॥1963॥

संसार में प्रेम तत्व कितना महान

एकता के सूत्र में,
बाँधे सबको प्यार ।
प्यार महान तब बने,
जब हो वफादार॥1964॥

गरजते सागर की लहरे,
करती अति निनाद ।
ध्यानमग्न बर्फीले पर्वत,
करें प्रभु की को याद॥1965॥

प्रातः काल की बेला में,
विध्म मचाते शोर ।
विधाता का वन्दन करो,
आई नूतन भोर॥1966॥

राक्षस और देवताओं में अन्तर –

दुष्टात्मा देती सदा,
हानि दु:ख अपमान ।
पुण्यात्मा करत है,
दया धर्म और दान॥1967॥

संसार अर्थात् माया के संदर्भ में –

कितना ही लाड लड़ायले,
माया मारेगी लात ।
घाव कहीं दिखै नहीं ,
करे प्राणों पर आघात॥1968॥

प्यार छू-मन्तर कब होता है –

आपसी विश्वास हो,
जुड़े एकता के तार ।
छल कपट और दम्भ से,
छूमन्तर हो प्यार॥1969॥

जगत और जगत – पिता के संदर्भ में –

जगत अधूरा ही मिले,
जगत -पिता है पूर्ण I
बेशक हो राजा कोई,
देखे गए अपूर्ण॥1970॥

भाव की उच्चतम और निष्कृष्टतम अवस्था के संदर्भ में –

भाव की उच्चतम गति,
भक्ति और है बोध ।
निकृष्ट अवस्था भाव की,
अहंकार और क्रोध॥1971॥

हाय री तृष्णा! शरीर बूढ़ा हो गया किन्तु तू अभी तक युवा है-

तृष्णा बूढ़ी ना हुई,
बुढ़ा हुआ शरीर ।
तृष्णा से आबद्ध सब,
राजा हो या पीर॥1972॥

स्वर्ग की कामना के संदर्भ में –

स्वर्ग की मुद्रा पुण्य है ,
जिससे मिले प्रवेश ।
बिना पुणे नही जा सके,
बेशक हो दरवेश॥1973॥

योग- यज्ञ से होता है,
इस सृष्टि का त्राण I
योग – यंत्त तू नित्य कर,
जो चाहे कल्याण॥1974॥

धर्म के संदर्भ में –

अभ्युदय निश्रेष्य का,
योग कहावै धर्म ।
प्रारब्ध बनकर आयेगे,
तेरे संचित कर्म॥1975॥

अभ्युदय – अर्थात् सांसारिक सुख

निश्रेष्य – अर्थात् पारमार्थिक सुख यानी की मोक्ष

भक्तों की अभिप्सा

अपयश मुझसे दूर हो,
पाउं कीर्ति शरीर ।
शरणागति तेरी मिले,
जीवन बने नज़ीर ॥ 1976॥

अपयश – बदनामी

कीर्ति शरीर – अर्थात् यश रूपी शरीर अर्थात् मृत्यु के बाद भी मेरा यश संसार में जीवित रहे।

शरणागति – मोक्ष

नज़ीर – मिसाल, प्रेरणा स्रोत, आदर्श

‘ शेर ‘

विदाई के संदर्भ में –

चन्द लम्हों के लिए,
सितारे जमीन पर आ गए।
अपनी करिश्माई झलक से ,
वह हर दिल में छा गए॥
जी चाहता है, यह महफिल,
मुतवातिर चलती रहे,
मगर लम्हे विदाई आ गए,
खुदा करे तुम महफूज रहो,
खुशहाल रहो आबाद रहो ।
इन दुआओं के साथ,
अलविदा साथियो!
अलविदा साथियो !!
अलविदा साथियो!!! ॥1977॥
पावस की ऋतु आ गई,
बरसे – मूसलधार ।
कही पै आम पैदा हुआ,
कहीं पर खरपतवार ॥1978॥

तुझसे मिलने को प्रभु,
मन रहता बेचैन ।
हरी दर्शन की प्यास है,
रहा निहारे नेम॥1979॥
क्रमश:

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