वेदों का आविर्भाव कब, कैसे व क्यों हुआ?”

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ओ३म्

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संसार में जितने भी पदार्थ है उनकी उत्पत्ति होती है और उत्पत्ति में कुछ मूल कारण व पदार्थ होते हैं जो अनुत्पन्न वा नित्य होते हैं। इन मूल पदार्थों की उत्पत्ति नहीं होती, वह सदा से विद्यमान रहते हैं। उदाहरण के लिए देखें कि हम चाय पीते हैं तो यह पानी, दुग्ध, चीनी व चायपति से मिलकर बनती है। ईधन, चाय के पात्र आदि इसमें साधारण कारण होते हैं। चाय के लिए आवश्यक सभी पदार्थों को चाय बनाने के कारण पदार्थ कहते हैं। चाय बनाने में प्रयोग की जाने वाली चीनी गन्ने के रस से बनती है। गन्ने को किसान अपने खेतों में उत्पन्न करता है। गन्ने के लिए खेत में गन्ने का बीज बोया जाता है अथवा गन्ने की कलम रोपी जाती है। खेत हमारी सृष्टि का ही एक अंग हैं। यह सृष्टि अणुओं व परमाणुओं से मिलकर बनी है। परमाणु इलेक्ट्रान, प्रोटान व न्यूट्रान आदि कणों से बने हैं। परमाणुओं से पूर्व की स्थिति पर विज्ञान में भी सम्भवतः विचार नहीं किया जाता। परमाणु किस पदार्थ से कैसे बने इसका ज्ञान उपलब्ध नहीं है। अतः परमाणु ही कार्य सृष्टि का मूल पदार्थ है जिससे उत्तरोत्तर कई चरणों में यह समस्त सृष्टि बनी है। दर्शन में सत्, रज व तम गुणों वाली अनादि व नित्य प्रकृति को सृष्टि का मूल कारण बताया गया है। सृष्टि की रचना के समय परमात्मा इस सृष्टि में विक्षोभ उत्पन्न करते हैं। पहला विकार महतत्व व दूसरा अहंकार होता है। यह पूरी प्रक्रिया दर्शन आदि ग्रन्थों में देखी जा सकती है। सृष्टि को बनाने वाली सत्ता ज्ञानवान चेतन सत्ता ही होती है। यह समस्त ब्रह्माण्ड जिसमें असंख्य सूर्य, चन्द्र, पृथिवी व अन्य लोक लोकान्तर आदि हैं, अपने आप नहीं बन सकते और न ही नियमों का पालन करते हुए सूर्य के चारों ओर, अपनी धुरी पर व उपग्रह ग्रह के चारों ओर गति कर सकते हैं। जिस सत्ता ने इस सृष्टि को बनाया है और जो इस सृष्टि को चला रहा है, उसी को परमात्मा व ईश्वर कहते हैं।

सृष्टि की रचना ज्ञानादि नियमों से युक्त एक चेतन सत्ता से हुई है, अतः सृष्टि का स्रष्टा ईश्वर समस्त ज्ञान व शक्ति का भण्डार सिद्ध होता है। विशाल सृष्टि को देखकर ईश्वर सर्वव्यापक व आंखों से दिखाई न देने से सर्वातिसूक्ष्म व रंग आदि गुणों से रहित सिद्ध होता है। प्रश्न है कि वेदों की उत्पत्ति वा आविर्भाव कैसे व किससे हुआ? इसके साथ वेद क्या हैं, यह जानना आवश्यक है। वेद संस्कृत भाषा में तथा मन्त्र रूप में छन्दोबद्ध रचना का नाम है। वेद के सभी पद अर्थों से युक्त है। वेद का कोई भी पद रूढ़ नहीं अपितु धातुज, यौगिक वा योगरूढ़ हैं। वेदों के पदों के व्युत्पत्ति का ज्ञान पद में प्रयुक्त धातु से होता है और उसका अर्थ निघण्टु व निरुक्त की निर्वचन प्रणाली से किया जाता है। यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। संसार की अन्य भाषाओं में वैदिक संस्कृत भाषा के समान नियम व सिद्धान्त लागू नहीं होते क्योंकि अन्य सभी भाषाओं के पद रूढ़ होते हैं, धातुज या यौगिक नहीं होते। वेद मन्त्रों पर दृष्टि डालने व उनके अर्थों पर विचार करने पर यह ज्ञात हो जाता है कि वेद मनुष्यकृत रचना नहीं है अपितु यह अपौरूषेय ग्रन्थ है। पौरूषेय या मनुष्यकृत रचना इस लिए नहीं है कि सृष्टि के आरम्भ में जो मनुष्य उत्पन्न हुए वह भी तो हमारी ही तरह के थे। बच्चा जब उत्पन्न होता है तो वह भाषा नहीं जानता। माता-पिता व आस पास के सगे सम्बन्धितयों से वह उनकी भाषा सीखता है। संस्कृत तो सर्वोत्कृष्ट भाषा है। वह मनुष्य रचित न होकर ईश्वर प्रदत्त है। अन्य सभी भाषायें संस्कृत का विकार हैं जो सृष्टि के आदि काल से निरन्तर होता आया है।

