शिव पुराण की पार्वती से रामायण की सीता तक का पतिव्रत धर्म की विवेचना

images (76)


आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी

शिव पुराण के रुद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड के अध्याय 54 में राजा हिमवान की पत्नी मेना की इच्छा के अनुसार एक ब्राह्मण-पत्नी द्वारा शिव पार्वती विवाह के उपरान्त पार्वती जी को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिलाया गया है। इसी को बाद में तुलसी दास जी ने राम चरित मानस में माता अनसूया द्वारा सीता जी को भी सुनाया गया है। यहां शिव पुराण के वर्णन को आधार बनाया गया है। वर्तमान समय के माताए और बहन बेटियां यदि इसका अनुसरण करेंगी तो उनका लौकिक और पारलौकिक दोनों जीवन में पूर्णता आएगी।
आगामी दिनों में कजरी तीज हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला खास त्योहार है जिस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। महिलाएं इस दिन अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं और भोलेनाथ-पार्वती माता से घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने की मनोकामना करती हैं। इसलिए पार्वती और सीता का आदर्श गृहणियों के लिए बहुत उपयोगी और सम सामयिक है।
शिव पार्वती विवाह के उपरान्त ब्रह्मा जी कहते हैं-
नारद ! तदनन्तर सप्तर्षियों ने हिमालय से कहा-‘गिरिराज ! अब आप अपनी पुत्री पार्वती देवी की यात्रा का उचित प्रबन्ध करें।’ मुनीश्वर! यह सुनकर पार्वती के भावी विरह का अनुभव करके गिरिराज कुछ काल तक अधिक प्रेम के कारण विषाद में डूबे रह गये। कुछ देर बाद सचेत हो शैलराज ने ‘तथास्तु’ कहकर मेना को संदेश दिया। मुने! हिमवान् का संदेश पाकर हर्ष और शोक के वशीभूत हुई मेना पार्वती को विदा करने के लिये उद्यत हुईं।
शैलराजकी प्यारी पत्नी मेनाने विधिपूर्वक वैदिक एवं लौकिक कुलाचार का पालन किया और उस समय नाना प्रकार के उत्सव
मनाये। फिर उन्होंने नाना प्रकार के रत्नजटित सुन्दर वस्त्रों और बारह आभूषणों द्वारा राजोचित श्रृंगार करके पार्वती को विभूषित
किया। तत्पश्चात् मेना के मनोभाव को जानकर एक सती-साध्वी ब्राह्मण पत्नी ने गिरिजा को उत्तम पातिव्रत्य की शिक्षा दी।
ब्राह्मण पत्नी बोली-गिरिराज किशोरी! तुम प्रेमपूर्वक मेरा यह वचन सुनो। यह धर्म को बढ़ानेवाला, इहलोक और परलोक में
भी आनन्द देने वाला तथा श्रोताओं को भी सुख की प्राप्ति कराने वाला है। संसार में पतिव्रता नारी ही धन्य है, दूसरी नहीं। वही विशेष रूपसे पूजनीय है। पतिव्रता सब लोगों को पवित्र करने वाली और समस्त पाप राशि को नष्ट कर देने वाली है। शिवे!
