भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अनमोल निधि सावरकर

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उगता भारत ब्यूरो

वामपंथी तथा कम्युनिस्ट उन महान् राष्ट्रमत क्रांतिकारी शिरोमणि स्वातन्त्र्यवीर सावरकर जी पर अंग्रेजों का एजेंट होने तथा जेल से माफी मांगकर छूटने जैसे निराधार और शरारतपूर्ण आरोप लगाने का दुस्साहस कर रहे हैं , जिन्होंने अपनी जवानी को ही नहीं अपने पूरे परिवार को स्वाधीनता के यज्ञ में समर्पित कर अपना सर्वस्व ही न्यौछावर कर डाला था । विनायक दामोदर सावरकर जी का जीवन राष्ट्रभक्ति और वीरता का पर्याय था ।
18 मई सन् 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के ग्राम भगूर में चितपावन ब्राह्मण वंशीय दामोदर सावरकर तथा राधाबाई के पुत्र के रूप में जन्में विनायक ने रामायण , महाभारत तथा छत्रपति शिवाजी के पावन जीवन से प्रेरणा लेकर अपने राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए जीवन समर्पित करने का संकल्प ले लिया था ।
विनायक को परिवार में ‘ तात्या ‘ के नाम से पुकारा जाता था । तात्या ने अपनी कुलदेवी सिंहवाहिनी दुर्गा की पूजा उपासना करते – करते उनसे वीर वृत्ति की ओर उन्मुख करने का वरदान माँगा ।
किशोरावस्था में तात्या को नासिक के स्कूल में भर्ती कराया गया । उन दिनों लोकमान्य तिलक जी द्वारा सम्पादित दैनिक ‘ केसरी ‘ पत्र प्रखर राष्ट्रवाद के प्रचार में सक्रिय था । तात्या ‘ केसरी ‘ के सम्पादकीय तथा अन्य लेख पढ़कर विदेशी अंग्रेज सरकार के काले कारनामों से परिचित हुए । उन्होंने अपने मित्रों के साथ विदेशी सत्ता के चंगुल से अपने राष्ट्र को मुक्त कराने के उपायों पर विचार – विमर्श शुरू किया । उन्होंने मित्र – मेला ‘ नामक संस्था की स्थापना की । मित्र मेला के तत्वावधान में ‘ गणेशोत्सव ‘ तथा ‘ शिवाजी महोत्सव ‘ मनाए जाने लगे ।
सन् 1901 में विनायक को मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पुणे के फर्ग्यूसन कालेज में भर्ती कराया गया । विनायक ने केवल 18 वर्ष की आयु में ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं । उन्होंने कुलदेवी दुर्गा के सामने प्रतिज्ञा ली कि वह अपना समस्त जीवन मातृभूमि की स्वतन्त्रता के यज्ञ में झोंक देंगे ।
पुणे से प्रकाशित ‘ काल ‘ के सम्पादक श्री परांजपे ने विनायक की लिखी कविता अपने पत्र में प्रकाशित की तो उसकी जगह – जगह चर्चा हुई । श्री परांजपे जी ने एक दिन विनायक सावरकर को साथ ले जाकर लोकमान्य तिलक से परिचय कराया । श्री तिलक पहली बार ही 21 वर्षीय विनायक के व्यक्तित्व तथा काव्य प्रतिभा से प्रभावित हो गए तथा उन्होंने उन्हें प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया ।
22 जनवरी 1901 को ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का निधन हुआ । भारत में भी शोकसभाओं का आयोजन किया गया । पुणे व नासिक में ‘ मित्र मेला ‘ की ओर से पोस्टर लगाए गए ‘ इंग्लैण्ड की रानी हमारे दुश्मन देश की रानी है- हम शोक क्यों मनाएं ?

