वैदिक संस्कृति में यज्ञोपवीत का महत्व

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◼️ यज्ञोपवीत का महत्व ◼️
✍🏻 लेखक – डॉ. भवानीलाल भारतीय
प्रत्येक जाति में शरीर , मन , बुद्धि और आत्मा की शुद्धि तथा विकास के लिये विभिन्न प्रकार के संस्कारों का विधान किया जाता है । संसार की सर्व प्राचीन और सर्वाधिक सभ्य एवं सुसंस्कृत आर्य जाति ने भी अपने प्रत्येक सदस्य के लिये जिन संस्कारों की व्यवस्था की है , उनमें यज्ञोपवीत का विशेष महत्व है । मनुष्य की योनि अन्य प्राणियों की अपेक्षा श्रेष्ठ मानी गई है क्योंकि कर्त्तव्य तथा धर्म के प्रति मनुष्य में जैसी उत्तरदायित्व की भावना पाई जाती है वैसी अन्य प्राणियों में नहीं मिलती । संसार में जन्म लेते ही मनुष्य अनेक ऋणों से बन्ध जाता है । उसका प्रथम ऋण तो जन्मदाता माता पिता के प्रति होता है जिन्होंने उसे जन्म दिया है । यज्ञोपवीत का प्रथम सूत्र इसे धारण करने वाले को पितृ ऋण का सदा स्मरण कराता है । यज्ञोपवीत ग्रहण करते समय हमें यह ध्यान रखना होगा कि जिन माता पिता ने हमें जन्म दिया है हम उनकी सेवा करें तथा उनके द्वारा बताये गये आदर्शों पर चलें ।
यज्ञोपवीत का द्वितीय सूत्र आचार्य ऋण से उऋण होने की सूचना देता है । यद्यपि हमारा स्थूल शरीर हमारे माता पिता द्वारा प्रदत्त है , किन्तु जिस आचार्य के चरणों में बैठकर हमने विद्याभ्यास किया है , अपने बौद्धिक ज्ञान की वृद्धि की है तथा विभिन्न शास्त्रों का ज्ञानोपार्जन किया है , उस आचार्य के ऋण से उऋण होना भी हमारा कर्त्तव्य है । भारतीय संस्कृति में आचार्य को सदा सम्मान की दृष्टि से देखा गया है । यदि भगवान् राम को महर्षि वसिष्ठ और विश्वामित्र जैसे गुरुओं का मार्गदर्शन प्राप्त नहीं होता तो वे स्वकर्त्तव्यों का पालन करने में असमर्थ ही रहते । इसी प्रकार योगेश्वर कृष्ण के गुरु आचार्य सान्दीपनि , आर्य साम्राज्य के संस्थापक सम्राट चन्द्रगुप्त के गुरु आचार्य चाणक्य तथा हिन्दूपदपादशाही के आदर्श को क्रियान्वित करने वाले शिवाजी महाराज के गुरु समर्थ स्वामी रामदास जैसे आचार्यों ने आर्य सस्कृति को सदा जीवित रक्खा है । इस युग के महान् युगपुरुष स्वामी दयानन्द ने अपने आचार्य दण्डी विरजानन्द के ऋण से उऋण होने के लिये ही अपने जीवन की आहुति दे दी थी और धर्म , समाज तथा राष्ट्र में अपूर्व क्रान्ति उत्पन्न की ।
यज्ञोपवीत का तृतीय धागा उन पुरातन ऋषियों के ऋण से उऋण होने का संकेत देता है जिन्होने वेद मन्त्रों में निहित तत्त्वों का अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा साक्षात्कार किया था और जो धर्म के स्वरूप को जानते थे । संसार के हित के लिये परमात्मा द्वारा प्रदत्त वैदिक ज्ञान को संसार में सर्वत्र फैलाने का कार्य इन साक्षात्कृत धर्मा मन्त्र दृष्टा ऋषियों ने ही किया था । गोतम , कपिल , कणाद . व्यास , जैमिनि , पतंजलि , वसिष्ठ , विश्वामित्र , कश्यप , भरद्वाज , अत्रि , नारद आदि सहस्रों ऋषियों ने मनुष्य जाति के हित के लिये ज्ञान की जिस प्रखर ज्योति को जलाया और उसे आज तक प्रज्वलित किये रक्खा , उसे आगे भी इसी प्रकार उदीप्त रखने की प्रतिज्ञा जब यज्ञोपवीत धारी ब्रह्मचारी ग्रहण करता है तो ऋषि ऋण से उऋण होने का विनम्र प्रयास ही करता है ।