जो पति को परमेश्वर के समान मानकर प्रेम से उसकी सेवा करती है, वह इस लोक में सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करके अन्त में कल्याणमयी गतिको पाती है। सावित्री,लोपामुद्रा, अरुन्धती, शाण्डिली, शतरूपा,अनसूया, लक्ष्मी, स्वधा, सती, संज्ञा, सुमति,
श्रद्धा, मेना और स्वाहा-ये तथा और भी बहुत-सी स्त्रियाँ साध्वी कही गयी हैं। यहाँ विस्तार भय से उनका नाम नहीं लिया गया।
वे अपने पातिव्रत्य के बलसे ही सब लोगों की पूजनीया तथा ब्रह्मा, विष्णु, शिव एवं मुनीश्वरों की भी माननीया हो गयी हैं। इसलिये तुम्हें अपने पति भगवान् शंकरकी सदा सेवा करनी चाहिये। वे दीनदयालु, सबके सेवनीय और सत्पुरुषों के आश्रय हैं। श्रुतियों और स्मृतियोंमें पातिव्रत्यधर्मको महान् बताया गया है। इसको जैसा श्रेष्ठ बताया जाता है, वैसा दूसरा धर्म नहीं है-यह निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है।
पातिव्रत्य-धर्ममें तत्पर रहने वाली स्त्री अपने प्रिय पति के भोजन कर लेने पर ही भोजन करे। शिवे! जब पति खड़ा हो, तब साध्वी स्त्री को भी खड़ी ही रहनी चाहिये। शुद्धबुद्धि वाली साध्वी स्त्री प्रतिदिन अपने पति के सो जाने पर सोये और उसके जागने से पहले ही जग जाय। वह छल-कपट छोड़ कर सदा उसके लिये हितकर कार्य ही करे। शिवे! साध्वी स्त्री को चाहिये कि जबतक वस्त्रा भूषणोंसे विभूषित न होले तब तक वह अपने को पति की दृष्टि के सम्मुख न लाये। यदि पति किसी कार्य से परदेश में गया हो तो उन दिनों उसे कदापि श्रृंगार नहीं करना चाहिये। पतिव्रता स्त्री कभी पतिका नाम न ले। पति के कटु वचन कहने पर भी वह बदले में कड़ी बात न कहे। पति के बुलाने पर वह घर के सारे
कार्य छोड़कर तुरंत उसके पास चली जाय और हाथ जोड़ प्रेम से मस्तक झुकाकर पूछे-‘नाथ! किसलिये इस दासी को बुलाया है? मुझे सेवाके लिये आदेश देकर अपनी कृपा से अनुगृहीत कीजिये।’ फिर पति जो आदेश दे, उसका वह प्रसन्न हृदय से पालन करे। वह घरके दरवाजे पर देरतक खड़ी न रहे। दूसरेके घर न जाय। कोई गोपनीय बात जानकर हर एक के सामने उसे प्रकाशित न करे पति के बिना कहे ही उनके लिये पूजन-सामग्री स्वयं जुटा दे तथा उनके हितसाधन के यथोचित अवसर की प्रतीक्षा करती रहे। पति की आज्ञा लिये बिना कहीं तीर्थयात्रा के लिये भी न जाय। लोगों की भीड़ से भरी हुई सभा या मेले आदिके उत्सवों का देखना वह दूरसे ही त्याग दे। जिस नारी को तीर्थ यात्रा का फल पानेकी इच्छा हो, उसे अपने पति का चरणोदक पीना चाहिये। उसके लिये उसीमें सारे तीर्थ और क्षेत्र हैं, इसमें संशय नहीं है।
पतिव्रता नारी पतिके उच्छिष्ट अन्न आदिको परम प्रिय भोजन मानकर ग्रहण करे और पति जो कुछ दे, उसे महाप्रसाद मानकर
शिरोधार्य करे। देवता, पितर, अतिथि, सेवकवर्ग, गौ तथा भिक्षु समुदाय के लिये अन्नका भाग दिये बिना कदापि भोजन न करे। पातिव्रत- धर्म में तत्पर रहनेवाली गृहदेवी को चाहिये कि वह घर की सामग्रीको संयत एवं सुरक्षित रखे। गृहकार्यमें कुशल हो, सदा प्रसन्न रहे। और खर्चकी ओरसे हाथ खींचे रहे। पतिकी