” विदेशी वस्त्रों की होली जलाई

सन् 1905 में विदेशी सरकार के विरुद्ध रोष व्यक्त करने के लिए विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का अभियान चलाया गया । विनायक सावरकर ने पुणे के बाजार में विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का कार्यक्रम रखा । लोकमान्य तिलक ने स्वयं उपस्थित होकर अध्यक्षता की । पुणे में पहली बार विदेशी वस्त्र जलाए जाने की घटना का समाचार भारत के ही नहीं विश्वभर के समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ । इस आरोप में सावरकर को फर्ग्यूसन कालेज से निष्कासित कर दिया गया । बाद में मुम्बई विश्वविद्यालय से उन्होंने बी.ए की परीक्षा उत्तीर्ण की ।
छात्रावस्था में ही सावरकर जी ने ‘ अभिनव – भारत ‘ संस्था की स्थापना की । शिवाजी के वीरतापूर्ण कृत्यों से प्रेरित छात्र शिवाजी के नाम पर देश को विदेशियों के चंगुल से मुक्त कराने का संकल्प लेते थे ।
लोकमान्य तिलक ने कुछ ही दिनों में परख लिया था कि यह युवक ( विनायक सावरकर ) असाधारण व्यक्तित्व से मंडित है । वे उसे हर प्रकार से संरक्षण तथा प्रोत्साहन देने लगे ।
स्वामी दयानन्द सरस्वती के परम अनुयायी पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा एक साधन सम्पन्न राष्ट्रभक्त थे ।
उन्होंने 1897 में ब्रिटेन पहुँचकर वहाँ से भारत की स्वाधीनता की मांग मुखरित की । श्री वर्मा ने प्रतिभाशाली भारतीय छात्रों को ब्रिटेन में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए कुछ छात्रवृत्तियों की घोषणा की । लोकमान्य तिलक श्री श्याम जी कृष्ण वर्मा के मित्र थे । तिलक जी के संकेत पर श्याम जी कृष्ण वर्मा ने विनायक सावरकर को ‘ शिवाजी छात्रवृत्ति ‘ देकर लन्दन बुलवा लिया था।
इंग्लैण्ड प्रवास

विनायक सावरकर सन् 1906 को मुम्बई से इंग्लैण्ड रवाना हुए । इंग्लैण्ड में उनके ‘ इंडिया हाउस ‘ में रहने की व्यवस्था की गई ।
उसी वर्ष सावरकर जी ने ‘ फ्री इंडिया सोसायटी ‘ की स्थापना कर इंग्लैण्ड में रहकर विद्याध्ययन कर रहे भारतीय छात्रों को संगठित करना शुरू कर दिया । सेनापति बापट , लाला हरदयाल , वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय , भाई परमानन्द , मदनलाल ढींगरा , कोरेगांव
हरनामसिंह आदि ‘ फ्री इंडिया सोसायटी ‘ , से जुड़ते चले गए । सावरकर जी को लोकमान्य तिलक ने प्रेरित किया था कि वे लन्दन की लायब्रेरी में दस्तावेजों का गहन अध्ययन कर 1857 के प्रथम भारतीय स्वातंत्र्य समर पर प्रामाणिक इतिहास लिंखे ।
एक ओर सावरकर जी ने लन्दन विश्वविद्यालय में कानून के अध्ययन के लिये प्रवेश लिया हुआ था , दूसरी ओर वे अपना अधिकांश समय लंदन में रहकर शिक्षा प्राप्त करने वाले भारतीय युवकों में राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न करने के राष्ट्रीय कार्य में सक्रिय थे । ब्रिटिश लायब्रेरी में बैठकर दस्तावेजों का गहन अध्ययन करके उन्होंने इटली के क्रांतिकारी मैजिनी का जीवन चरित्र लिखा । उन्होंने सिखों का स्फूर्तिदायक इतिहास लिखा । भारत में 1857 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध हुए सैनिक विद्रोह के महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों का अध्ययन कर उन्होंने 1857 का प्रथम स्वातन्त्र्य समर ‘ नाम से एक ऐतिहासिक व अनूठे ग्रंथ की रचना
की ।
ग्रंथ जब्त किया गया