अब प्रश्न यह सामने आता है कि सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को किसने उत्पन्न किया और किसने उन्हें भाषा सिखाई व वेदों का ज्ञान कराया। इस प्रश्न पर वेदों के मर्मज्ञ ऋषि दयानन्द जी ने भी विचार किया था। उन्होंने सत्यार्थप्रकाश और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में यह सिद्ध किया है कि सृष्टि की आदि में परमात्मा ने अमैथुनी सृष्टि की और मनुष्यों के रूप में युवावस्था में स्त्री व पुरूषों को उत्पन्न किया था। इन मनुष्यों में चार ऋषि वा पुरुष अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नाम के हुए। यह चारों मनुष्य ऋषि अर्थात् उच्च कोटि के विद्वान थे। यह पूर्वजन्म की पवित्र आत्मायें थी जिस कारण इनकी आत्माओं में ज्ञान ग्रहण करने की सर्वाधिक सामर्थ्य थी। सर्वव्यापक परमात्मा ने इन चार ऋषियों को अपना ज्ञान जिसे वेद के नाम से जानते हैं और आज भी वह सृष्टि के आदि काल जैसा ही शुद्ध रूप में उपलब्ध है, उस ज्ञान को इन चार ऋषियों की आत्माओं में स्थापित किया था। यह समझना आवश्यक है कि ईश्वर व जीवात्मा दोनों चेतन हैं। चेतन में ज्ञान प्राप्त करने व ज्ञान देने की क्षमता वा सामथ्र्य होती है। ईश्वर पहले से ही, अनादि काल से, सृष्टि में ज्ञान व विज्ञान का अजस्र स्रोत है। उसने इस सृष्टि से पूर्व अनादि काल से अनन्त बार ऐसी ही सृष्टि को बनाया है व सृष्टि का एक कल्प की अवधि तक पालन करने के बाद उसकी प्रलय भी की है। उसका ज्ञान का स्तर हमेशा एक समान रहता है। वह कभी कम व अधिक नहीं होता।

चारों वेद उस ईश्वर के ज्ञान में अनादि काल से विद्यमान वा वर्तमान हैं और अनन्त काल तक इसी प्रकार रहेंगे। ईश्वर सभी जीवात्माओं के भीतर व बाहर विद्यमान है। वह ईश्वर अपनी सामथ्र्य से ही इस समस्त सृष्टि सहित मनुष्यादि प्राणियों की भी रचना करता है। उसी ने हमारे शरीर में बुद्धि, मन व अन्तःकरण आदि अवयवों को बनाया है। उसने ही हमें बोलने के लिए न केवल जिह्वा वा वाक् दी है अपितु सुनने के लिए श्रवणेन्द्रिय भी दी है। ईश्वर को हमें जो भी बात कहनी व समझानी होती है उसकी वह हमारी आत्मा के भीतर प्रेरणा कर देता है जिसे ज्ञानी मनुष्य जान व समझ सकते हैं। जिस मनुष्य का आत्मा जितना अधिक शुद्ध व पवित्र होता है उतनी ही शीघ्रता व पूर्णता से वह ईश्वर की प्रेरणा को ग्रहण कर सकता व समझ सकता है। ईश्वर ने अपने इस गुण व क्षमता का उपयोग कर सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों की अमैथुनी सृष्टि हो जाने पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन, अब से 1,96,08,53,122 वर्ष पूर्व, चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा की आत्माओं में प्रेरणा करके ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद का ज्ञान उनके अर्थ सहित स्थापित किया था। शतपथ ब्राह्मण अति प्राचीन ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में इस विषय की चर्चा है। चार ऋषियों ने एक एक वेद का ज्ञान ईश्वर से प्राप्त कर उसका उपदेश ब्रह्मा जी नाम के अन्य ऋषि को किया। इससे ब्रह्मा जी को चारों वेदों का ज्ञान हुआ।

ब्रह्मा जी ने चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया तो उनका यह कर्तव्य था कि वह वेद ज्ञान से रहित आस पास के स्त्री व पुरुषों को वेदों का ज्ञान कराते। उन्होंने अन्य ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य आदि के सहयोग से यह कार्य किया और उपदेश द्वारा सभी व अधिक से अधिक लोगों तक वेदों का ज्ञान पहुंचाया। आदि सृष्टि में ईश्वर ने जो अमैथुनी सृष्टि की थी उसमें सभी पवित्र आत्माओं को उत्पन्न किया था जिनकी ज्ञान प्राप्त करने व उसे स्मरण रखने सहित शरीर की सामथ्र्य भी वर्तमान मनुष्यों की तुलना में बहुत अधिक थी। वह मनुष्य जो सुनते थे वह उन्हें स्मरण रहता था। उनके शरीर भी स्वस्थ थे और हम अनुमान कर सकते हैं कि वह सब लम्बी आयु तक जीवित रहे थे। उन्होंने वेद ज्ञान प्राप्त कर अपने अनुरूप वर वधु निश्चित कर विवाह किये और कालान्तर में मैथुनी सृष्टि का होना आरम्भ हुआ। तब से यह जन्म-मरण सहित वेद में वर्णित विवाह आदि परम्परायें चल रही हैं और वेदज्ञान भी परम्परा से चला आ रहा है। इस प्रकार से ईश्वर से चार ऋषियों की हृदय गुहा में स्थित जीवात्माओं को वेदों का ज्ञान प्राप्त हुआ और वेदोपदेश व वेदाध्ययन की परम्परा आरम्भ हुई जो महाभारत काल तक अबाध रूप से चली। महाभारत काल व उसके बाद यह परम्परा बाधित हुई परन्तु ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने आकर इसे पुनः प्रवृत्त किया। ऋषि दयानन्द के प्रयत्नों के कारण ही आज हमें चारों वेद अपने सत्यार्थ सहित संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में उपलब्ध हैं। यह वेदों के आविर्भाव की यथार्थ कथा है।

वेदों में ईश्वर, जीव, प्रकृति सहित मनुष्यों के कर्तव्य-कर्मों आदि का विस्तृत ज्ञान है। वेदों की भाषा और ज्ञान की सहायता से मनुष्य अपना जीवन सुखी रखते हुए व उन्नति करते हुए व्यतीत कर सकते हैं। वेदों का अध्ययन कर मनुष्य यदि चाहें तो जीवन के सभी क्षेत्रों में ज्ञान व विज्ञान की उन्नति कर सकते हैं। हमारे ऋषि मुनि पर्यावरण प्रेमी थे। वह यज्ञ अग्निहोत्र करते हुए वेदाध्ययन एवं अनुसंधान कार्य करते थे और प्रकृति में प्रदुषण व विकार नहीं होने देना चाहते थे। जिस क्षेत्र में जो आवश्यक था वह आविष्कार उनके द्वारा किया गया। महाभारतकाल व उससे पूर्व का भारत ज्ञान विज्ञान की दृष्टि से उन्नत व सम्पन्न था। ऐसा वर्णन भी मिलता है कि प्राचीन भारत में निर्धन लोगों के पास भी अपने अपने विमान हुआ करते थे और वह देश व विश्व का भ्रमण करते थे। तीव्र गामी समुद्री नौकायें व यान भी होते थे जिनसे हमारे देश के लोग पाताल लोक व विश्व के अनेक भागों में जाते थे। इन बातों की झलक ऋषि दयानन्द के पूना में दिए गये इतिहास विषयक प्रवचनों में मिलती है। वेदों को पढ़कर ही हमें अपने कर्तव्यों, जीवन के उद्देश्य व उसकी पूर्ति के साधनों का ज्ञान होता है। ऋषि दयानन्द ने अपने ज्ञान व अनुभव के आधार पर घोषणा की है कि वेद सब सत्य विद्वाओं की पुस्तक हैं। वेद का पढ़ना पढ़ाना एवं सुनना-सुनाना सब मनुष्यों वा आर्यों का परम धर्म है। वेद हमें सही रीति से ईश्वरोपासना करना सिखाने के साथ वायु, जल व पर्यावरण आदि को शुद्ध करने की विधि यज्ञ अग्निहोत्र आदि का ज्ञान भी कराते हैं। सभी मनुष्यों को वेदाध्ययन कर अपना जीवन सुखी व सफल बनाना चाहिये और वेदों की रक्षा में योगदान देना चाहिये।

वेदों का आविर्भाव ईश्वर से हुआ है। ऐसा ईश्वर ने मनुष्यों के सभी विषयों व कर्तव्यों का ज्ञान कराने के लिए किया। संसार के सभी रीति रिवाजों व परम्पराओं पर वेदों का न्यूनाधिक प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। वेदों के अध्ययन व वेदों की शिक्षाओं पर आचरण कर हम धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति कर सकते हैं। इन चार पुरुषार्थों की प्राप्ति ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य व लक्ष्य है। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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