आज्ञा लिये बिना उपवासव्रत आदि न करे, अन्यथा उसे उसका कोई फल नहीं मिलता और वह परलोकमें नरकगामिनी होती है।
पति सुखपूर्वक बैठा हो या इच्छानुसार क्रीडा विनोद अथवा मनोरंजन में लगा हो, उस अवस्थामें कोई आन्तरिक कार्य आ
पड़े तो भी पतिव्रता स्त्री अपने पतिको कदापि न उठाये। पति नपुंसक हो गया हो, दुर्गति में पड़ा हो, रोगी हो, बूढ़ा हो, सुखी हो
अथवा दुःखी हो, किसी भी दशामें नारी अपने उस एकमात्र पतिका उल्लंघन न करे। रजस्वला होनेपर वह तीन रात्रि तक पति को अपना मुँह न दिखाये अर्थात् उससे अलग रहे। जबतक स्नान करके शुद्ध न हो जाय, तब तक अपनी कोई बात भी वह पति के कानों में न पड़ने दे। अच्छी तरह स्नान करने के पश्चात् सबसे पहले वह अपने पतिके मुख का दर्शन करे, दूसरे किसी का मुँह कदापि न देखे अथवा मन-ही-मन पतिका चिन्तन करके सूर्य का दर्शन करे। पति की आयु बढ़ने की अभिलाषा रखने वाली पतिव्रता नारी हल्दी, रोली, सिन्दूर, काजल आदि;चोली, पान, मांगलिक आभूषण आदि; केशों का सँवारना, चोटी गूँथना तथा हाथ- कान के आभूषण-इन सबको अपने शरीर से दूर न करे। धोबिन, छिनाल या कुलटा, संन्यासिनी और भाग्यहीना स्त्रियोंको वह कभी अपनी सखी न बनाये। पति से द्वेष रखने वाली स्त्रीका वह कभी आदर न करे। कहीं अकेली न खड़ी हो। कभी नंगी होकर न नहाये। सती स्त्री ओखली, मूसल,झाडू, सिल, जाँत और द्वारके चौखट के नीचे वाली लकड़ी पर कभी न बैठे।

मैथुनकाल के सिवा और किसी समय में वह पति के सामने धृष्टता न करे जिस-जिस वस्तुमें पति की रुचि हो, उससे वह स्वयं भी प्रेम करे। पतिव्रता देवी सदा पतिका हित चाहने वाली होती है। वह पति के हर्षमें हर्ष माने। पति के मुख पर विषादकी छाया देख स्वयं भी विषाद में डूब जाय तथा वह प्रियतम पति के प्रति ऐसा बर्ताव करे, जिससे वह उन्हें प्यारी लगे। पुण्यात्मा पतिव्रता स्त्री सम्पत्ति और विपत्तिमें भी पतिके लिये एक-सी रहे। अपने मनमें कभी विकार न आने दे और सदा धैर्य धारण किये रहे। घी, नमक, तेल आदिके समाप्त हो जाने पर भी पतिव्रता स्त्री पतिसे सहसा यह न कहे कि अमुक वस्तु नहीं है। वह पति को कष्ट या चिन्ता में न डाले। देवेश्वरि! पतिव्रता नारीके लिये एकमात्र पति ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव से भी अधिक माना गया है। उसके लिये अपना पति शिवरूप ही है। जो पति की आज्ञाका उल्लंघन करके व्रत और उपवास आदिके नियम का पालन करती है , वह पति की आयु हर लेती है और मरने पर नरक में जाती है। जो स्त्री पति के कुछ कहने पर क्रोध पूर्वक कठोर उत्तर देती है वह गाँवमें कुतिया और निर्जन वनमें सियारिन होती है। नारी पतिसे ऊँचे आसनपर न बैठे, दुष्ट पुरुष के निकट न जाय और पति से कभी कातर वचन न बोले किसी की निन्दा न करे। कलहको दूरसे ही त्याग दे। गुरुजनोंके निकट न तो उच्चस्वरसे बोले और न हँसे। जो बाहरसे पतिको आते देख तुरंत अन्न, जल, भोज्य वस्तु, पान और वस्त्र आदिसे