ब्रिटेन के शासकों को जब इस बात का पता चला कि विनायक सावरकर इस ग्रंथ के माध्यम से भयंकर विस्फोट करने वाले हैं तो इस ग्रंथ को प्रकाशित होने से पूर्व जब्त कर लेने के आदेश दिए गए । सावरकर जी ने बड़ी कुशलता के साथ ग्रंथ की पाण्डुलिपि गुप्तरूप से भारत भेज देने में सफलता प्राप्त की । जब यह ऐतिहासिक ग्रंथ गुप्त रूप से मराठी भाषा से अंग्रेजी में अनुवाद कराकर प्रकाशित हुआ तो पूरे संसार में तहलका मच गया । इस ग्रंथ ने यह सिद्ध किया कि भारत की छावनियों में हिन्दुस्तानी सैनिकों के द्वारा 1857 में की गई क्रांति ‘ गदर ‘ या ‘ विद्रोह ‘ नहीं अपितु भारत की स्वाधीनता का पहला सशस्त्र संग्राम था ।
सावरकर जी द्वारा लिखित इस ग्रंथ का दूसरा संस्करण लाला हरदयाल आदि राष्ट्रभक्तों ने विदेशों में प्रकाशित करा कर भारतीय स्वाधीनता के पक्ष में वातावरण बनाया था । ग्रंथ का तीसरा संस्करण शहीदे आजम सरदार भगतसिंह आदि ने लाहौर में किस प्रकार प्रकाशित कराया इसका इतिहास बहुत रोचक है ।
युवक सावरकर अंग्रेजों के गढ़ ब्रिटेन में सक्रिय रहकर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दे रहे थे । ‘ इंण्डिया हाउस ‘ उनके तेजस्वी व्यक्तित्व के कारण भारतीय युवकों के आकर्षण का केन्द्र बन चुका था ।
‘ 1857 का स्वातन्त्र्य समर , ग्रंथ ने पूरे संसार में भारत की स्वाधीनता के पक्ष में वातावरण बनाना शुरू कर दिया था । इसी बीच सन् 1907 में विनायक सावरकर ने अपने युवा सहयोगियों के साथ ‘ इंण्डिया हाउस ‘ ( लन्दन ) में 1857 के स्वातन्त्र्य समर की अर्ध शताब्दी मनाकर एक प्रकार से विस्फोट ही कर डाला । ‘ अभिनव भारत ‘ के तत्त्वावधान में इंग्लैण्ड में आयोजित समारोहों में झांसी की वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई , मंगल पाण्डे , तात्या टोपे , बिहार केसरी कुँवरसिंह आदि बलिदानियों को श्रद्धांजलियाँ अर्पित की गईं तो ब्रिटिश साम्राज्य एक बार तो काँप ही उठा ।
लन्दन में गुप्तचर पुलिस सावरकर जी तथा उनके साथियों का पीछा करने लगी । ‘ इंडिया हाउस ‘ पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी ।

ढींगरा को प्रेरणा

इसी दौरान मदनलाल ढींगरा नामक पंजाबी भारतीय युवक सावरकर जी के भाषण से प्रभावित होकर उनके पास पहुंचा । उसने उनके समक्ष अपना सर्वस्व मातृभूमि ( भारत ) के चरणों में समर्पित करने का संकल्प लिया । मदनलाल अंग्रेजों द्वारा भारत में किए जा रहे अत्याचारों से अत्यन्त क्षुब्ध था । उसका यौवन मातृभूमि को परतंत्र बनाए रखने या भारतीयों पर अत्याचार करने वाले अंग्रेज शासकों से प्रतिशोध लेने के लिए मचल रहा था ।
1 जुलाई सन् 1909 को लन्दन के इम्पीरियल इंस्टीट्यूट के जहांगीर हाल में एक समारोह था । अनेक अंग्रेज शासक प्रशासक उस समारोह में उपस्थित थे । अचानक मदनलाल वहां पहुंचा तथा उस युवा भारतीय स्वाभिमानी ने सर करजन वायली नामक अंग्रेज उच्चाधिकारी को गोलियों से भून डाला । एक हिन्दुस्तानी युवक के इस साहस और शौर्य को देखकर भगदड़ मच गई । मदनलाल को रिवाल्वर सहित कब्जे में ले लिया गया । उसे हत्या के आरोप में जेल भेज दिया गया ।
गुप्तचर पुलिस ने उसे पहचान लिया कि यह प्रायः ‘ इंडिया हाउस ‘ जाकर सावरकर जी से मिला करता था ।
इंग्लैण्ड में उन दिनों जहां एक ओर राष्ट्रभक्त भारतीय युवक सक्रिय थे वहीं सुविधाभोगी अंग्रेजपरस्त भारतीय व्यापारी भी वहाँ अंग्रेज बहादुरों को प्रसन्न करने के अवसर से नहीं चूकते थे ।
करजन वायली की हत्या की निन्दा करने के लिए इन भारतीयों ने सर आगाखां की अध्यक्षता में एक शोकसभा का आयोजन किया ।
जैसे ही आगाखां ने शोक प्रस्ताव पेश करते हुए कहा- ‘ मैं एक हिन्दुस्तानी आतंकवादी युवक के इस हिंसक कार्य की सर्वसम्मत निन्दा करता हूं ‘ कि सभा में चुपचाप बैठे सावरकर खड़े हो गए तथा जोर से बोले- ‘ सर्वसम्मति से नहीं । मैं प्रस्ताव का विरोध करता हूं । ‘ विनायक सावरकर की निर्भीकता तथा तेजस्विता को देखकर अंग्रेज भक्त भारतीयों के चेहरे पीले पड़ गए । सभा में निन्दा प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया ।
सर करजन वायली की हत्या के आरोप में 16 अगस्त 1909 को मदनलाल ढींगरा को फांसी दे दी गयी । ब्रिटिश पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा ‘ हत्या की प्रेरणा मदनलाल को सावरकर ने दी थी । वे हत्याएं कराकर आतंक फैलाना चाहते हैं । ‘
उधर विनायक सावरकर अंग्रेजों के गढ़ लन्दन को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाकर ब्रिटिश शासन की नाकों में दम किए हुए थे , इधर भारत में उनके बड़े – भ्राता गणेश दामोदर सावरकर क्रांतिकारी गतिविधियों में संलग्न थे ।