आर्य जाति की सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य को द्विज कहा गया है । इसका अभिप्राय यह है कि यदि मनुष्य का एक जन्म उसकी माता के गर्भ से होता है तो वह अपने आचार्य के समीप उपस्थित होकर तथा उपनयन संस्कारित होकर एक नया जन्म ग्रहण कर लेता है । इस संस्कार के बाद ही उसे द्विज की संज्ञा प्राप्त होती है । किन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं कि इन्हीं तीन वणों के बालकों को यज्ञोपवीत ग्रहण करने का अधिकार है । अधिकार तो सभी को है क्योंकि यज्ञोपवीत ग्रहण करने के पश्चात ही उसके बौद्धिक और मानसिक विकास की प्रक्रिया प्रारम्भ होती थी ।
मध्यकाल में यज्ञोपवीत का प्रचलन समाज के कुछ वर्गों तक ही सीमित रह गया । अनेक जातियों में तो विवाह के एक दिन पूर्व ही यज्ञोपवीत का विधान किया जाने लगा जब कि यज्ञोपवीत और वेदारम्भ दोनों संस्कार युगपत् अर्थात् एक के बाद एक होने चाहिए । स्त्रियों और शूद्रों को यज्ञोपवीत का अनधिकारी माना गया जब कि पुरातन इतिहास से यह प्रमाणित होता है कि उस युग में नारियां भी व्रतबन्ध ( यज्ञोपवीत ) ग्रहण करती थीं । आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य की सर्वागीण उन्नति के प्रतीक यज्ञोपवीत संस्कार का पुन : प्रचार हो ताकि हम अपनी सर्वविध उन्नति के प्रति सचेत होकर आर्योंचित कर्त्तव्य कर्मों का पालन कर सकें ।
यज्ञोपवीत के सम्बन्ध में प्राचीन कर्मकाण्ड ग्रन्थों में जो मन्त्र उपलब्ध होते हैं , वे हैं इस प्रकार है –
🔥 यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतिर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
🔥 आयुष्यमग्रयं प्रतिमुङच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेज: ।
🔥 यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्यत्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि ।
( पारस्कर गृहह्मसूत्र २ – २ – ११ )
इस मन्त्र में यज्ञोपवीत को परम पवित्र बताया गया है , जिसका अभिप्राय है कि प्रत्येक के लिये अवश्य धारण करने योग्य है । स्वकर्त्तव्यों के प्रति प्रेरणा करने वाला होने के कारण इसे पवित्र मानना तो उचित ही है । वस्तुतः इस यज्ञोपवीत को प्रजापति परमात्मा ने ही उत्पन्न किया है । अभिप्राय यह है कि मनुष्यों को आदि सृष्टि में स्वकर्त्तव्यों पालन का उपदेश देने वाला स्वयं परमात्मा ही था और यज्ञोपवीत के ये तीन तार उसके पितृ , आचार्य तथा ऋषि ऋण से उऋण होने के ही प्रतीक हैं । यह शुभ्र स्वच्छ और पवित्र यज्ञोपवीत धारण करने वाले की आयु , बल तथा तेज को बढ़ाता है । पुन : प्रतिज्ञा करते हुए ग्रहण करने वाला कहता है कि मैं तुझे यज्ञ की मर्यादा का पालन इसे करने के प्रतीक के रूप में बांधता हूं । उपर्युक्त मन्त्रों के आधार पर हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि इस सूत्र को धारण करने वाले को सदा यत्न करना चाहिए कि उसका जीवन पवित्र बने । वह मनसा , वाचा , कर्मणा एक हो तथा प्रत्येक प्रकार के दुष्कर्मों से बचता रहे ।
जो व्यक्ति ब्रह्मचर्याश्रम का आरम्भ ही यज्ञोपवीत धारण के साथ करता है वह इस प्रथम आश्रम में तो अपना सम्पूर्ण समय वेदादि शास्त्रों के पठन , पाठन , श्रवण , मनन और चिन्तन में लगाता है , आगे चलकर उसका गृहस्थ जीवन भी संयम और आर्योंचित जीवनादर्शों से परिपूर्ण होता है । ऐसा संयम शील व्यक्ति अपने शारीरिक , मानसिक , बौद्धिक तथा आत्मिक बल की अभिवृद्धि के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहता है । अत : उसे दीर्घजीवन की प्राप्ति होती है और तृतीय वानप्रस्थाश्रम में भी वह यज्ञोपवीत ग्रहण के समय लिये गये व्रतों का स्मरण करते हुए स्वयं को लोकोपकार तथा जनशिक्षण के लिये समर्पित कर देता है । किन्तु जब वह संसार के सभी बन्धनों और परिग्रहों का त्याग कर पूर्ण वैराग्य भाव तथा सार के कल्याण एवं हित चिन्तन की भावना से सन्यास ग्रहण करता है तो उसे इस बाह्य प्रतीक की आवश्यकता नहीं रहती । इस स्थिति में वह शिखा और सूत्र का विसर्जन कर देता है ।