उनकी सेवा करती है, उनके दोनों चरण दबाती है, उनसे मीठे वचन बोलती है तथा प्रियतम के खेद को दूर करने वाले अन्यान्य उपायों से प्रसन्नता पूर्वक उन्हें संतुष्ट करती है, उसने मानो तीनों लोकोंको तृप्त एवं संतुष्ट कर दिया। पिता, भाई और पुत्र सुख देते हैं, परंतु पति असीम सुख देता है। अत: नारी को सदा अपने पति का पूजन- आदर-सत्कार करना चाहिये। पति ही देवता है,पति ही गुरु है और पति ही धर्म, तीर्थ एवं व्रत है; इसलिये सबको छोड़ कर एकमात्र पतिकी ही आराधना करनी चाहिये।जो दुर्बुद्धि नारी अपने पतिको त्याग कर एकान्त में विचरती है ( या व्यभिचार करती है), वह वृक्षके खोखले में शयन करने वाली क्रूर उलूकी होती है। जो पराये पुरुषको कटाक्ष पूर्ण दृष्टिसे देखती है, वह ऐंचातानी देखने वाली होती है। जो पति को छोड़कर अकेले मिठाई खाती है, वह गाँव में सूअरी होती है अथवा बकरी होकर अपनी ही विष्ठा खाती है। जो पति को तू कहकर बोलती है, वह गूँगी होती है। जो सौतसे सदा ईष्ष्या रखती है, वह दुर्भाग्यवती होती है। जो पतिकी आँख बचाकर किसी दूसरे पुरुष पर दृष्टि डालती है , वह कानी, टेढ़े मुँह वाली तथा कुरूपा होती है। जैसे निर्जीव शरीर तत्काल अपवित्र हो जाता है, उसी तरह पतिहीना नारी भलीभाँति स्नान करनेपर भी सदा अपवित्र ही रहती है। लोकमें वह माता धन्य है, वह जन्मदाता पिता धन्य है तथा वह पति भी धन्य है, जिसके घरमें पतिव्रता देवी वास करती है। पतिव्रताके पुण्यसे पिता, माता और पति के कुलों की तीन-तीन पीढ़ियों के लोग स्वर्गलोक में सुख भोगते हैं। जो दुराचारिणी स्त्रियाँ अपना शील भंग कर देती हैं, वे अपने माता-पिता और पति तीनों के कुलोंको नीचे गिराती हैं तथा इस लोक और परलोकमें भी दुःख भोगती हैं। पतिव्रता का पैर जहाँ-जहाँ पृथ्वीका स्पर्श करता है, वहाँ-वहाँ की भूमि पाप हारिणी तथा परम पावन बन जाती है। भगवान् सूर्य, चन्द्रमा तथा वायुदेव भी अपने-आपको पवित्र करनेके लिये ही पतिव्रता का स्पर्श करते हैं और किसी दृष्टिसे नहीं। जल भी सदा पतिव्रता का स्पर्श करना चाहता है। और उसका स्पर्श करके वह अनुभव
करता है कि आज मेरी जडताका नाश हो गया तथा आज मैं दूसरोंको पवित्र करने वाला बन गया। भार्या ही गृहस्थ आश्रमकी जड़ है , भार्या ही सुखका मूल है, भार्यासे ही धर्मके फल की प्राप्ति होती है तथा भार्या ही संतानकी वृद्धिमें कारण है। क्या घर-घरमें अपने रूप और लावण्य- पर गर्व करनेवाली स्त्रियाँ नहीं हैं? परंतु पतिव्रता स्त्री तो विश्वनाथ शिवके प्रति भक्ति होने से ही प्राप्त होती है। भार्यासे इस लोक और परलोक दोनों पर विजय
पायी जा सकती है। भार्या हीन पुरुष देवयज्ञ, पितृयज्ञ और अतिथियज्ञ करनेका अधिकारी नहीं होता। वास्तवमें गृहस्थ वही है, जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री है। दूसरी स्त्री तो पुरुषको उसी तरह अपना ग्रास ( भोग्य) बनाती है, जैसे जरावस्था एवं राक्षसी।