दोनों भाई जेल

में क्रांतिकारी युवकों ने पुणे में जिलाधीश मि . रैण्ड की गोली मार कर हत्या कर दी । नासिक के जिलाधीश मि . जैक्सन को नासिक में 19 अप्रैल 1909 को विदाई दी जा चुकी श्री गणेश दामोदर सावरकर डॉ . नारायण दामोदर सावरकर थी कि 16 वर्षीय किशोर कान्हरे ने उसे गोलियों से भून डाला । आरोप लगाया गया कि कान्हरे ने जिस पिस्तौल से हत्या की है वह लन्दन से गुप्त रूप से सावरकर जी ने भारत भेजी थी । श्री गणेश सावरकर को राजद्रोह के षड्यंत्र का आरोप लगाकर 20 वर्ष की सजा देकर जेल भेज दिया गया । कुछ ही दिन बाद विनायक सावरकर जी के छोटे भाई नारायण सावरकर को भी क्रांतिकारी गतिविधियों के आरोप में जेल भेज दिया गया ।
जब दोनों भाइयों के जेल जाने का समाचार लन्दन पहुंचा तो विनायक सावरकर ने अपनी पूज्या भाभी जी को पत्र में गर्व व्यक्त करते हुए लिखा :-
” तरी जें गजेन्द्र शुन्डे ने उपटिलें ,
श्री हरि साठी नेलें ।
कमल फूल तें अमर ठेले ,
मोक्षदातें पावन ॥ ”
अनेक कमल पुष्प उत्पन्न होते हैं और मुरझा समाप्त हो जाते हैं । उनकी कहीं गिनती नहीं होती , किन्तु हाथी की सूंड द्वारा भगवान् ( श्री हरि ) के श्रीचरणों में समर्पित किया गया कमल पुष्प अमर हो जाता है , सार्थक हो जाता है । इसी प्रकार हम तीनों भाई ( सावरकर – बन्धु ) भगवान् श्रीहरि ( मातृभूमि ) के चरणों में समर्पित होकर अमर हो जाएंगे । ‘
विनायक सावरकर के विरुद्ध अनेक गंभीर आरोप लगाकर 13 मार्च 1910 को लन्दन में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । उन पर लन्दन में सक्रिय रहकर हिन्दुस्तानी युवकों को हिंसा व हत्या के लिए प्रेरित करने , ब्रिटिश प्रभुसत्ता को चुनौती देने , अवैध शस्त्रास्त्र गुप्त रूप से संग्रहीत कर , उन्हें भारत भिजवाकर हत्याएं कराने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए ।
लन्दन की अदालत ने सावरकर को भारत ले जाकर वहीं मुकदमा चलाने का आदेश दिया ।

समुद्र में कूद पड़े

सावरकरजी को पानी के जहाज से भारत लाया जा रहा था । वे जानते थे कि उन्हें या तो फांसी पर चढ़ाया जाएगा या आजीवन जेल में तिल – तिल करके मरने के लिए बन्द कर दिया जाएगा । अतः उन्होंने एक बार गोरों के बन्धन से मुक्त होने के प्रयास की योजना बना ली ।
जलयान जैसे ही 8 जुलाई 1910 को फ्रांस की सीमा पास मार्सेल बन्दरगाह के निकट से गुजरा कि सावरकर शौच के बहाने पाखाना गए तथा पोर्टहाल के जंगले से समुद्र में कूद पड़े । वे तैरते हुए समुद्र तट की ओर बढ़ने लगे । जहाज से उन पर गोलियां भी चलाईं गईं किन्तु वे बचकर किनारे तक पहुंचने में सफल हो गए ।
फ्रांसीसी सिपाहियों ने उन्हें पकड़कर जहाज के सुरक्षाकर्मी गोरों को सौंप दिया । विनायक सावरकर के जलयान से समुद्र में कूद कर फ्रांस तक पहुंच जाने की शौर्य व साहस की घटना से पूरा विश्व स्तब्ध रह गया ।
सावरकर जी पर लगाए गए आरोपों की मुम्बई में गठित विशेष न्यायाधिकरण ने सुनवाई की । 31 जनवरी 1911 को उन्हें दो आजन्म करावासों का दण्ड सुना दिया गया । युवा सावरकर ने अंग्रेज न्यायाधीश को दो आजन्म कारावासों का दण्ड सुनाते ही व्यंग्य ‘ मुझे प्रसन्नता है कि ईसाई ( ब्रिटिश सरकार ने मुझे दो जन्मों के कारावास का दण्ड देकर हिन्दूधर्म के पुनर्जन्म के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया है ।
विनायक सावरकर को डोगरी की जेल में रखा गया । उनकी 19 वर्षीय पत्नी श्रीमती यमुनाबाई ने जेल की सलाखों के पीछे अपने पति को देखा तो वे भावविव्हल हो उठीं ।
सावरकर ने अपनी पत्नी को सांत्वना देते हुए कहा- ” यदि बेटे – बेटियों को पैदा कर घर में रहना ही जीवन की सार्थकता है तो चार तिनके ( लकड़ियां ) जमा करके ऐसा घर कौवे चिड़ियां भी बसाते हैं । किन्तु यदि मानव जीवन को सार्थक बनाना है तो हम तीनों भाइयों ने अपनी मातृभूमि के प्रति कर्त्तव्य पालन के लिए अपना जीवन समर्पित कर उसे सार्थक बना लिया है ।
” सुखी संसार की कल्पना करने वाले अनेक लोग प्लेग के शिकार बनकर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं उनका घर बेचिराग हो जाता है । काल कई बार तो विवाह मंडप तक से पति – पत्नी को दबोचकर ले जाता है । अतः मातृभूमि के लिए हमारा समर्पण देखकर धैर्य से जीवन बिताओ । एक दिन पुनः हम साथ रहेंगे ऐसा विचारो । ”
डोगरी तथा भयाखला जेल में रखे जाने के बाद उन्हें ठाणे जेल भेजा गया । एक दिन जेल के बार्डर ने उन्हें गुप्त रूप से बताया कि आपके छोटे भाई नारायण सावरकर जी भी इसी जेल में बन्द हैं । 20 वर्षीय नारायण को लार्ड मिन्टो पर बम फेंकने के षड्यन्त्र के आरोप में गिरफ्तार किया गया था । अपने छोटे भाई के भी जेल में बन्द होने का समाचार मिलते ही वे भावविभोर हो उठे ।
ब्रिटिश अधिकारियों को पता चला कि यहाँ की जेलों में रहकर भी सावरकर गुप्त रूप से अपने साथियों से सम्पर्क बनाने में सफल होते जा रहे हैं । अन्त में उन्हें कालापानी ( अण्डमान ) भेजने के आदेश दिए गए ।
सावरकर जी को दो आजन्म कारावासों का दण्ड देकर अंग्रेज सरकार ने कालापानी की कालकोठरी में एकान्त में अमानवीय यातनाएं सहन करते करते मृत्यु के आगोश में चले जाने के उद्देश्य से 27 जून 1911 को ‘ महाराजा ‘ जलपोत में एक पिंजड़े में बन्द करके अण्डमान के लिए रवाना किया गया ।
वे 4 जुलाई को अण्डमान पहुंचे । अण्डमान जेल अंग्रेजों ने खंख्वार कैदियों को रखने के लिए बनवाई थी । उन्हें जेल की तीसरी मंजिल की सात नम्बर बैरक में बन्द कर दिया गया ।
(वीर सावरकर चरित्र हनन की घिनौनी साजिश शिवकुमार गोयल की पुस्तक से साभार)

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