यज्ञोपवीत के सम्बन्ध में कुछ पालन करने योग्य नियम इस प्रकार हैं –
◼️ १ . स्वयं को आर्य तथा द्विज मानने वाले व्यक्ति को जनेऊ अवश्य धारण करना चाहिए । यह हमारे कर्तव्यों का बोधक तो है ही , प्राचीनतम आर्य संस्कृति का चिन्ह भी है । इसको रक्षा के लिये हमारे पूर्वजों ने अनेक त्याग और बलिदान किये हैं ।
◼️ २ . प्रत्येक व्यक्ति को एक समय में तीन तार का एक ही यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए । अनेक लोग सूत्रों के छ : धागों का जनेऊ पहनते हैं , यह शास्त्रों के आदेश के विपरीत है । कई लोगों की धारणा है कि वे अपनी पत्नी के बदले स्वयं छ तारों वाला जनेऊ पहनते हैं । ऐसे लोगों से पूछना चाहिए कि वे अपनी अर्धागिनी के इस अधिकार को छीन कर क्या अनुचित आचरण नहीं कर रहे हैं । प्राचीन काल में नारियाँ भी पुरुषों की भांति यज्ञोपवीत धारण करती थीं । इसके अनेक शास्त्रीय और ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध होते हैं ।
◼️ ३ . यज्ञोपवीत का ग्रहण यज्ञ में दीक्षित होने के पहले की क्रिया है । अत : यज्ञोपवीत धारी को ही यज्ञ करने और कराने का अधिकार प्राप्त है । प्राय : देखा जाता है कि गृह्य कर्मों और संस्कारों में यज्ञोपवीत बिना धारण किये ही यजमान आसनों पर आकर बैठ जाते हैं , अथवा उन्हें आसन पर बिठाकर अस्थायी रूप से उनके कन्धे पर जनेऊ डाल दिया जाता है , जिसे यज्ञ से निवृत्त होकर वे उतार फेंकते हैं । इस प्रकार के अस्थायी यज्ञोपवीत धारण करने का विधान किसी शास्त्र में उपलब्ध नहीं होता । आचार्य और पुरोहित को यज्ञोपवीत ग्रहण कराने से पूर्व यजमान को यह संकल्प कराना चाहिए और उससे वचन लेना चाहिए कि वह इस पवित्र चिन्ह कोक भी त्यागेगा नहीं । कर्मकाण्ड में अस्थायी व्यवस्था नहीं होती ।
◼️ ४ . यज्ञोपवीत के तीन तार निम्न त्रित्व के प्रतीक कहे जा सकते
( अ ) इसे धारण करने वाले का अपने परिवार , समाज और राष्ट्र के प्रति भी उत्तरदायित्व है । उसे इनके विकास में योगदान करना चाहिए ।
( आ ) देव , ऋषि और विद्वानों का सत्कार अवश्य कर्तव्य है ।
( इ ) यज्ञोपवीत धारी मानसिक विचारों , हृदय में उत्पन्न अनुभूतियों तथा बाह्य कर्मों की शुद्धि और पवित्रता को सदा वरीयता प्रदान करे ।
( ई ) ईश्वर , जीव और प्रकृति इन तीन अनादि तत्वों के प्रति मनुष्य अपने कर्तव्य का पूरा पालन करे । वह प्राकृतिक पदाथों का उचित उपयोग लेवे , अन्य जीवों की कल्याण कामना करता हुआ स्वयं की आत्मा को उन्नत बनाये तथा अपने विधाता ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति में कभी न्यूनता न आने दे ।
( उ ) जनेऊ को स्वच्छ रखना , गन्दगी और अपवित्रता से बचाना आवश्यक है ।
( ऊ ) मल – मूत्र विसर्जन के समय इसे कान पर टांगना इस लिये आवश्यक है ताकि वह शरीर के अधो भाग तक न जावे और अपवित्र न हो । इसका इतना ही महत्व है ।
✍🏻 लेखक – डाँ. भवानीलाल भारतीय

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