जैसे गंगास्नान करनेसे शरीर पवित्र होता है, उसी प्रकार पतिव्रता स्त्रीका दर्शन करनेपर सब कुछ पावन हो जाता है।पति को ही इष्टदेव मानने वाली सती नारी और गंगामें कोई भेद नहीं है। पतिव्रता और उसके पतिदेव उमा और महेश्वर के समान हैं, अत: विद्वान् मनुष्य उन दोनों का पूजन करे। पति प्रणव है और नारी वेद की ऋचा; पति तप है और स्त्री क्षमा; नारी सत्कर्म है और पति उसका फल। शिवे! सती नारी और उसके पति-दोनों दम्पती
धन्य हैं।
गिरिराजकुमारी! इस प्रकार मैंने तुमसे पतिव्रताधर्मका वर्णन किया है।अब तुम सावधान हो आज मुझसे प्रसन्नता-पूर्वक पतिव्रताके भेदोंका वर्णन सुनो। देवि ! पतिव्रता नारियाँ उत्तमा आदि भेदसे चार प्रकारकी बतायी गयी हैं, जो अपना
स्मरण करनेवाले पुरुषोंका सारा पाप हर लेती हैं। उत्तमा, मध्यमा, निकृष्टा और अतिनिकृष्टा-ये पतिव्रताके चार भेद हैं।
अब मैं इनके लक्षण बताती हूँ। ध्यान देकर सुनो। भद्रे! जिसका मन सदा स्वप्नमें भी अपने पतिको ही देखता है, दूसरे किसी पर पुरुषको नहीं, वह स्त्री उत्तमा या उत्तम श्रेणीकी पतिव्रता कही गयी है।
शैलजे! जो दूसरे पुरुषको उत्तम बुद्धिसे पिता, भाई एवं पुत्रके समान देखती है, उसे मध्यम श्रेणीकी पतिव्रता कहा गया है।
पार्वती! जो मनसे अपने धर्मका विचार करके व्यभिचार नहीं करती, सदाचार में ही स्थित रहती है, उसे निकृष्टा अथवा निम्न श्रेणी की पतिव्रता कहा गया है जो पतिके भयसे तथा कुल में कलंक लगने के डरसे व्यभिचार से बचने का प्रयत्न करती है,
उसे पूर्वकालके विद्वानोंने अतिनिकृष्टा अथवा निम्नतम कोटिकी पतिव्रता बताया है।
शिवे! ये चारों प्रकारकी पतिव्रताएँ समस्त लोकोंका पाप नाश करनेवाली और उन्हें पवित्र बनानेवाली हैं। अत्रिवीकी स्त्री अनसूया ने ब्रह्मा, विष्णु और शिव-इन तीनों देवताओंकी
प्रार्थना से पातिव्रत्य के प्रभावका उपभोग करके वाराह के शाप से मरे हुए एक ब्राह्मणको जीवित कर दिया था। शैलकुमारी शिवे ! ऐसा जानकर तुम्हें नित्य प्रसन्नतापूर्वक पति की सेवा करनी चाहिये। पति सेवन सदा समस्त अभीष्ट फलों को देने वाला है।
तुम साक्षात् जगदम्बा महेश्वरी हो और तुम्हारे पति साक्षात् भगवान् शिव हैं। तुम्हारा तो चिन्तन-मात्र करनेसे स्त्रियाँ पतिव्रता हो जायँगी। देवि! यद्यपि तुम्हारे आगे यह सब कहने का कोई
प्रयोजन नहीं है, तथापि आज लोकाचार का आश्रय ले मैंने तुम्हें सती-धर्मका उपदेश दिया है।
ब्रह्माजी कहते हैं-नारद! ऐसा कहकर वह ब्राह्मण-पत्नी शिवा देवीको मस्तक झुका चुप हो गयी। इस उपदेशको सुनकर
शंकर प्रिया पार्वती देवी को बड़ा हर्ष हुआ।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betnano güncel giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
onwin giriş
onwin giriş
grandpashabet giriş
kolaybet
betgaranti giriş
sahabet
sahabet
marsbahis giriş
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betkanyon
betkanyon
sahabet giriş
betkanyon giriş
betkanyon giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet